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नैरोबी में WTO की बैठक, फूड सिक्युरिटी और सब्सिडी हैं भारत के लिए अहम मुद्दे

Economy Team

Dec 14,2015 01:47:00 PM IST
15-18 दिसंबर के बीच केन्‍या की राजधानी नैरोबी में वर्ल्‍ड ट्रेड ऑर्गेनाइजेशन (डब्‍ल्‍यूटीओ) की दसवीं मिनिस्‍टीरियल कॉन्‍फ्रेंस होने जा रही है। इसमें फूड सिक्‍युरिटी, फार्म सब्सिडी, खाद्यानों की स्‍टॉक होल्डिंग, किसानों के हित समेत व्‍यापार उदारीकरण और मार्केट खोलने जैसे बेहद अहम विषयों पर विकसित और विकासशील देशों के बीच सीधा टकराव है। विकसित देशों द्वारा फ्री ट्रेड और एन्‍वायरमेंट समेत कई नए मुद्दों को कॉन्‍फ्रेंस में शामिल करने पर बल देने से भारत जैसे विकासशील देशों के लिए यह करो या मरो की स्थिति हो गई है। अमेरिका और अन्‍य विकसित देश जहां भारत के सब्सिडी प्रोग्राम पर लगाम लगाने की कोशिश कर रहे हैं, वहीं वे खुद डोमेस्टिक एग्रीकल्‍चर सेक्‍टर को 70-80 फीसदी तक फार्म सब्सिडी दे रहे हैं। इसके विरोध में विकासशील देश भी लामबंद हो रहे हैं। इससे दोनों पक्षों के बीच साफ तौर पर तलवार खिंच गई है।
भारत के हित कहां हो रहे हैं प्रभावित
2001 में शुरू हुए दोहा डेवलपमेंट राउंड से ही कई मुद्दों पर विकासशील और विकसित देशों के बीच टकराव है। टकराव की कई सारी वजहें हैं। भारत समेत विकासशील देशों द्वारा खाद्यान्‍न की पब्लिक स्‍टॉक होल्डिंग के साथ किसानों को फर्टिलाइजर, सीड्स, पेस्टिसाइड्स और इरिगेशन से जुड़ी सब्सिडी देने का मामला इनमें प्रमुख है। अमेरिका, ईयू समेत सभी विकसित देशों का कहना है कि भारत और अन्‍य विकासशील देशों का यह रवैया फ्री मार्केट प्रेक्टिसेज के सिद्धांतों के खिलाफ है। जबकि भारत का कहना है कि 2014 में हुए ट्रेड फेसिलिटेशन एग्रीमेंट के तहत उसे तब तक के लिए फूड बफर स्‍टॉक्‍स बनाए रखने का अधिकार है, जब तक कि इसका कोई स्‍थायी समाधान नहीं निकाल लिया जाता।
फूड सब्सिडी पर दोनों पक्षों में खिंची तलवार
भारत का यह भी कहना है कि उसकी एक बड़ी आबादी अभी भी गरीबी रेखा से नीचे है। इस आबादी को भोजन उपलब्‍ध कराने के लिए खाद्यान्‍न का बफर स्‍टॉक जरूरी है। हालांकि, इस एग्रीमेंट के तहत बफर स्‍टॉक के अधिक होने की स्थिति में भारत इसका एक्‍सपोर्ट नहीं कर सकता है। जबकि विकसित देशों का कहना है कि यह फूड सब्सिडीयुक्‍त है और इससे मार्केट प्राइस गलत तरीके से प्रभावित होती है। इतना ही नहीं, विकसित देश भारत द्वारा किसानों को दी जा रही मिनिमम सपोर्ट प्राइस (एमएसपी) की भी एक सीमा तय करना चाहते हैं, जबकि भारत इसके खिलाफ है। भारत विकसित देशों द्वारा दी जा रही बड़ी सब्सिडी के साथ ही विकसित देशों से होने वाले आयात में अचानक तेजी से गरीब देशों के फार्म प्रोडक्‍ट्स की कीमतों में तेज गिरावट का सामना करने के लिए इम्‍पोर्ट पर तात्‍कालिक रूप से ड्यूटी बढ़ाने के लिए प्रभावी स्‍पेशल सेफगार्ड मेकेनिज्‍म लागू करने जैसे मुद्देे भी उठाए हैं।
