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GST एक सालः ‘वन टैक्स-वन नेशन’ लागू, जानिए कहां हिट हुआ तो कहां Miss

टैक्स में बढ़ोत्तरी, ईज ऑफ डूइंग, वन नेशन-वन टैक्स, आसान कंप्लायंस जैसे तमाम दावे पूरे अभी तक पूरे नहीं हो सके हैं।

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नई दिल्ली. ठीक एक साल पहले 1 जुलाई, 2017 को देश के सबसे बड़े टैक्स रिफॉर्म जीएसटी के लागू होने के बाद नीति आयोग के सदस्य विवेक देबरॉय ने कहा था, ‘भारत आदर्श जीएसटी स्ट्रक्चर से अभी काफी दूर है और ऐसा रातोंरात नहीं हो सकता।’ हालांकि ऐसा एक साल बाद भी होता नहीं दिख रहा है। जीएसटी लागू होने के समय किए गए टैक्स में बढ़ोत्तरी, ईज ऑफ डूइंग, वन नेशन-वन टैक्स, आसान कंप्लायंस जैसे तमाम दावे पूरे नहीं हो सके हैं। टैक्स स्ट्रक्चर में अभी तक बदलाव की बात हो रही है। पेट्रोल और डीजल जैसे कुछ आइटम जीएसटी से बाहर हैं। हालांकि टैक्सपेयर्स बेस जरूर लगभग दोगुना हो गया है। कुल मिलाकर कह सकते हैं कि एक आदर्श जीएसटी रेजीम लागू होने में अभी लंबा सफर तय करना होगा। मनीभास्कर अपनी रिपोर्ट में बता रहा है कि जीएसटी से अभी तक क्या हासिल हुआ और क्या हासिल किया जाना बाकी है…

 

 

सरकार के सलाहकार भी उठा रहे सवाल

हाल में GST, इंटेलिजेंस के डीजी जॉन जोसफ ने जीएसटी की चोरी का मामला उठाया था। उन्होंने कहा था कि अभी तक GST में रजिस्‍टर्ड 1.11 करोड़ से अधिक कारोबारियों में से केवल 1 फीसदी कारोबारी 80 फीसदी टैक्‍स का भुगतान करते हैं।

उन्होंने कहा कि छोटे कारोबारी तो जीएसटी रिटर्न दाखिल करते समय गलतियां कर ही रहे हैं, बल्कि बहुराष्ट्रीय कंपनियों और बड़े कॉरपोरेट भी गलती कर रहे हैं। ऐसे में यह स्‍टडी करना बेहद जरूरी है कि सिस्‍टम में कहां खामी है।

   

#जीएसटी से क्या हुआ हासिल

 

1.बढ़ रहा है टैक्स कलेक्शन

व्यापक तौर पर टैक्स कलेक्शन पर गौर करें तो यह आंकड़ा उत्साहज है। मार्च तक 8 महीनों में एवरेज जीएसटी कलेक्शन प्रति महीने 89 हजार करोड़ रुपए से ज्यादा रहा है। सीए नीतू गुप्ता ने कहा कि बीच में कुछ महीने में टैक्स कलेक्शन गिरा, लेकिन मार्च में इसने 1 लाख करोड़ रुपए का आंकड़ा भी क्रॉस किया।

जापानी ब्रोकरेज फर्म नॉमुरा के मुताबिक, एवरेज टैक्स कलेक्शन के आंकड़े बेहतर रहे हैं। ऐसा लगता है कि वित्त वर्ष 19 में टैक्स कलेक्शन सरकार के 7.4 लाख करोड़ का टारगेट से आगे निकल सकता है।

 

किस महीने कितना मिला जीएसटी

अगस्त         94,063 करोड़ रु

सितंबर         92,000 करोड़ रु

अक्टूबर         83,000 करोड़ रु

नवंबर         80,808 करोड़ रु

दिसंबर        86,703 करोड़ रु

जनवरी         86,318 करोड़ रु

फरवरी         85,174 करोड़ रु

मार्च             95,000 करोड़ रु

अप्रैल            1.02 लाख करोड़  

मई             94,016 करोड़ रु

 

