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37 हजार MW के प्‍लांट पड़े हैं ठप, पावर सेक्‍टर एक और क्राइसिस की ओर

एनपीए की समस्‍या से जूझ रहे पावर सेक्‍टर के समक्ष एक और क्राइसिस खड़ा हो गया है।

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नई दिल्‍ली. एनपीए की समस्‍या से जूझ रहे पावर सेक्‍टर के समक्ष एक और क्राइसिस खड़ा हो गया है। लगभग 37 हजार मेगावाट कैपेसिटी के पावर प्‍लांट्स बंद पड़े हैं। कई प्‍लांट कोयले या गैस की कमी के कारण बंद पड़े हैं तो कई प्‍लांट्स से डिस्‍कॉम्‍स बिजली नहीं खरीद रहे हैं। इससे पावर कंपनियों की फाइनेंशियल क्राइसिस का सामना करना पड़ रहा है। बृहस्‍पतिवार को राज्‍यों के साथ हुई बैठक में भी यह मुद्दा छाया रहा। पावर मिनिस्‍टर आरके सिंह ने राज्‍यों से स्‍पष्‍ट तौर पर कहा कि वे पावर परचेज एग्रीमेंट की अनुपालना करें और कंपनियों से बिजली खरीदें। वहीं,  एक्‍सपर्ट्स का कहना है कि इस समस्‍या का सही हल नहीं ढूंढ़ा जा रहा है। 

 

ये प्‍लांट हैं बंद 
सेंट्रल इलेक्ट्रिसिटी अथॉरिटी (सीईए) की रिपोर्ट के मुताबिक कोल से चलने वाले लगभग 19859 मेगावाट क्षमता के प्‍लांट्स बंद पड़े हैं। जबकि गैस से चलने वाले 13007 मेगावाट क्षमता के प्‍लांट्स बंद पड़े हैं। इसी तरह, लगभग 4889 मेगावाट क्षमता के हाइड्रो प्‍लांट्स बंद पड़े हैं। 

 

क्‍या हैं कारण 
प्‍लांट बंद होने का एक बड़ा कारण फ्यूल शॉर्टेज है। पावर प्‍लांट्स को कोयला और गैस नहीं मिल रही है। जबकि कई ऐसे प्‍लांट्स भी हैं, जिनके साथ डिस्‍कॉम्‍स (बिजली वितरण कंपनियां) या तो पावर परचेज एग्रीमेंट (पीपीए) नहीं कर रही हैं या पहले से किया गया पीपीए खत्‍म कर दिया है।  

 

4 लाख करोड़ के एनपीए का खतरा 
हाल ही में जारी रिसर्च फर्म क्रिसिल की रिपोर्ट बताती है कि पावर सेक्‍टर को दिया गया लगभग 4 लाख करोड़ रुपए का कर्जा एनपीए हो सकता है। रिपोर्ट बताती है कि लगभग 23000 मेगावाट के पावर प्लांट अंडर कंस्ट्रक्शन हैं। जो अगले 5 साल में ऑनलाइन हो जाएंगे, लेकिन हालात नहीं सुधरे तो ये प्लांट भी प्रोडक्शन शुरू नहीं कर पाएंगे और लगभग 1 लाख 30 हजार करोड़ रुपये का इन्वेस्टमेंट प्रभावित होगा। जो एनपीए की राशि को और अधिक बढ़ा देगा।

 

बैठक में हुई चर्चा 
बृहस्‍पतिवार को सेंट्रल पावर मिनिस्‍टर आरके सिंह ने राज्‍यों के पावर मिनिस्‍टर्स के साथ बैठक की। बैठक में यह मुद्दा छाया रहा। सिंह ने नाराजगी जताते हुए कहा कि राज्‍यों की डिस्‍कॉम्‍स डिमांड होने के बावजूद बिजली नहीं खरीद रही हैं। न तो पावर परचेज एग्रीमेंट हो रहे हैं और ना ही पुराने पावर परचेज एग्रीमेंट के मुताबिक बिजली खरीदी जा रही है। सिंह ने राज्‍यों से कहा कि वे हर हालात में पीपीए की पालना करें और कंपनियों से बिजली खरीदें। 

 

सही दिशा पर नहीं चल रही सरकार 
उत्‍तर प्रदेश के पावर डिपार्टमेंट में चीफ इंजीनियर रह चुके शैलेंद्र दूबे ने moneybhaskar.com से कहा कि यह सही है कि डिस्‍कॉम्‍स पावर नहीं खरीद रही है, लेकिन इसके लिए डिस्‍कॉम्‍स पर यह दबाव नहीं बनाया जाना चाहिए कि वे प्राइवेट सेक्‍टर से महंगी बिजली खरीदें। दरअसल, डिस्‍कॉम्‍स और सरकार को चाहिए कि सस्‍ती व अच्‍छी क्‍वालिटी की बिजली खरीदें।

 

वहीं, पावर पॉलिसी एनालिस्‍ट शंकर शर्मा ने moneybhaskar.com से कहा कि जब पूरी दुनिया बिजली बनाने के लिए कोयले का इस्‍तेमाल बंद कर रही है, भारत में कोयले का इस्‍तेमाल बढ़ाया जा रहा है। सरकार को रिन्‍यूएबल एनर्जी सेक्‍टर को बढ़ावा देना चाहिए, क्‍योंकि कोयले से बिजली बनाना महंगा होता जा रहा है, बल्कि कोयले से होने वाले नुकसान का भी इकोनॉमी पर असर दिखेगा। 

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