कृषि उत्‍पादों के फ्री ट्रेड से भारत में किसानों की हालत होगी खराब
विकसित देश कृषि उत्‍पादों का फ्री ट्रेड चाहते हैं। इससे विकासशील देशों के कृषि उत्‍पाद उनकी प्रतिस्‍पर्द्धा में खरे नहीं उतर पाएंगे और भारत जैसे देशों के किसानों की हालत काफी खराब हो जाएगी। भारत समेत अधिकांश विकासशील देशों को आशंका है कि विकसित देश एग्रीकल्‍चर ट्रेड के मामले में जिस तरह की शर्तें लागू करना चाह रहे हैं, उनसे विकासशील देशों में डेयरी, पॉल्‍ट्री प्रोडक्‍ट्स के साथ सेब जैसी फसलों के इम्‍पोर्ट में काफी तेजी आ सकती है। इसे देखते हुए भारत ने कृषि उत्‍पादों के इम्‍पोर्ट में तेजी आने की स्थिति में डब्‍ल्‍यूटीओ के सदस्‍यों को विकासशील देशों को स्‍पेशल सेफगार्ड मेजर्स (एसएसएम) का उपयोग करने की अनुमति देने का आग्रह किया है। भारत की कॉमर्स मिनिस्‍टर निर्मला सीतारमन ने कहा कि भारत सरकार यह सुनिश्चित करना चाहती है कि किसानों को पर्याप्‍त मुआवजा मिले और पब्लिक डिस्ट्रिब्‍यूशन सिस्‍टम की जरूरतों को पूरा करने के लिए पर्याप्‍त मात्रा में खाद्यान्‍न हो। भारत यह भी चाहता है कि पहले उन मामलों पर सहमति बने, जो विकासशील और गरीब देशों के लिए जरूरी हैं। इसके अलावा, भारत फूड सिक्‍युरिटी के मकसद से विकासशील देशों में पब्लिक फूड स्‍टॉकहोल्डिंग के मुद्दे का स्‍थानीय समाधान भी चाहता है।
क्‍या कहते हैं एक्‍सपर्ट
इंटरनेशनल ट्रेड के एक्‍सपर्ट और इंडियन इंस्‍टीट्यूट ऑफ फॉरेन ट्रेड के प्रमुख डॉ बिश्‍वजीत धर ने नैरोबी में भारत की भूमिका को काफी बड़ा और अहम बताया। उन्‍होंने कहा कि भारत को विकसित देशों के साथ नहीं होकर विकासशील देशों को एकजुट करके ईयू और अमेरिका की दोहरी नीतियों का विरोध करना चाहिए। धर ने कहा कि भारत जहां अपने सब्सिडी प्रोग्राम से गरीब करोड़ों किसानों को सुरक्षा उपलब्‍ध कराता है और फूड सब्सिडी से करोड़ों गरीब का पेट भरता है। वहीं अमेरिका और अन्‍य विकसित देश अपने सब्सिडी प्रोग्राम से मिडिल साइज की मल्‍टी नेशनल कंपनियों को आगे बढ़ाने का काम कर रहे हैं। उन्‍होंने कहा कि अमेरिका भारत को सब्सिडी प्रोग्राम पर लगाम की बात करता है और उसकी सब्सिडी 1995 के 60 अरब डॉलर से बढ़कर 2012 में 140 अरब डॉलर हो गई है। विकसित देशों का एक ही मकसद दुनियाभर के विकासशील और गरीब देशों के दरवाजे अपनी कंपनियों के लिए खोलना है। उन्‍होंने कहा कि दोहा राउंड से अभी तक 14 साल में अगर डब्‍ल्‍यूटीओ से जुड़े मुद्दों पर बातचीत में कोई प्रगति नहीं हुई, तो इसके लिए विकसित देश जिम्‍मेदार हैं। जबकि ये देश वार्ता में प्रगति नहीं होने के लिए विकासशील देशों को दोषी ठहरा रहे हैं।
तनातनी के और क्‍या हैं कारण