 

2.वन टैक्स, वन नेशन

वर्तमान में देश के अलग-अलग हिस्से में कोई भी सामान खरीदने पर एक समान टैक्स देना पड़ता है। जीएसटी ने प्रोडक्शन, सप्लाई चेन, स्टोरेज सहित पूरे प्रोडक्शन सिस्टम को दुरुस्त करके बिजनेसेस के लिए ज्यादा कुशल बनने का रास्ता साफ हुआ है। हालांकि पहले कारोबारियों को राज्यों में अलग-अलग लगने वाले टैक्स ध्यान में रखने होते थे।

 

 

3.सिंगल मार्केट

अब राज्यों की सीमाओं पर चेकपोस्ट्स पर लगने वाली ट्रकों की लंबी-लंबी लाइनें खत्म हो गईं, जिसके साथ ही पूरा देश सिंगल मार्केट के तौर पर नजर आने लगा। ऐसी ही दिक्कतों के कारण लॉजिस्टिक सेक्टर के लिए ट्रांसपोर्टेशन की कॉस्ट बढ़ती थी और उन्हें देरी का सामना करना पड़ा था।  

कन्फेडरेशन ऑफ ऑल इंडिया ट्रेडर्स (सीएआईटी) के जनरल सेक्रेटरी प्रवीण खंडेलवाल ने कहा कि जीएसटी के आने के बाद अब तमाम टैक्स भी खत्म हो गए है, जिससे रिटर्न के लिए डिपार्टमेंट के चक्कर नहीं लगाने पड़ते। दुकानदार अपनी दुकान में ही बैठकर रिटर्न फाइल कर सकता है।

 

4.बढ़ा टैक्स बेस

जैसी उम्मीद थी, जीएसटी से इकोनॉमी के फॉर्मलाइजेशन को बढ़ावा मिला है। ट्रांसपरेंट डिजिटल प्रोसेस से टैक्स चोरी रोकने में काफी हद तक मदद मिली है। जीएसटी के तहत रजिस्ट्रेशन 1 करोड़ से पार हो चुके हैं, जो इस बात का संकेत है कि जीएसटी के दौरान कारोबार तेजी से बढ़ रहा है। ईपीएफओ सब्सक्राइबर बेस भी बढ़ा है। ज्यादा लोगों के इनकम टैक्स रिटर्न भरने के लिए जीएसटी भी एक वजह है। जीएसटी से पहले इनडायरेक्ट टैक्स रेजीम में रजिस्टर्ड कारोबारियों की संख्या 64 लाख थी, जो अब बढ़कर 1.12 करोड़ हो गई है।

 

 

5.नहीं बढ़ी महंगाई दर

पहले आशंका ती कि जीएसटी से महंगाई बढ़ सकती है, जैसा सिंगल टैक्स रेजीम लागू होने के बाद कई देशों में हो भी चुका है। हालांकि भारत में ऐसा नहीं हुआ। हाल में महंगाई बढ़ने की मुख्य वजह फूड और फ्यूल की कीमतों में बढ़ोत्तरी को माना जा रहा है।

टैक्स के कई स्लैब से सुनिश्चित हुआ कि कीमतें पहले के लगभग समान बनी रहें। एंटी प्रॉफीटियरिंग अथॉरिटी से मुनाफाखोरी रोकना भी आसान हो गया।



आगे पढ़ेें- किन मुश्किलों से पार पाना है बाकी 

 

 


 

 

#बनी रहीं ये मुश्किलें

1.कंप्लायंस प्रोसेस नहीं हुआ आसान

जीएसटी रेजीम में कंप्लायंस प्रोसेस ने सरकार को कई बार असहज स्थिति में डाल दिया। तकनीक खामियों के चलते कंप्लायंस प्रोसेस में लगने वाला समय खासा बढ़ गया। हालांकि सरकार प्रोसेस को तेज और आसान बनाने के लिए सिंगल रिफॉर्म पर काम कर रही है, लेकिन इसमें दिसंबर या जनवरी तक का वक्त लग सकता है।

