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    700 मेगावाट बढ़ी हाइड्रो पावर प्‍लांट की कैपेसिटी, लेकिन जनरेशन 30% कम हुआ

     
    नई दिल्‍ली। पिछले एक साल के दौरान देश में हाइड्रो पावर प्‍लांट्स की कैपेसिटी तो बढ़ी है, लेकिन जनरेशन कम हुआ है। जनरेशन पिछले कई सालों से लगातार कम हो रहा है। एक साल के दौरान हाइड्रो पावर कैपेसिटी में 738 मेगावाट का इजाफा हुआ है, जबकि जनरेशन टारगेट के मुकाबले लगभग 30 फीसदी कम हुआ। सेंटल इलेक्ट्रिसिटी अथॉरिटी (सीइए) की ताजा रिपोर्ट में यह आंकड़े सामने आए हैं। एक्‍सपर्ट्स का कहना है कि सरकार को इसे गंभीरता से लेना चाहिए और सभी हाइड्रो प्रोजेक्‍ट्स की समीक्षा की जानी चाहिए।
     
    कितना बढ़ी कैपेसिटी
     
    रिपोर्ट्स के मुताबिक जनवरी 2017 तक देश में हाइड्रो पावर प्‍लांट्स की कैपेसिटी 43539 मेगावाट थी, जबकि पिछले साल 2015-16 तक जनरेशन कैपेसिटी 42801 मेगावाट थी। इस साल जनवरी तक 738 मेगावाट कैपेसिटी बढ़ी है।
     
    कितना हुआ जनरेशन
     
    सीईए रिपोर्ट्स के मुताबिक दिसंबर 2016 में हाइड्रो पावर प्‍लांट्स से जनरेशन का टारगेट 8278 मिलियन यूनिट्स का रखा गया था, लेकिन देश के हाइड्रो प्‍लांट्स ने 6396 मिलियन यूनिट्स ही जनरेशन किया। यानी कि, टारगेट से लगभग 30 फीसदी कम जनरेशन हुआ।
     
    लगातार कम हो रहा है जनरेशन
     
    बांधों और हाइड्रो प्रोजेक्‍ट्स पर काम कर रही संस्‍था साउथ एशिया नेटवर्क ऑन डेम्‍स, रिवर और पीपल (सेंड्रप) ने सीइए के आंकड़ों की पड़ताल करने के बाद जारी रिपोर्ट में कहा है कि हाइड्रो प्‍लांट्स की जनरेशन पिछले कई सालों से लगातार कम हो रही है। हाइड्रो प्‍लांट्स की कैपेसिटी के मुकाबले जनरेशन में काफी कमी हुई है। जनवरी 2017 में हाइड्रो प्‍लांट्स ने कैपेसिटी के मुकाबले 2.77 मिलियन यूनिट्स प्रति मेगावाट जनरेशन किया। जबकि साल 2015-16 में 2.84 मिलियन यूनिट्स प्रति मेगावाट और उससे पहले 2014-15 में 3.16 मिलियन यूनिट्स प्रति मेगावाट था। साल 1994-95 में यह सबसे अधिक 3.97 मिलियन यूनिट्स प्रति यूनिट थी, उसके बाद से जनरेशन कम ही हो रही है।
     
    क्‍या हैं सवाल
     
    सेंड्रप के संयोजक हिमांशु ठक्‍कर ने ‘मनीभास्‍कर’ से कहा कि हर साल हाइड्रो पावर प्‍लांट्स की कैपेसिटी तो बढ़ाई जा रही है, लेकिन ये प्‍लांट्स कैपेसिटी से काफी कम जनरेशन कर रहे हैं, इसकी जानकारी सरकार के पास होने के बावजूद इस ओर ध्‍यान नहीं दिया जा रहा है। जनरेशन कम होने की कई वजह है, सबसे बड़ी वजह यह है कि ये प्‍लांट्स व्‍यावहारिक नहीं हैं। हाइड्रो प्‍लांट्स की यूएसपी है कि वे पीक अवर्स में पावर देते हैं, लेकिन सरकार इसकी मॉनिटरिंग तक नहीं कर रही है। यहां तक कि सरकार के पास डाटा तक नहीं है कि पीक अवर्स में हाइड्रो प्‍लांट्स कितनी पावर जनरेट कर रहे हैं। ठक्‍कर ने सवाल उठाते हुए कहा कि सरकार के पास यह भी बहाना नहीं है कि बारिश न होने के कारण प्‍लांट्स से जनरेशन नहीं किया। पिछले कुछ सालों से बारिश ठीकठाक हो रही है। उन्‍होंने कहा कि ये प्रोजेक्‍ट्स इकोनॉमिक वायबल भी नहीं हैं। हाइड्रो प्रोजेक्‍ट पर 10 करोड़ रुपए प्रति मेगावाट का खर्च आता है, जबकि उसके मुकाबले सोलर और विंड की लागत काफी कम है। इसलिए सरकार हाइड्रो प्रोजेक्‍ट्स की बजाय सोलर व विंड प्रोजेक्‍ट्स पर ध्‍यान देना चाहिए। उन्‍होंने कहा कि इसके अलावा हाइड्रो प्रोजेक्‍ट्स पर्यावरण और स्‍थानीय लोगों के लिए नुकसानदेह हैं, जिस पर किसी का ध्‍यान नहीं है।
     

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