विकसित देश इं‍डस्ट्रियल गुड्स और सर्विसेज के फ्री ट्रेड पर जोर दे रहे हैं। वे भारत समेत विकासशील देशों द्वारा दी जारी एग्रीकल्‍चर सब्सिडी का विरोध कर रहे हैं, जबकि वे अपने डोमेस्टिक एग्रीकल्‍चर सेक्‍टर को 70-80 फीसदी तक फार्म सब्सिडी दे रहे हैं। विकसित देशों का यह भी कहना है कि भारत अगर उनसे फार्म सब्सिडी कम करने की मांग करता है तो उसकी एवज में उसे अपनी फसलों के मिनिमम सपोर्ट प्राइस प्रोग्राम की एक अधिकतम सीमा तय करनी होगी, और ऐसा नहीं करने पर उसे पैनल्‍टी भरनी भी पड़ सकती है। विकसित देश एक तरफ जहां भारत समेत विकासशील देशों के फूड प्रोग्राम को नॉर्म्‍स के खिलाफ बता रहे हैं, वहीं वे कई इंटरनेशनल फूड एड प्रोग्राम्‍स चला रहे हैं और उनकी फाइनेंशिंग कर रहे हैं। भारत का कहना है कि ये प्रोग्राम भी इंटरनेशनल फूड प्राइसेस को प्रभावित करते हैं और विकासशील देशों को इसका घाटा उठाना पड़ता है।
दूसरी स्‍लाइड में जानें वि‍कसित देश किस तरह चाहते हैं अपने हित साधना....
गतिरोध के क्या हुए हैं असर विकसित और विकासशील देशों के बीच दोहा दौर से जारी गतिरोध के कारण ट्रेड और इससे जुड़े विवादों के समाधान में डब्ल्यूटीओ की भूमिका पर सवाल उठने लगे हैं। डब्ल्यूटीओ वार्ताओं के कमोबेश असफल रहने से इससे जुड़े दुनिया के 123 देशों के बीच हाल के वर्षों में बायलैटेरल फ्री ट्रेड एग्रीमेंट की बाढ़ सी आ गई है। इसका नतीजा यह भी हुआ कि डब्ल्यूटीओ में कई सारे नेगोशिएशन ग्रुप भी उभर आए हैं। इन मुद्दों के जरिए हित साधना चाहते हैं विकसित देश अपने हितों को साधने के लिए विकसित देश नैरोबी दौर की वार्ता के लिए कुछ नई मुद्दे जोड़ना चाहते हैं। इन मुद्दों में लेबर प्रेक्टिसेज, एन्वायरमेंटल स्टैंडर्ड्स, ग्लोबल वैल्यू चेन्स और सप्लाई चेन्स का प्रमोशन, कम्पीटिशन और इन्वेस्टमेंट से जुड़े नियम, क्लीन और ग्रीन एनर्जी से पैदा होने वाले एन्वायरमेंटल गुड्स, गवर्नमेंट प्रोक्योरमेंट में पारदर्शिता के साथ सरकारी स्वामित्व वाले एंटरप्राइजेज, ई-कॉमर्स और एकाधिकार से जुड़े मामले शामिल हैं। इन देशों ने इसके लिए वार्ता की धीमी रफ्तार के साथ 21वीं सदी की जरूरतों को सामने रखा है। अभी तक कितनी और कहां हुईं कॉन्फ्रेंस डब्ल्यूटीओ की निर्णय लेने वाली सर्वोच्च इकाई मिनिस्टीरियल कॉन्फ्रेंस है। यह सामान्य तौर पर दो साल में एक बात आयोजित होती है। पहली कॉन्फ्रेंस 1996 में सिंगापुर में, दूसरी 1998 में जेनेवा में, तीसरी 1999 में यूएस के सिएटल में, चौथी 2001 में कतर के दोहा में, पांचवीं 2003 में मेक्सिको के कानकुन में, छठी 2005 में हांगकांग में और सातवीं दौर की वार्ता का आयोजन 2009 में जेनेवा में, आठवीं भी 2011 में जेनेवा, नवमी इंडोनेशिया के बाली में 2013 में और दसवीं नैरोबी में होने जा रही है।
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