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पाकिस्‍तान में डॉलर संकट की 5 वजहें, डिफाल्‍टर होने की आई नौबत

पाकिस्‍तान की बैलेंस ऑफ पेमेंट क्राइसिस के लिए चीन को जिम्‍मेदार बताया जा रहा है, पर यह पूरी तस्‍वीर का बस एक पहलू है

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नई दिल्‍ली. पाकिस्‍तान के सामने बैलेंस ऑफ पेमेंट का संकट खड़ा हो गया है। देश का विदेशी मुद्रा भंडार 10.8 अरब डॉलर के रिकॉर्ड लो लेवल पर आ गया है। पिछले साल मई में यह 16.4 अरब डॉलर पर था। फाइनेंशियल टाइम्‍स की रिपोर्ट की मानें तो उसके पास जो भी विदेशी मुद्रा भंडार है, वह अगले 10 हफ्तों में खत्‍म हो सकता है। सीधी भाषा में कहें तो पाकिस्‍तान के विदेशी मुद्रा भंडार में इतना डॉलर नहीं बचा है कि वह आने वाले दिनों में चैन से अपना इम्‍पोर्ट और इंटरनेशनल पेमेंट जारी रख सके। पाकिस्‍तान इस संकट से निपटने के लिए चीन से एक बार फिर 2 अरब डॉलर तक का कर्ज लेने जा रहा है। 

डिफाल्‍टर होने की आई नौबत 

इकोनॉमिस्‍ट पई पनंदिकर के मुताबिक, अगर पकिस्‍तान बैलेंस ऑफ पेमेंट को मेंटन करने के लिए कदम नहीं उठता है तो उसपर डिफाल्‍टर होने का खतरा पैदा हो सकता है। पनंदिकर के मुताबिक, पाकिस्‍तान ने आईएफएफ, वर्ल्‍ड बैंक समेत कई इंटरनेशनल फाइनेंशियल इंस्‍टीट्यूशंस से कर्ज ले रखा है। उसे हर महीने इसकी रीपेमेंट करनी होती है। ज्‍यादातर पेमेंट डॉलर में होती है। अगर विदेशी मुद्रा फंडार खाली हो गया तो रीपेमेंट समय पर नहीं हो पाएगा। ऐसी  स्थिति में उस पर डिफॉल्‍टर का टैग लग सकता है।  

 

चीन अकेले जिम्‍मेदार नहीं 
पाक मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक, चाइना-पाक कॉरिडोर (CPEC)  से जुड़ी मशीनरी के भारी निर्यात के चलते पाकिस्‍तान को ज्‍यादा डॉलर की जरूरत पड़ रही है। इसका सीधा असर उसके विदेशी मुद्रा भंडार पर  पड़ रहा है और वह बैलेंस ऑफ पेमेंट जैसे संकट के मुहाने पर खड़ा है। बड़ा सवाल यह है कि देश की इकोनॉमी को यहां तक लाने के लिए क्‍या अकेले चीन प्रायोजित CPEC परियोजना ही जिम्‍मेदार है। पाकिस्‍तानी इकोनॉमी पर नजर रखने वाले जानकारों का दावा है कि CPEC को अकेले दोष देना ठीक नहीं है। अगर देश इस संकट में आया है तो इसके लिए कई चीजें जिम्‍मेदार हैं। आइए जानते हैं ऐसे ही 5 कारणों के बारे में, जिसके चलते पाकिस्‍तान की इकोनॉमी खोखली होती चली गई और देश का सारा खजाना खाली हो गया। 

 

