इकोनॉमिक सर्वे में बेसि‍क इनकम पर होगा स्पेशल चैप्टर

डॉ. गई स्‍टेंडि‍ग

Jan 24,2017 08:39:00 PM IST
नई दि‍ल्‍ली। यूनि‍वर्सल बेसि‍क इनकम को लेकर चल रही चर्चा के बीच कुछ ऐसे फैक्ट्स और फाइंडिं‍ग्‍स हैं, जि‍न पर रोशनी पड़ना जरूरी है। इकोनॉमिक सर्वे में बेसिक इनकम पर स्पेशल चैप्टर होने की उम्मीदें भी लगाई जा रही हैं। इस टॉपि‍क पर कि‍सी भी तरह की बहस शुरू करने से पहले हम सभी को वेतन देने के इस कॉन्‍सेप्‍ट को ठीक तरह से समझ लेना चाहि‍ए।
इसका सीधा सा मतलब है देश के हर नागरि‍क यानी बच्‍चे, बूढ़े, जवान, औरत सभी को एक निश्चित बेसिक इनकम दी जाए। इस पर कई बार सवाल उठ चुके हैं और कई बार उनके जवाब दि‍ए जा चुके हैं। सबसे बड़ी चुनौती है इसे लागू करने के लिए एक वाजि‍ब रास्‍ते की तलाश। यह चुनौती थोड़ी व्‍यवहारि‍क और थोड़ी वि‍चारधारा से जुड़ी है। हमें इस पर ठंडे दि‍माग से सोचना होगा।
एक सक्षम समाज के लि‍ए मूलभूत सार्वजनिक सुवि‍धाएं और इससे जुड़े संस्‍थान जरूरी हैं। कुछ लोग इससे सहमत नहीं हैं, मगर कुछ वक्‍त के लि‍ए हमें थोड़ा और प्रैक्‍टि‍कल होना पड़ेगा। हालांकि‍ अच्‍छा होगा कि‍ इस तरह की कोई भी डि‍बेट नेटवर्क फॉर बेसि‍क इनकम (INBI) के मंच पर हो, जो अभी हाल ही में बनाया गया है।
खुशी है कि‍ इस तरह की योजना पर बात चल रही है
कई अखबारों ने मेरा हवाला देते हुए इस तरह का दावा कि‍या है कि‍ सरकार सबको बेसि‍क इनकम देने जा रही है, मगर यह फैक्‍ट सही नहीं है। अभी यह केवल वि‍चार के लेवल पर है। हालांकि‍ 30 सालों से एक इकोनॉमि‍स्‍ट व बेसि‍क इनकम के एडवोकेट होने के नाते मुझे खुशी है कि‍ तरह की योजना पर बात चल रही है और बजट के वक्‍त जो इकोनॉमि‍क सर्वे रि‍पोर्ट पेश होगी उसमें इस पर एक स्‍पेशल चैप्‍टर होगा।
आम आदमी की जिं‍दगी में बड़ा बदलाव आ जाएगा
लेकि‍न इन सबसे पहले हमारे सामने कई सवाल हैं। अगर बेसि‍क इनकम हुई तो वो कि‍तनी होनी चाहि‍ए ? उसे कि‍स तरह से लागू कि‍या जाएगा? क्‍या इसके लि‍ए हमारे पास रुपये का इंतजाम है? यह मामला कुछ हद तक राजनीति‍ से भी जुड़ा है। मगर चलि‍ए मान लेते हैं कि‍ बेसि‍क इनकम मौजूदा कुल सब्सिडी का 50 फीसदी होगी। यह बहुत ज्‍यादा नहीं होगी, मगर हमने पाया है कि‍ इससे आम आदमी की जिं‍दगी में बड़ा बदलाव आ जाएगा।
यह योजना तस्‍वीर बदल सकती है
