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खास खबर-3.34 लाख MW क्षमता, डिमांड 1.58 लाख MW, फिर भी नहीं मिलती 24 घंटे बिजली

भारत शायद इकलौता ऐसा देश है, जहां मांग के मुकाबले लगभग दोगुना ज्‍यादा बिजली बनती है।

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नई दिल्‍ली। भारत शायद इकलौता ऐसा देश है, जहां मांग के मुकाबले लगभग दोगुना ज्‍यादा बिजली बनाने की क्षमता है। बावजूद इसके, पूरे देश को 24 घंटे बिजली मिलना तो दूर,  ज्‍यादातर इलाकों में औसत 12 घंटे बिजली भी नहीं आती है। । इससे जहां खेती-किसानी तो प्रभावित होती ही है, बल्कि छोटे शहरों में इंडस्‍ट्री तक नहीं पनप पा रही है। बड़े शहरों की ओर पलायन का एक बड़ा कारण बिजली की कमी को माना जाता है। यह हालात तब हैं, जब दोगुना बिजली उपलब्‍ध है। बिजली न मिलने के कारण कई कारण हैं। जिसके लिए सिस्‍टम तो दोषी है ही, लोग भी कम दोषी नहीं हैं। बिजली चोरी, बिल न देने की आदत के कारण ईमानदार उपभोक्‍ताओं के लिए बिजली महंगी होती जा रही है। 

 

कितनी है डिमांड और जनरेशन? 
भारत की पावर जनरेशन कैपेसिटी 3 लाख 34 हजार मेगावाट से अधिक है, जबकि बिजली की डिमांड लगभग 1 लाख 58 हजार है। बावजूद इसके, कई इलाकों में बिजली संकट है। नेशनल लोड डिस्‍पेच सेंटर की रिपोर्ट के मुताबिक, 4 मार्च को दिन भर में लगभग 13.2 मिलियन यूनिट बिजली की कटौती हुई।  इसे सीधे शब्‍दों में कहें तो दोगुना अधिक पैदा होने के बावजूद देश के कई इलाकों में घंटों बिजली कटौती हो रही है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सत्‍ता संभालने के बाद साल 2019 तक सबको 24 घंटे बिजली देने का वादा किया था। इसके लिए मोदी सरकार ने कई बड़े कदम भी उठाए, लेकिन लगभग पौने चार साल बीतने के बाद भी अब तक कोई खास परिणाम देखने को नहीं मिल रहे हैं।  

 

कितना है पीएलएफ? 
सेंट्रल इलेक्ट्रिसिटी अथॉरिटी (सीईए) की रिपोर्ट्स बताती हैं कि देश के पावर प्‍लांट्स का प्‍लांट लोड फैक्‍टर (पीएलएफ) 60 फीसदी के आसपास रहता है। एक पावर प्‍लांट कैपेसिटी के मुकाबले कितनी पावर जनरेट करता है, उसे  प्‍लांट लोड फैक्‍टर कहा जाता है। सीईए के डाटा के मुताबिक जनवरी 2018 का पीएलएफ 62.47 फीसदी रहा। यानी कि पावर प्‍लांट्स ने अपनी कैपेसिटी के मुकाबले लगभग 38 फीसदी कम पावर जनेरशन किया। 

 

डिस्‍कॉम्‍स नहीं खरीदती बिजली 
कैपेसिटी के मुकाबले पावर जनरेशन कम होने की कई वजह हैं, लेकिन एक बड़ी वजह यह है कि डिस्‍कॉम्‍स (बिजली वितरण कंपनियां) बिजली खरीद ही नहीं रही हैं। एक तो कर्ज और नुकसान झेल रही डिस्‍कॉम्‍स के पास बिजली खरीदने के लिए पैसा नहीं है और दूसरा, प्राइवेट सेक्‍टर की पावर जनरेशन कंपनियों के रेट अधिक होने के कारण डिस्‍कॉम्‍स उनके साथ किए गए पावर परचेज एग्रीमेंट (पीपीए) की पालना तक नहीं कर रहे हैं। 

 