अकांउटिंग सोफ्टवेयर कंपनी ‘बिजी’ के चीफ टेक्निकल ऑफिसर राजेश गुप्‍ता ने कहा कि ज्‍यादातर व्‍यापारियों को जीएसटी नंबर को वैलिडेट करने में परेशानी आती है। उन्हें किसी भी माल को खरीदने या बेचने पर वेंडर से जीएसटी नंबर वाला इनवॉयस तो मिल जाता है, लेकिन महीने के आखिर में जब वे रिटर्न फाइल करते हैं, तो पता चलता है कि उन्‍हें मिले कई इनवॉयस के जीएसटी नंबर सही नहीं हैं। वहीं इनपुट टैक्स क्रेडिट की समस्या भी बनी हुई है।

 

 

2.रजिस्ट्रेशन प्रोसेस की दिक्कतें

कई तरह के रजिस्ट्रेशन की जरूरतों के चलते इंडस्ट्री के लिए जीएसटी रेजीम जटिल हो गया है, जिससे सरलता की उम्मीद की जा रही थी। कई मामलों में रजिस्ट्रेशन सभी राज्यों में कराना जरूरी है। कंपनियों को आशंका है कि कई रजिस्ट्रेशन के कारण कई ऑडिट और एसेसमेंट की वजह से बिजनेस उनके लिए आगे मुश्किलें हो सकती हैं।

विजय सेल्स के एमडी नीलेश गुप्ता ने कहा कि जीएसटीएन नेटवर्क के सही तरीके से काम नहीं करने से परेशानी कारोबारियों को हुई है।

दिल्ली की इंडस्ट्रियल एसोसिएशन अपेक्स चैंबर के अध्यक्ष कपिल चोपड़ा ने कहा कि जीएसटी आने के बाद स्मॉल स्केल इंडस्ट्री को नुकसान हुआ है, क्योंकि उनका अकाउंट मेंटेन करने के लिेए चार्टेर्ड अकाउंटैंट का खर्च बढ़ गया है।




3.लग गए नए सेस

जीएसटी के लागू होने के साथ कई टैक्स और सेस खत्म होने का दावा किया जा रहा था, लेकिन लग्जरी और सिन गुड्स के लिए कम्पन्सेशन सेस पेश कर दिया गया। बाद में इसके दायरे में ऑटोमोबाइल्स गुड्स भी आ गए। चीनी पर भी नया सेस लगाने की तैयारी की जा रही है।

 

 

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4.रिफंड की समस्या

प्रोसिजर के अलावा रिफंड मेकैनिज्म ने भी एक्सपोर्टर्स की समस्याएं बढ़ाईं। इससे विशेषकर छोटी इकाइयों को ज्यादा समस्या हुई, जिससे उनकी वर्किंग कैपिटल की जरूरत बढ़ गई। भले ही इस समस्या को दूर करने के लिए तमाम प्रयास किए गए,लेकिन इस मामले में सरकार द्वारा ज्यादा दखल दिए जाने की जरूरत है।

सीएआईटी के खंडेलवाल के मुताबिक रिटर्न फाइलिंग में अभी भी दिक्कतें छोटे ट्रेडर्स को आ रही हैं। जीएसटी के लागू होने के एक साल बाद भी रिटेलर्स को रिफंड मिलना शुरू नहीं हुआ है, जिस कारण उनका पैसा सरकार के पास अटका हुआ है।

 

 

5. जीएसटी से बाहर हैं पेट्रोल-डीजल

जीएसटी रेजीम में हर आइटम पर देश भर में समान टैक्स लगाने का दावा किया गया था। हालांकि पेट्रोल और डीजल के मामले में ऐसा नहीं हो सका। पेट्रोल-डीजल पर जीएसटी नहीं लगने से केंद्र जहां इनकी बिक्री पर एक्साइज ड्यूटी वसूल रही है, वहीं राज्य अलग-अलग वैट वसूल रहे हैं। इसके चलते देश के लगभग हर राज्य में पेट्रोल और डीजल की अलग-अलग कीमतें चुकानी पड़ रही हैं।

 
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