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1- महंगा क्रूड: भारत की तरह पाकिस्‍तान भी पेट्रोलियम प्रोडक्‍ट के लिए पूरी तरह से क्रूड इम्‍पोर्ट पर निर्भर है। अंतराष्‍ट्रीय बाजार में क्रूड 2014 के बाद के सबसे टॉप लेवल पर है। महंगा क्रूड हासिल करने के लिए उसे ज्‍यादा विदेशी मुद्रा की जरूरत पड़ रही है। इसके चलते उसका डॉलर तेजी के साथ घट रहा है। बता दें कि 2013 में भी जब क्रूड 100 डॉलर प्रति बैरल के पार गया था, जब भी पाकिस्‍तान के सामने बैलेंस ऑफ पेमेंट का ऐसा ही संकट खड़ा हुआ था और उसे आईएमएफ से कर्ज लेने के लिए मजबूर होना पड़ा था। 

 

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2- कमजोर होता पाक रुपया: पाकिस्‍तान की करंसी लगातार कमजोर हो रही है। पाकिस्‍तानी रुपया अमेरिकी डॉलर के मुकाबले 120 के लेवल पर जा पहुंचा है। इसके चलते न सिर्फ उसका इम्‍पोर्ट महंगा पड़ रहा है, बल्कि पहले के मुकाबले उसे ज्‍यादा डॉलर खर्च करना पड़ रहा है। हाल के दौर में पाकिस्‍तान की अन्‍य चीजों के लिए इम्‍पोर्ट पर निर्भरता पहले के मुकाबले बढ़ी है, जबकि उसका एक्‍सपोर्ट कमजोर हुआ है। इसके चलते डॉलर जा तो रहा है, लेकिन आने का कोई रास्‍ता नहीं बन पा रहा है। खजाने पर इसका सीधा असर दिख रहा है।   

 

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3- अमेरिकी मदद रूक गई है: अमेरिका में ट्रम्‍प के सत्‍ता में आने के बाद पाकिस्‍तान को मिलने वाली आर्थिक मदद लगातार कमजोर हुई है। आतंकवाद के खिलाफ पर्याप्‍त कदम नहीं उठाने का आरोप लगाते हुए अमेरिका ने बड़े पैमाने पर पाकिस्‍तान की मदद रोक दी है। इससे पहले पाकिस्‍तान को आतंकवाद के खिलाफ जंग के लिए अमेरिका को ओर से 33 अरब डॉलर की मदद महैया कराई चा चुकी है। अमेरिका के इस कदम से पाकिस्‍तान को सीधे 1.6 अरब डॉलर सालाना का नुकसान हो रहा है। 

 

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4- कम हुआ रेमिटेंस : फाइनेंशियल टाइम्‍स की रिपोर्ट के मुता‍बिक, विदेशों में काम करने वाले नागरिकों की ओर से भेजी जाने वाली रकम जिसे आर्थिक भाषा में रेमिटेंस कहा जाता है, इसमें भी गिरावट देखने को मिली है। यही नहीं पाकिस्‍तानी सरकार इन प्रवासियों को अच्‍छे रिटर्न का ऑफर देकर उसके जरिए विदेशी मुद्रा हासिल करना चाहती थी, लेकिन यह योजना भी अब खटाई में दिख रही है।  

 

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5- सीपीईसी में खर्च बढ़ रहा है: पाकिस्‍तान पर लगातार बढ़ते कर्ज का एक बड़ा कारण बीजिंग समर्थित चाइना पाकिस्‍तान इकोनॉमिक कॉरिडोर यानी सीपीईसी है। करीब 60 अरब डॉलर की इस परियोजना को गेमचेंजर माना जा रहा है। पाकिस्‍तानी अधिकारी मान रहे हैं कि एक बार पूरी हो जाने के बाद यह परियोजना देश की इकोनॉमी की सूरत बदल देगी। यही कारण है कि देश की सरकार खर्च की परवाह किए बिना पैसा पानी कर तरह बहा रही है। हालांकि देश में ढंग का इंडस्ट्रियल डेवलपमेंट नहीं होने के चलते उन्‍हें इस परियोजना के लिए ज्‍यादातर मशीनरी चीन से इम्‍पोर्ट करनी पड़ रही है। ऐसे में उनका विदेशी मुद्रा भंडार घट रहा है और कर्ज बढ़ रहा है। 

 

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