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खास खबर: रेलवे को पहली बार मिलेगा डेडिकेटेड फ्रेट कॉरिडोर, इकोनॉमी के लिए बन सकता है गेमचेंजर


नई दिल्‍ली। देश में माल ढुलाई के लिए रेलगाड़ी का अलग ट्रैक का सपना हकीकत बनने जा रहा है। नवंबर में दिल्‍ली-मुंबई और पंजाब-हावड़ा डेडिकेटेड फ्रेट कॉरिडोर का पहला चरण शुरू हो जाएगा। इस फ्रेट कॉरिडोर की सफलता देश की इकोनॉमी और रेलवे की कमाई के लिए मील का पत्‍थर साबित हो सकती है। इससे न केवल ट्रांसपोर्टेशन कॉस्‍ट घटेगी, बल्कि पैसेंजर और माल गाड़ि‍यों की एवरेज स्‍पीड बढ़ जाएगी। इसका फायदा आम आदमी और इंडस्‍ट्री को मिलेगा। 

 

क्‍या है फ्रेट कॉरिडोर 

लगभग 10 साल पहले रेलवे ने अपना फ्रेट रेवेन्‍यू बढ़ाने और पटरियों पर ट्रैफिक कम करने के लिए एक ऐसा कॉरिडोर बनाने की योजना बनाई थी, जिस पर केवल माल गाड़ी चलें। इसके लिए रेलवे ने एक अलग एसपीवी का गठन किया, जिसे डेडिकेटेड फ्रेड कॉरिडोर कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया कहा गया। इस कॉरपोरेशन ने लगभग चार साल बाद 2010 से दिल्‍ली-मुंबई और पंजाब हावड़ा डेडिकेटेड फ्रेट कॉरिडोर का कंस्‍ट्रक्‍शन शुरू किया। तय किया गया कि इस डेडिकेटेड फ्रेट कॉरिडोर (डीएफसी) पर माल गाड़ि‍यों की अधिकतम रफ्तार 100 किलोमीटर प्रति घंटा होगी, जो कि अभी 75 किलोमीटर प्रति घंटा है। हालांकि भारतीय रेल नेटवर्क पर गाड़ि‍यों की औसत रफ्तार 23.8 किमी प्रति घंटा है। 

 

मोदी सरकार ने बढ़ाई रफ्तार 
चार साल की देरी से साल 2010 में दोनों डीएफसी का काम तो शुरू हो गया, लेकिन लेकिन बीच में बाधाएं आती रहीं। साल 2014 में जब एनडीए की सरकार बनी तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अटके हुए इंफ्रास्‍ट्रक्‍चर प्रोजेक्‍ट्स की निगरानी खुद शुरू की। डीएफसी प्रोजेक्‍ट अटकने का बड़ा कारण भूमि अधिग्रहण था, लेकिन वर्तमान सरकार द्वारा भूमि अधिग्रहण कानून में बदलाव के बाद इसमें काफी तेजी आई और लगभग 4 साल बाद इन दोनों कॉरिडोर के पहले चरण का काम पूरा होने वाला है। सरकार का दावा है कि दूसरा चरण 2019 में पूरा हो जाएगा, जबकि पूरा प्रोजेक्‍ट 2020 तक पूरा हो जाएगा। 

 

समय और लागत में होगा सुधार 
ग्‍लोबल कंसलटिंग फर्म अर्न्स्‍ट एंड यंग, इंडिया के पार्टनर एंड इंडस्‍ट्री लीडर (इंफ्रास्‍ट्रक्‍चर) कुलजीत सिंह ने moneybhaskar.com से कहा कि भारत में लगभग 60 फीसदी माल ढुलाई सड़क से की जाती है, जो महंगी भी होती है और माल पहुंचने में देरी भी होती है, लेकिन डेडिकेटेड फ्रेट कॉरिडोर बनने के बाद इसमें खासा सुधार होगा। उन्‍होंने कहा कि लॉजिस्टिक कॉस्‍ट में कमी होने का फायदा इंडस्‍ट्री के साथ-साथ कंज्‍यूमर को भी मिलेगा। वहीं, इस तरह का कॉरिडोर बढ़ने के बाद पैसेंजर रूट पर ट्रैफिक का दबाव कम होगा और पैसेंजर ट्रेनों की भी स्‍पीड बढ़ेगी। उन्‍होंने कहा कि सड़क से माल ढुलाई रेलवे की अपेक्षा महंगी होती है, लेकिन वर्तमान में भारत में रेलवे से की जा रही माल ढुलाई भी दुनिया में सबसे महंगी है। 

 

 

क्‍या है चुनौती 
कुलजीत सिंह के अनुसार, भूमि अधिग्रहण और कॉन्‍ट्रैक्‍ट अवार्ड की प्रक्रिया जटिल होने के कारण यह प्रोजेक्‍ट काफी डिले हुआ। पूरा प्रोजेक्‍ट 2016 से पहले बन जाना चाहिए था, अब भी केवल पहला चरण ही शुरू हो रहा है, जिसका पूरा असर देखने को नहीं मिलेगा। लेकिन भूमि अधिग्रहण की प्रक्रिया लगभग पूरी हो चुकी है, इसलिए उम्‍मीद की जानी चाहिए कि अब पूरा प्रोजेक्‍ट 2020 तक पूरा हो जाएगा, जो देश की इकोनॉमी के लिए गेम चेंजर साबित हो सकता है। 

 

इकोनॉमी के लिए जरूरी लॉजिस्टिक सेक्‍टर 
देश की इकोनॉमिक ग्रोथ में लॉजिस्टिक सेक्‍टर एक महत्‍वपूर्ण भूमिका निभाता है, जो सामान को एक से दूसरी जगह, यहां तक कि दूसरे देशों तक पहुंचाता है। रिसर्च एजेंसी आईसीआरए की एक रिपोर्ट के मुताबिक, भारत में अभी लॉजिस्टिक सेक्‍टर और सप्‍लाई चेन मैनेजमेंट परिपक्‍व नहीं है, जिससे देश की प्रमुख इंडस्‍ट्री जैसे ऑटोमोबाइल, फार्मा, कंज्‍यूमर ड्यूरेबल, एफएमसीजी, ई-कॉमर्स आदि की ग्रोथ पर असर पड़ रहा है। आईसीआरए के मुताबिक, भारत में लगभग 60 फीसदी गुड्स का ट्रांसपोर्ट रोड से होता है। जिससे सामान पहुंचने में न केवल देरी होती है, बल्कि फ्रेट कॉस्‍ट भी अधिक होती है। 

 

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