यूनि‍सेफ और सेवा भारत (SEWA Bharat) के कोऑर्डिनेशन में भारत में हमने तीन पायलट प्रोजेक्‍ट चलाए, जि‍नसे ये साबि‍त होता है कि इस तरह की योजना इकोनॉमी की तस्‍वीर को पूरी तरह से बदल सकती है। बेसि‍क इनकम इकोनॉमि‍क ग्रोथ और डेवलपमेंट को बढ़ावा देगी। अगर मेेरि‍ट और नॉन मेरि‍ट सब्सिडी को खत्‍म कर दि‍या जाए तो हम आसानी से बेसि‍क इनकम प्‍लान लागू कर सकते हैं। नॉन मैरि‍ट सब्सिडी जीडीपी का तकरीबन 8 फीसदी है और मेेरि‍ट सब्सिडी जीडीपी का तकरीबन 6 फीसदी है।
18 माह तक बेसि‍क इनकम दी
हमने जब 2011 में मध्‍यप्रदेश में पायलट प्रोजेक्‍ट शुरू कि‍या तो इसे लागू करना एक चुनौती की तरह दि‍ख रहा था, मगर यह काम उतना कठि‍न नहीं था। आज आधार नंबर की बदौलत यह और आसान होगा। अब जरा प्रोजेक्‍ट पर एक नजर डालें। आठ गांवों के करीब 6000 औरतों, मर्द और बच्‍चों को 18 माह तक बेसि‍क इनकम दी गई। उनमें जो बदलाव आया उसकी तुलना हमने उनके पहले के रहन सहन और आसपास के 12 अन्‍य गांवों से की।
चार बदलाव सामने आए
मोटे तौर पर चार बदलाव नोट कि‍ए गए। पहला रहा, साफ-सफाई, हेल्‍थ, स्‍कूल रजि‍स्‍ट्रेशन वगैरा, जि‍समें काफी सुधार आया। इसका दूसरा सबसे बड़ा फायदा मर्दों की बजाए महि‍लाओं को पहुंचा। वह पहले के मुकाबले ज्‍यादा आत्‍मनि‍र्भर हो गईं। ये बात नोट करने लायक है, क्‍योंकि‍ ज्‍यादातर योजनाएं गांवों में महि‍लाओं और पुरुषों के बीच असमानता को कम करने में नाकाम रही हैं।
बेसि‍क इनकम से वहां की इकोनॉमि‍क एक्‍टीवि‍टी और बढ़ गई, लोग और काम करने लगे। खासतौर पर महि‍लाओं की कमाई और बढ़ गई। हालांकि‍ कुछ लोगों का कहना था कि‍ इससे इकोनॉमि‍क एक्‍टीवि‍टी घटेगी मगर नतीजे इसके उलट रहे। इसकी बदौलत जो चौथा खास बदलाव नजर आया वो ये था कि‍ लोग खुद को पहले के मुबाकले ज्‍यादा आत्‍मनि‍र्भर महसूस कर रहे थे।
बेसि‍क इनकम ने लोगों को आजादी दी
बेसि‍क इनकम ने लोगों को ये तय करने की आजादी दी कि‍ उन्‍हें कैसे जीना है। इस तरह की योजना शुरू होने के बाद कुछ लोगों और उनके परि‍वारों ने बंधुआ मजदूरी बंद कर दी और कई महि‍लाओं ने पुरानी प्रथाओं का वि‍रोध भी कि‍या। कुल मि‍लाकर देखा जाए तो बेसि‍क इनकम की बदौलत आजादी, आर्थि‍क तरक्‍की व कल्‍याण सहि‍त वो फायदे मि‍लते हैं जो मौजूदा योजनाओं के जरि‍ए मुमकि‍न नहीं हैं। आज 2017 में हमारे पास जनधन एकाउंट, आधार और मोबाइल मनी है, जि‍ससे बेसि‍क इनकम स्‍कीम शुरू करना और आसान हो गया है। इस योजना को लागू करने के लि‍ए हि‍म्‍मत चाहि‍ए मगर यकीनन यह दशा और दि‍शा बदलने वाली साबि‍त होगी।
डॉ. गई स्‍टेंडि‍ग, यूनि‍वर्सि‍टी ऑफ लंदन के स्‍कूल ऑफ ओरि‍एंट एंड अफ्रीकन स्‍टडीज में प्रोफेसरल रि‍सर्च एसोसि‍एट और बेसि‍क इनकम अर्थ नेटवर्क के को-प्रेसि‍डेंट हैं।
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