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खास खबर : क्‍या रोड इंफ्रास्‍ट्रक्‍चर से बदलेगी भारत की इकोनॉमी ?

नई दिल्‍ली। "हमें इंफ्रास्‍ट्रक्‍चर को एक इकोनॉमिक स्टिम्‍युलेंट (उत्‍तेजना) के तौर पर सोचना बंद करना होगा और इसके बारे में एक रणनीति के तौर पर सोचना होगा। आर्थिक उत्‍तेजना पुल बनाने का काम नहीं करता, जबकि इंफ्रास्‍ट्रक्‍चर में रणनीतिक इन्‍वेस्‍टमेंट लॉन्‍ग टर्म ग्रोथ के लिए फाउंडेशन का काम करता है''। - रॉजर मैकनेमी


रॉजर मैकनेमी, अमेरिकी बिजनेस मैन, इन्‍वेस्‍टर, वेंचर कैपटलिस्‍टी हैं। रॉजर के इस वाक्‍य को इकोनॉमिक सर्वे 2017-18 के इंडस्‍ट्री और इंफ्रास्‍ट्रक्‍चर चैप्‍टर को शीर्ष पर लिखा गया है। मोदी सरकार भी जानती है कि देश के विकास के लिए इंफ्रास्‍ट्रक्‍चर का डेवलप होना बेहद जरूरी है। इसलिए इस दिशा में सरकार काम भी कर रही है। इंफ्रास्‍ट्रक्‍चर का बड़ा भाग रोड एंड ट्रांसपोर्ट पर निर्भर करता है। सरकार ने अपने कार्यकाल के आखिरी फाइनेंशियल ईयर में रोड इंफ्रास्‍ट्रक्‍चर को डेवलप करने के लिए विशेष प्रयास किए हैं।

 

क्‍या होगा इस साल 
रोड एंड ट्रांसपोर्ट मिनिस्‍ट्री ने साल 2018-19 के दौरान करीब 20,000 किलोमीटर लंबे नेशनल हाईवे का वर्क अवार्ड और 16,420 किमी कंस्ट्रक्‍शन टारगेट रखा गया है, जबकि 2017-18 के दौरान 9829 किलोमीटर लंबी राष्ट्रीय राजमार्गों का कंस्‍ट्रक्‍शन किया गया।  गडकरी ने कहा कि रोजाना 45 किलोमीटर लंबी सड़क बनाई जाएगी, जो कि पिछले साल (2017-18) में 27 किलोमीटर रोजाना था।

 

कैसे पड़ेगा जीडीपी पर असर 
रिपोर्ट्स बताती हैं कि भारत की जीडीपी में रोड एवं ट्रांसपोर्ट सेक्‍टर 5 फीसदी योगदान देता है। इसकी वजह यह है कि भारत में लगभग 86 फीसदी पैसेंजर और लगभग 60 फीसदी फ्रेट ट्रैफिक रोड पर निर्भर करता है, जो चीन, रूस और अमेरिका के मुकाबले अधिक है। यही वजह है कि भारत में मोटर व्‍हीकल की संख्‍या तेजी से बढ़ रही है। 

 

कितने इन्‍वेस्‍टमेंट की जरूरत 
इकोनॉमिक सर्वे 2017-18 के मुताबिक, देश के विकास में अहम भूमिका अदा करने वाले इंफ्रास्‍ट्रक्‍चर सेक्‍टर में निवेश की बहुत जरूरत है। रिपोर्ट के मुताबिक, इंफ्रास्‍ट्रक्‍चर के डेवलपमेंट के लिए भारत को 2040 तक लगभग 4.5 ट्रिलियन अमेरिकी डॉलर इन्‍वेस्‍टमेंट की जरूरत है। जबकि मौजूदा हालात को देखते हुए भारत लगभग 3.9 ट्रिलियन अमेरिकी डॉलर तक निवेश कर सकता है।

 

