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पश्चिम के बाद अब पूरब में घिरेगा चीन, मोदी ने इंडोनेशिया से कर ली डील

साबांग पोर्ट के जरिए भारत हिंद महासागर में चीन की हर नौसिनक हरकत पर नजर भी रख सकेगा.....

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नई दिल्‍ली। पाकिस्‍तान, श्रीलंका जैसे पड़ोसी देशों में बंदरगाह और सैन्‍य उपस्थिति के जरिए भारत को घेरने की चीन की रणनीति के खिलाफ मोदी सरकार ने अपनी दूसरी चाल चल दी है। ईरान के चाबहार के बाद अब वह इंडोशिया के साबांग द्वीप में दूसरा पोर्ट बनाने जा रहा है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के हालिया इंडोनेशिया दौरे में दोनों देशों के बीच इस पोर्ट के डेवलपमेंट को लेकर सहमति बन गई है।

 

समाचार एजेंसी रायटर्स के मुताबिक, यह पोर्ट मैरिटाइम यूज के साथ ही नौसिक उद्येश्‍यों के लिए होगा। पाकिस्‍तान के ग्‍वादर से महज 150 किमी की दूरी पर चाबहार पोर्ट का अधिग्रहण करके जिस तहर सरकार ने चीन की सामरिक बढ़त को कमजोर करने की कोशिश की थी, ठीक साबांग पोर्ट भी चीन की ओर से श्रीलंका में अधिग्रहित हंबनटोटा और मालदीव में अधिग्रहित बंदरगाह का जवाब होगा। अंडमान द्वीव समूह के आखिरी द्वीप से करीब 170 किलोमीटर की दूरी में मौजूद यह पोर्ट भारत की लुक ईस्‍ट पॉलिसी को भी ताकतवर बनाएगा। साथ ही मलक्‍का जलसंधि के पास मौजूद होने के चलते यह इकोनॉमी के लिहाज से भी अहम होगा। सामान्‍य भाषा में कहें तो पश्चिम में चाबहार के बाद अब पूरब में सबांग में चीन भारत से घिरेगा। 

 

साउथ ईस्‍ट एशिया में कनेक्टिविटी का पहला प्रयास 

साबांग पोर्ट साउथ ईस्‍ट एशिया में कनेक्टिविटी का भारत का पहला प्रयास भी है। भारत म्‍यांमार के रास्‍ते होते हुए थाईलैंड तक पहले ही सड़क बना रहे है। ऐसे में अगर इस पोर्ट के अधिग्रहण से भारत पूरे इलाके में अपनी उपस्थिति और मजबूती के साथ दर्ज करा लेगा। मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक, भारत इस पोर्ट का निर्माण पूरी तरह से चाबहार की तर्ज पर ही करेगा। इसके तहत पहले चरण में जहां ढांचाग‍त विकास किया जाएगा, वहीं दूसरे चरण में इसके जरिए इलाके के अन्‍य देशों के साथ कनेक्टिविटी को बढ़ाया जाएगा। 

 

 

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चीन का मिलेगा जवाब 
मलक्‍का जलसंधि के जानकार और दिल्‍ली विश्‍वविद्यालय में असिस्‍टेंट प्रोफेसर विमल कुमार के मुताबिक, यह पोर्ट भारत को असियान रीजन में एक मनोवैज्ञानिक बढ़त प्रदान करेगा। एसियान देशों के मन में चीन को लेकर लंबे समय से एक आशंका है। जबकि भारत के साथ ऐसा नहीं है। अगर भारत यहां अपना बेस तैयार करता है तो चीन के खिलाफ भारत के प्रति उनके भरोसे में बढ़ोतरी आएगी। हिंद महासागर में चीन की ओर से की जाने वाली हर नौसिक हरकत का रूट भी यही है। भारत अगर वहां माजूद रहता है तो चीन पर हमेशा से एक मनोवैज्ञानिक दबाव रहेगा।   

 

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इस पोर्ट के इकोनॉमिक फायदे  

माना जा रहा है कूटनीति के अलावा इस पोर्ट के जरिए भारत को आर्थिक लाभ भी हो सकता है। यह द्वीप मलक्‍का जलसंधि के मुहाने पर मौजूद है। मलक्‍का जलसंधि दुनिया के सबसे व्‍यस्‍त समुद्री मार्गों में से एक है। माना जा रहा है कि इस पोर्ट के बन जाने से साउथ चाइना सी और हिदं महासागर के बीच आने जाने वाले बंदरगाहों को एक और ठिकाना मिल जाएगा।   

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