Home » Economy » Internationalखास खबर: ईरान पर अमेरिकी प्रतिबंधों का भारत पर असर impact of US sanctions on Indias oil import

खास खबर: अमेरिका ने ईरान पर लगाया फिर से प्रतिबंध, कितना सेफ है भारत ?

भारत ने चाबहार पोर्ट में भारी निवेश भी कर रखा है। ट्रम्‍प के फैसले ने सारी तैयारियों पर सवालियां निशान लगा दिए हैं...

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नई दिल्‍ली। अमेरि‍का ने ईरान के साथ हुए परमाणु समझौते से खुद को अलग कर लि‍या है। इसी के साथ ही एक बार फिर से क्रूड की कीमतों में उछाल आने की आशंका है। क्रूड की कीमतें पहले ही 77 डॉलर प्रति बैरल पर हैं। प्रतिबंधों को इसका सबसे बुरा असर भारत पर हो सकता है। ईरान भारत का तीसरा बड़ा ऑयल पार्टनर है। भारत ने ईरान के चाबहार पोर्ट में भारी भरकम निवेश भी कर रखा है। भारत की वहां नैचुरल गैस फील्‍ड को लेकर भी बात चल रही थी। ट्रम्‍प के एक फैसले ने इन सारी तैयारियों पर सवालियां निशान लगा दिए हैं। ऐसे में बड़ा सवाल उठता है कि भारत के लिए अब क्‍या विकल्‍प है। आखिर इस प्रतिबंध का कितना असर देखने को मिलेगा और भारत की आगे की रणनीति क्‍या हो सकती है। इन प्रतिबंधों का खुद ईरान पर क्‍या असर होगा। 

 

80 डाॅॅलर तक जा सकता है क्रूड 

 

एनर्जी एक्‍सपर्ट नरेंद्र तनेजा के मुताबिक, अमेरिकी फैसले का तत्‍कालिक असर पड़ना तय है। मौजूदा राजनीतिक हालात को देखने हुए अगले 2 महीने में क्रूड आसानी के साथ 80 डॉलर प्रति बैरल तक जा सकता है। मार्केट में डिमांड एंड सप्‍लाई का सेंटिमेंट मजबूत है। आने वाले दिन में अगर जियो पॉलिटिकल टेंशन नहीं बढ़ी तो क्रूड की कीमतें नीचे आ सकती हैं। मतलब साफ है भारत सरकार के खजाने पर बोझ पड़ना तय है।  


अमेरिकी फैसले के ईरान पर 3 असर 

 

#1लेन देन पर रोक: ज्‍यादातर इंटरनेशनल ट्रांजैक्‍शन अमेरिकी डॉलर में होता है। प्रतिबंधों के चलते ईरान को पेमेंट करने में दिक्‍कत आएगी। पेमेंट की सुविधा मुहैया कराने वाले ज्‍यादातर इंस्‍टीट्यूशंस पर अमेरिका का कब्‍जा है। चाहकर भी बहुत से देश ईरान से तेल लेने से कतराएंगे।  

 

#2इन्‍श्‍योरेंस में दिक्‍कत: दूसरी सबसे बड़ी दिक्‍कत ईरान की ओर से एक्‍सपोर्ट किए जाने वाले क्रूड के इन्‍श्‍योरेंस को लेकर आती है। हाई रिस्‍क को देखने हुए इन्‍श्‍योरेंस के बिना क्रूड का ट्रांसपोर्ट होना मुश्किल हो जाता है। यह सुविधा मुहैया कराने वाली ज्‍यादातर कंपनियां अमेरिका के असर वाली होती हैं। ऐसे में यहां भी दिक्‍कत बनी रहती है  

 

#3शिपिंग में दिक्‍कत: शिपिंग में अमेरिकी की मोनोपॉली तो नहीं हैं, लेकिन कहीं न कहीं ज्‍यातर शिपिंग कंपनियों के तार अमेरिका से जुड़े जरूर हैं। दुनिया का सबसे बड़ा कारोबारी केंद्र होने के कारण हर शिपिंग कम्‍पनी के अमेरिका में इंस्‍ट्रेस्‍ट होते हैं। प्रतिबंध लगने के बाद ये कंपनियां ईरानी क्रूड ढोने से कतराने लगेंगी। 

 

 