नहीं कारगर साबित हुआ उदय?
डिस्‍कॉम्‍स को कर्ज और लॉस से मुक्ति दिलाने के लिए मोदी सरकार ने 20 नवंबर 2015 को उज्‍जवल डिस्‍कॉम्‍स एश्‍योरेंस योजना (उदय) की शुरुआत की थी। लेकिन अब तक इसका असर नहीं दिखा है। डिस्‍कॉम्‍स की माली हालत जस की तस है। क्रिसिल इंफ्रास्‍ट्रक्‍चर एडवाइजरी के सीनियर डायरेक्‍टर विवेक शर्मा ने कहा कि डिस्‍कॉम्‍स को लॉस का सबसे बड़ा कारण ट्रांसमिशन एंड डिस्ट्रिब्‍यूशन (टीएंडडी) लॉस है, लेकिन अब तक ज्‍यादातर राज्‍यों में टीएंडडी लॉस कम नहीं हुआ है। क्‍योंकि वजह है कि डिस्‍कॉम्‍स की इंस्टिट्यूशनल कैपेसिटी पर्याप्‍त नहीं है, दूसरा राजनीतिक हस्‍तक्षेप के कारण बिजली चोरी पर अंकुश नहीं लग पाता। कई इलाकों में डिस्‍कॉम्‍स बिजली का बिल तक नहीं वसूल पा रही हैं। लॉस कम करने के लिए राज्‍यों के पास फंड तक नहीं हैं। इस कारण उदय का असर नहीं दिख पा रहा है। 

 

आगे पढ़ें : यह भी है वजह 

 

 

 

ट्रांसमिशन की कमी 
एनडीए सरकार और उससे पहले यूपीए सरकार ने जिस तरह पावर जनरेशन बढ़ाने के लिए पावर प्‍लांट्स लगाने पर फोकस किया, लेकिन उसी तरह ट्रांसमिशन कैपेसिटी बढ़ाने की ओर फोकस नहीं किया गया। इसका अंदाजा इससे लगाया जा सकता है कि जहां जनवरी 2017 में देश में 1506 सर्किट किलोमीटर ट्रांसमिशन लाइन बिछाई गई। वहीं जनवरी 2018 में केवल 811 किमी लाइन बिछाई गई। अगर कैपेसिटी की बात करें तो जनवरी 2018 में केवल 2100 एमवीए ट्रांसमिशन कैपेसिटी एडिशन किया गया, जबकि पिछले साल जनवरी में 7250 एमवीए कैपेसिटी एडशिन किया गया। 
 

कोयले-गैस की कमी 
दिलचस्‍प बात यह है कि जिन पावर स्‍टेशन से डिस्‍कॉम्‍स पावर परचेज एग्रीमेंट के तहत बिजली खरीदने को तैयार हैं तो उन पावर प्‍लांट्स में कोयले या गैस की कमी के कारण बिजली बन ही नहीं रही है। हाल के आंकड़े बताते हैं कि गैस की कमी के कारण गैस से चलने वाले पावर प्‍लांट्स का लगभग 22 फीसदी ही बिजली पैदा कर पा रहे हैं। जबकि कोयले की कमी के कारण 50 से अधिक थर्मल यूनिट बंद पड़ी हैं। कोयला मंत्रालय का कहना है कि कोयला थर्मल यूनिट तक पहुंच नहीं पा रहा है, क्‍योंकि रेलवे रैक उपलब्‍ध नहीं हैं। 

 

सरकार ने उठाया कदम 
देश में कोयले से चलने वाले पावर प्‍लांट्स की कैपेसिटी लगभग 1 लाख 93 हजार है। जो लगभग 70 फीसदी है। इसलिए कोयले की कमी को दूर करने के लिए सरकार ने पिछले दिनों एक बड़ा कदम उठाया है। कैबिनेट ने प्राइवेट सेक्‍टर को यह इजाजत दे दी है कि वे अपनी खानों से निकलने वाले कोयला किसी को भी बेच सकते हैं। इससे पहले तक प्राइवेट सेक्‍टर अपनी खान से निकलने वाले कोयले को केवल अपने ही पावर प्‍लांट्स में इस्‍तेमाल कर सकता था। लेकिन सरकार के नए फैसले से पावर प्‍लांट्स में कोयले की कमी काफी हद तक दूर हो जाएगी, जिससे पावर जनरेशन बढ़ेगा और बिजली सस्‍ती होगी। पीडब्‍ल्‍यूसी के पार्टनर एवं लीडर (एनर्जी, यूटिलिटी एवं माइनिंग) कामेश्‍वर राव ने कहा कि फ्यूल सप्‍लाई न होने के कारण कई पावर प्रोजेक्‍ट्स अटके हुए हैं, लेकिन कॉमर्शियल कोल सप्‍लाई के बाद ये प्रोजेक्‍ट्स के रिवाइव होने के चांस हैं। 

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