लॉजिस्टिक में हो रहा है सुधार 
प्रमुख इंफ्रास्‍ट्रक्‍चर सर्विस कंपनी फीडबैक इंफ्रा के हेड कॉरपोरेट अफेयर्स हर्ष श्रीवास्‍तव ने कहा कि भारत में दोड इंफ्रास्‍ट्रक्‍चर के इकोनॉमी को प्रभावित करने का बड़ा कारण यह है कि फ्रेट ट्रैफिक की रोड पर डिपेंडेंसी बहुत अधिक है। बावजूद इसके, भारत की सड़कों की हालत अच्‍छी नहीं है, जिसकारण सामान का समय पर न पहुंचना, माल भाड़ा काफी अधिक होना और टूटी सड़कों के कारण सामान के टूटने या खराब होने की शिकायतें रहती हैं।

 

वर्तमान सरकार ने इस ओर ध्‍यान दिया है। यही वजह है कि वर्ल्ड बैंक की लॉजिस्टिक परफॉरमेंस इंडेक्‍स (एलपीआई)  रैंकिंग में भारत की स्थिति सुधर रही है। ओवरऑल एलपीआई रैंकिंग में भारत की रैंकिंग 2014 में 54 थी, जो 2016 में 35 तक पहुंच गई। इसी तरह क्‍वालिटी ऑफ ट्रांसपोर्ट इंफ्रास्‍ट्रक्‍चर में सुधार हुआ है। 2007 में भारत की रेंकिंग 42 थी, जो 2014 में 58 तक पहुंच गई, लेकिन 2016 में यह रेंकिंग 36 हो गई। 


इम्‍प्‍लॉयमेंट पर दिखेगा असर 
साल 2018-19 में सरकार ने 20 हजार किलोमीटर नए हाईवे बनाने का टारगेट रखा है, जबकि 16420 किलोमीटर हाईवे कंस्‍ट्रक्‍शन का टारगेट है। रोड एंड ट्रांसपोर्ट मिनिस्‍टर नितिन गडकरी का कहना है कि रोड सेक्‍टर में जॉब क्रिएशन की बहुत संभावनाएं हैं। उन्‍होंने कहा कि उनका टारगेट है कि जब हम पांच साल पूरा करें तो हम लगभग 5 करोड़ जॉब्स डायरेक्‍ट और इनडायरेक्‍ट पैदा करे। अगर रोड सेक्‍टर में 1 लाख करोड़ रुपए का इन्‍वेस्‍टमेंट होता है, जिसका सीधा मतलब है कि 10 लाख लोगों को डायरेक्‍ट इम्‍प्‍लॉयमेंट मिला है। गौरतलब है कि आगामी चुनावों में इम्‍प्‍लॉयमेंट एक बड़ा मुद्दा बन सकता है, इस दृष्टि से रोड सेक्‍टर एक महत्‍वपूर्ण रोल अदा कर सकता है। 

 

ये हैं चुनौतियां 
रोड सेक्‍टर तीन बड़ी चुनौतियों से जूझ रहा है। 
1. रोड सेक्‍टर में प्राइवेट इन्‍वेस्‍टमेंट का न बढ़ना एक चुनौती बना हुआ है। रोड एंड ट्रासपोर्ट एक्‍सपर्ट नितिन झंवर के मुताबिक, सरकार कोई ऐसी पॉलिसी नहीं बना पा रही है, जिससे प्राइवेट सेक्‍टर का भरोसा बढ़े। 
2. बढ़ता एनपीए : इकोनॉमिक सर्वे 2017-18 के मुताबिक साल 2012-13 के दौरान सेक्‍टर में 1.27 लाख करोड़ का क्रेडिट एडवांस था, जो सितंबर 2017 तक बढ़ कर 1.80 लाख करोड़ हो गया, जबकि टोटल एडवांस पर एनपीए 1.9 फीसदी से बढ़कर 20.3 फीसदी हो गया। 
3.  प्रोजेक्‍ट में देरी : रिपोर्ट के मुताबिक नेशनल हाईवे के कई प्रोजेक्‍ट डिले हैं, जिसका कारण लैंड एक्विजेशन, यूटिलिटी शिफ्टिंग, कॉन्‍ट्रैक्‍टर्स का खराब परफॉरमेंस, क्‍लीयरेंस, लोगों का प्रदर्शन, अदालती विवाद आदि प्रमुख हैं। 

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