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रेलवे में कम होगा विजिलेंस इन्‍क्‍वायरी का डर, अफसर खुलकर ले सकेंगे फैसले

रेलवे अपने अफसरों में विजिलेंस इन्‍क्‍वायरी का डर कम करेगा, ताकि वे खुल कर फैसले ले सकें

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नई दिल्‍ली। रेलवे अपने अफसरों में विजिलेंस इन्‍क्‍वायरी का डर कम करेगा, ताकि वे खुल कर फैसले ले सकें। रेल मंत्रालय ने रेलवे के परफॉरमेंस और डिलीवरी में सुधार के लिए प्रोसेस रिफॉर्म की सीरीज में यह फैसला लिया है। इसके अलावा बोर्ड ने प्रोजेक्‍ट्स में देरी को रोकने के लिए रेलवे बोर्ड ने कई कदम उठाए हैं। बोर्ड ने जहां कॉन्‍ट्रेक्‍ट्स की बिडिंग प्रोसेस भी आसान किया है। 

 

रेलवे बोर्ड ने जारी किए निर्देश 

रेलवे बोर्ड ने विजिलेंस इन्‍क्‍वायरी  का डर कम करने के लिए कई निर्देश जारी किए हैं। ये निर्देश इसी सप्‍ताह सभी जीएम सहित एचओडी को भेज दिए गए हैं। इसमें कहा गया है कि विजिलेंस केस रजिस्‍ट्रेशन से पहले कुछ सावधानी बरती जाएगी। 

 

विजिलेंस में जाने से पहले होगी जांच

बोर्ड के निर्देश के मुताबिक यदि किसी अफसर की शिकायत आती है तो सबसे पहले एसडीजीएम (सीनियर डिप्‍टी जनरल मैनेजर) द्वारा केस या शिकायत की जांच की जाए कि वह केस या शिकायत की विजिलेंस इन्‍क्‍वायरी होनी चाहिए या नहीं। यदि केस सही नहीं पाया जाता है तो केस को पीएचओडी (प्रिंसिपल हेड ऑफ डिपार्टमेंट) को भेजा जाएगा। पीएचओडी द्वारा भी अपने स्‍तर पर जांच के बाद बताना होगा कि केस की जांच विजिलेंस कराई जानी चाहिए या नहीं। 

 

जीएम लेंगे फैसला

अगर एसडीजीएस और पीएचओडी का फैसला एक ही होता है तो केस को विजिलेंस में रजिस्‍टर कराया जाएगा, लेकिन यदि दोनों के फैसलों के अंतर होगा तो केस जनरल मैनेजर के पास भेजा जाएगा। हालांकि पीएचओडी डीआरएम या सीएओ से भी सलाह ले सकते हैं। जीएम, डीए (अनुशासन अथॉरिटी) के तौर पर अंतिम फैसला ले सकते हैं। 

 

कैरियर पर नहीं पड़ेगा प्रभाव

एक वरिष्‍ठ रेलवे अधिकारी ने कहा कि कई बार अफसर अहम फैसले लेने से कतराते हैं, कहीं किसी तरह की लापरवाही के चलते उन्‍हें विजिलेंस इन्‍क्‍वायरी का सामना न करना पड़ जाए। इसका असर उनके कैरियर पर भी पड़ता है, लेकिन अब रेलवे बोर्ड ने व्‍यवस्‍था दी है कि केवल विजिलेंस इन्‍क्‍वायरी के कारण अधिकारी की प्रमोशन नहीं रोकी जाएगी, जब तक कि चार्ज शीट न हो जाए। 

 

कॉन्‍ट्रेक्‍ट बिडिंग प्रोसेस में बदलाव 

प्रोसेस रिफॉर्म की सीरीज में रेलवे बोर्ड ने कॉन्‍ट्रेक्‍ट्स की बिडिंग प्रोसेस में बदलाव किया है। इसका मकसद रेलवे के प्रोजेक्‍ट्स में देरी को रोकना है। नए निर्देशों के मुताबिक, अब यदि लोअेस्‍ट (एल-वन) बिडर विदड्रॉ कर लेता है तो दोबारा से टेंडर जारी करने की बजाय दूसरे नंबर पर रहे बिडर को कॉन्‍ट्रेक्‍ट जारी कर दिया जाएगा। 


30 दिन में देनी होगी परफॉरमेंस गारंटी

रेलवे में प्रोजेक्‍ट डिले होने का एक कारण यह माना गया कि बिडिंग में सफल रहे बिडर को 60 दिन के भीतर परफॉरमेंस गांरटी देनी होती है। इसमें एक दिन डिले होने पर टेंडर डिसचार्ज हो जाता है। लेकिन अब व्‍यवस्‍था की गई है कि बिडर को 30 दिन के भीतर परफॉरमेंस गारंटी देनी होगी। इसके बाद बिडर से 15 फीसदी की दर से ब्‍याज लिया जाएगा। 60 दिन बाद बिडर को एक नोटिस दिया जाएगा और 30 दिन का और समय दिया जाएगा। यदि तब भी बिडर गारंटी नहीं देता तो कॉन्‍ट्रेक्‍स टर्मिनेट कर बिडर की अर्नेस्‍ट मनी फॉरफिट कर दी जाएगी और उस बिडर को दोबारा उस काम के लिए रिटेंडर नहीं करना दिया जाएगा। 

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