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व्यवस्था / संपत्ति का अधिकार मौलिक नहीं, लेकिन अब भी संवैधानिकः हाईकोर्ट

उत्तर प्रदेश में बिना मुआवजा चुकाए लोगों की जमीन लेने पर हाईकोर्ट ने की खिंचाई

Property rights are not fundamental, but still constitutional: High Court
  • लोगों की जमीन बिना किसी कानूनी प्रक्रिया के हथियाने वाले अधिकारियों के खिलाफ हो कार्रवाई।
  • 300A के तहत किसी भी व्यक्ति को कानूनी अथॉरिटी के अलावा कोई उसके जमीन से वंचित नहीं कर सकता।

नई दिल्ली। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने उत्तर प्रदेश सरकार की इस बात के लिए आलोचना की है कि वह बिना किसी अधिग्रहण के और मुआवजा चुकाए लोगों की निजी जमीन ले रही है। न्यायमूर्ति शशिकांत गुप्ता और न्यायमूर्ति पंकज भाटिया की पीठ ने सरकार को याद दिलाया कि संपत्ति का अधिकार भले ही मौलिक अधिकार न रहा हो पर वह अभी भी संवैधानिक और मानवाधिकार है। लाइव लॉ की खबर के मुताबिक कोर्ट ने राज्य के मुख्य सचिव से कहा है वे उन सभी अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई करें जो लोगों कि निजी जमीन बिना किसी उचित कानूनी प्रक्रिया के हथिया रहे हैं। "हमें यह बाध्य होकर इस बात पर अपनी नाराजगी जाहिर करनी पड़ रही है कि लोगों की निजी जमीन बिना किसी अधिग्रहण के या उनको इसके लिए कोई मुआवजा चुकाए ही उनसे ली जा रही है। इस तरह की परिपाटी उचित नहीं है और इसकी कड़े शब्दों में नींदा की जानी चाहिए। राज्य के अधिकारी सड़कों को चौड़ा करने के लिए निजी जमीन को बिना किसी अधिग्रहण और बिना इसके लिए कोई उचित मुआवजा चुकाए अपने कब्जे में ले रहे हैं।


कोर्ट ने कहा, व्यक्ति को कानूनी अथॉरिटी के अलावा कोई उसके जमीन से वंचित नहीं कर सकता


"जमीन का कब्जा लेने से पहले संबंधित प्रावधानों के तहत अधिकारियों को इसके बदले मुआवजा चुकाना चाहिए। किसी भी परिस्थिति में राज्य उचित मुआवजा अधिकार अधिनियम या किसी अन्य कानून का उल्लंघन कर न तो जमीन अधग्रहीत करेगा और न ही उसका कब्जा अपने हाथ में ले सकता है। अधिकारियों का यह कार्य संविधान के अनुच्छेद 14 और 300A का उल्लंघन है। अनुच्छेद 300A के तहत किसी भी व्यक्ति को कानूनी अथॉरिटी के अलावा कोई उसके जमीन से वंचित नहीं कर सकता," कोर्ट ने कहा। "अनुच्छेद 300A में कहा गया है कि सिर्फ़ किसी कार्यपालक आदेश, जिसके पीछे विधायिका द्वारा बनाए गए किसी कानून का कोई अथॉरिटी नहीं है, के द्वारा किसी व्यक्ति को उसकी परिसंपत्ति से बेदखल नहीं किया जा सकता। यद्यपि संपत्ति का अधिकार मौलिक अधिकार नहीं रहा पर यह अभी भी एक संवैधानिक अधिकार है," कोर्ट ने कहा। 


कानूनी प्रक्रिया का पालन कि बिना  जमीन लेने वाले अधिकारियों के खिलाफ हो कार्रवाई- कोर्ट


पीठ ने गायित्री देवी और दो अन्य लोगों की याचिका पर सुनवाई के दौरान यह बात कही। इन लोगों ने दावा किया था कि सरकार ने शीतलपुर गाँव (टिकरी) से गोरापुर (बक्सेडा) सिकंदरा तक लिंक रोड बनाने के उनकी ज़मीन उनसे गैर कानूनी तरीके से ले ली है। सरकार के वकील ने इस बात को माना कि याचिकाकर्ताओं को उनकी जमीन लिए जाने के बदले कोई मुआवजा नहीं दिया गया है। अदालत का ध्यान 12.5.2016 को सरकार द्वारा जारी एक अधिसूचना की ओर खींचा गया जिसमें कहा गया है कि जब कोई जमीन अधिग्रहीत की बात आती है तो इस पर एक समिति गौर करती है जो दो महीने के भीतर यह रिपोर्ट जिला मजिस्ट्रेट को देती है ताकि उस पर उचित कार्रवाई की जा सके। पीठ ने याचिकाकर्ता को निर्देश दिया कि वे इस समिति को एक प्रतिवेदन दें। इसके बाद कोर्ट ने उत्तर प्रदेश के मुख्य सचिव को निर्देश दिया कि बिना मुआवजा चुकाए और किसी कानूनी प्रक्रिया का पालन किए बिना लोगों की ज़मीन लेने वाले अधिकारियों के खिलाफ वे कार्रवाई सुनिश्चित करें। 

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