भारत के लिए क्‍या विकल्‍प ? 
भारत जिन देशों से तेल लेता है, उसमें ईरान का नंबर तीसरा है। तनेजा के मुताबिक, 2014 से पहले की तरह भारत का मार्केट एक बार फिर से इराक और सऊदी अरब की ओर शिफ्ट हो सकता है। ईरान भारत को गेहूं के बदले भी क्रूड बेचने का प्रस्‍ताव दे चुका है। भारत के पास दोनों विकल्‍प हैं। हालांकि प्रतिबंध के चलते क्रूड की कीमतें बढ़ीं तो भारत के खजाने को बोझ उठाने के लिए तैयार रहना होगा।  

 

सरकार का दावा नहीं होगा तत्‍कालिक असर 
फिलहाल अमेरिका की ओर से प्रतिबंधों के बाद भारत की ओर से आई पहली प्रतिक्रिया में कहा गया है कि इन फैसले का तात्‍कालिक असर भारत पर नहीं होगा। अधिकारियों का कहना है कि जब तक यूरोपीय यूनियन इन प्रतिबंधों को लागू नहीं करता, तब तक भारत के लिए चिंता की कोई बात नहीं है। तेल के बदले भारत यूरो में ईरान को पेमेंट कर सकता है। हालांकि प्रतिबंधों को यूरोपीय यूनीयन भी लागू करता है तो फिर दोनों देशों का कारोबार प्रभावित होगा।   

 

इम्‍पोर्ट 2 गुना करने का मन बना चुका है भारत 
बता दें कि ज्यादा खरीद पर ईरान ने भारतीय कंपनियों को फ्रेट पर डिस्काउंट ऑफर किया था। इस क्रम में सरकारी रिफाइनरियों ने वित्त वर्ष 2018-19 में ईरान से ऑयल इंपोर्ट दोगुना करने की योजना बनाई है। सरकारी रिफाइनर्स इंडियन ऑयल कॉर्प, मंगलोर रिफाइनरी एंड पेट्रोकेमिकल्स लिमिटेड, भारत पेट्रोलियम और हिंदुस्तान पेट्रोलियम ने अप्रैल, 2018 से शुरू हुए वित्त वर्ष के दौरान ईरान से 3.96 लाख बैरल प्रति दिन (बीपीडी) ऑयल के इंपोर्ट की योजना बनाई है।

 

अमेरिकी प्रतिबंधों के बाद ईरान से घटा था इंपोर्ट
अमेरिकी प्रतिबंधों से पहले ईरान, भारत के लिए दूसरा बड़ा ऑयल सप्लायर देश था, जिसके बाद 2016-17 में वह सऊदी अरब और इराक के बाद तीसरे पायदान पर आ गया था। हालांकि अब प्रतिबंध हटने के बाद ईरान धीरे-धीरे भारत में अपना मार्केट शेयर बढ़ा रहा है।

 

तीसरा बड़ा एक्सपोर्टर है ईरान
2017-18 के आधिकारिक आंकड़े अभी तक उपलब्ध नहीं है, हालांकि सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार अप्रैल, 2017 से फरवरी, 2018 के बीच ईरान के लिए भारत तीसरा बड़ा ऑयल एक्सपोर्टर रहा। वहीं इराक, सऊदी अरब को पछाड़कर भारत के लिए सबसे बड़ा सप्लायर बन गया। भारत की चार सरकारी रिफाइनिंग कंपनियों ने पिछले वित्त वर्ष में ईरान से लगभग 2.05 लाख बीपीडी ऑयल का इंपोर्ट किया था।

 

क्रूड नहीं निवेश चिंता का विषय 
भारत के लिए अमेरिकी प्रतिबंध कई तरह की चुनौतियां लेकर आई है। तनेजा के मुताबिक, क्रूड भारत के लिए चिंता का विषय नहीं है, बल्कि हाल के दौर में भारत ने ईरान में जो निवेश किया है उसपर जरूर सोचना पड़ेगा। भारत चाबहार के माध्‍यम से भारत ने ईरान ने काफी निवेश कर रखा है। वह अफगानिस्‍तान और मध्‍य एशिया के लिए ईरान जरिए ही रास्‍ता बना रहा है। भारत सिर्फ चाबहार पर अब तक करीब 85.21 मिलियन डालर का निवेश कर चुका है। 12.2 करोड़ डॉलर यानी 78 हजार करोड़ रुपए का निवेश करेगा।  इसके अलावा 8.5 करोड़ डॉलर पोर्ट के उपकरण पर भी खर्च किए जाएंगे। भारत चाबहार पोर्ट के निर्माण के लिए ईरान को 15 करोड़ डॉलर का लोन भी देने वाला है । भारत 6 अरब डॉलर की राशि रिलीज भी कर चुका है। ऐसे में यह देखना जरूरी होगा कि वह प्रतिबंधों के बाद अमेरिका को इस परियोजना के लिए कैसे राजी करता है।  

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