Home » Economy » Foreign Tradeभारतीय दवाओं को चीन में मंजूरी, access of Indian drugs in china

खास खबर: क्या दवाओं से दूर होगा भारत-चीन रिश्तों का कैंसर?

क्‍या चीन द्वारा भारतीय दवाओं को अपने यहां बिकने की इजाजत देना आपसी रिश्‍तों के पटरी पर आने की शुरुआत है..

1 of

नई दिल्‍ली। करीब 2 दशकों तक टाल-मटोल करने के बाद आखिरकार चीन ने भारतीय दवाओं को अपने देश में बिकने की इजाजत दे दी है। कम कीमत के चलते पूरी दुनिया में धूम मचाने के बाद अब भारतीय दवाएं चीन के नागरिकों की सेहत भी सुधारेंगी। जिन दवाओं को चीन की सरकार ने अपने यहां आसान एक्‍सेस दी है, उसमें कैंसर की सभी दवाएं शामिल हैं। ऐेसे में क्‍या मान लिया जाए कि दवाएं भारत चीन रिश्‍तों का कैंसर भी मिटा देंगी?  

 

देखा जाए तो पिछले 60 साल से दोनों देशों के रिश्‍ते भारी उतार-चढ़ाव भरे रहे हैं। इसमें पिछले 20 साल की बात करें तो भारत-चीन के बीच कारोबार तेजी के साथ बढ़ा है। 2017 में दोनों देशों ने 84.44 अरब डॉलर का कारोबार किया। हालांकि इसमें भारत करीब 51 अरब डॉलर के कारोबारी घाटे में रहा है। चीन की ओर से भारतीय दवाओं को असान पहुंच दिए जाने से माना जा रहा है कि भारत चीन के साथ अपने कारोबारी रिश्‍ते को बराबरी पर ला सकेगा। 

 

मोदी जि‍नपिंग की अनौपचारिक बातचीत ने किया काम ?
भारतीय उत्‍पादों को आसान एक्‍सेस देने के चीन के फैसले के पीछे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की हालिया चीन यात्रा को बड़ी वजह के रूप में देखा जा रहा है। इससे पहले दोनों देशों के बीच कॉमर्स मिनिस्‍ट्री के लेवल पर हुई वार्ता के दौरान चीन ने भरोसा दिया था कि वह भारत के साथ व्‍यापार असंतुलन को दूर करने के लिए कदम उठाएगा। हालांकि चीन को ऐसा देश माना नहीं जाता है, जो किसी मुद्दे पर इतनी आसानी से अपना रुख बदल ले। सवाल यह है कि फार्मा सेक्‍टर में भारतीय कंपनियों को प्रवेश देने के जिस मामले को चीन ने पिछले 2 दशकों से लटका रखा था, आखिर प्रधानमंत्री के एक दौर के चलते कैसे उसका रुख बदल गया। ऐसा नहीं है कि मोदी पहली बार चीन गए हैं। बतौर पीएम वह पहले भी चीन का दौरा कर चुके हैं, तब चीन का रुख नहीं बदला था।

 

ऐसा नहीं कि चीन सुधर गया 
अंतराष्‍ट्रीय मामलों के जानकार और दिल्‍ली विश्‍व विद्यालय में असिस्‍टेंट प्रोफेसर प्रशांत त्रिवेदी के मुताबिक, अंतराष्‍ट्रीय नजरिए से चीन की ओर से उठाए गए मौजूदा कदम सकारात्‍मक हैं। हालांकि यह नहीं मान लेना चाहिए कि चीन सुधर गया है और वह भारत की हर मांग को मान लेगा। फिलहाल रिश्‍तों को लेकर चीन के इतिहास तो इस बात की गवाही बिल्‍कुल नहीं देता है।

 

चीन के रुख में यह नरमी क्‍यों है? 
प्रशांत के मुताबिक, अमेरिका के साथ ट्रेड वार के बार चीन में भारत के लिए तेजी से सेंटिमेंट बदले हैं। अमेरिका को छोड़ दिया जाए तो भारत उसका बड़ा ट्रेड पार्टनर है। ऐसे में वह कारोबारी रिश्‍तों को बेहतर करने की कोशिश कर रहा है। यही कारण है कि उसने मोदी के दौरे के बाद जो बड़े कदम उठाए वे कारोबार से जुड़े हैं। चीन जियोपॉलिटिक डायरेक्‍शन चेंज करने पर आमादा है। उसकी कोशिश है कि भारत भले उसके साथ नहीं आए, तो भी कम से कम उसके विरोध में तो नहीं ही खड़ा रहे। चीनी मीडिया में छपी खबरें इसकी साफ गवाही देती हैं। मोदी के दौर से ठीक पहले ग्‍लोबल टाइम्‍स में छपे आर्टिकल में कहा गया था दुनिया के राजनीति के पुराने रिवाजों को बदलना है तो भारत-चीन को दोस्‍ती दिखानी होगी।

 

क्‍या इसे भारत चीन रिश्‍तों की नई शुरुआत माना जाए ?
चीन ने अच्‍छा रुख तो दिखाया है, लेकिन अभी ये मान लेना थोड़ा जल्दबाजी होगी। बॉर्डर विवाद को छोड़ भी दिया जाए तो भी न्‍यूक्लियर सप्‍लायर ग्रुप (NSG) में भारत की दावेदारी का विरोध और आतंकवाद को लेकर यूएन समेत कई बड़े मंचों पर पाकिस्‍तान का समर्थन ये 2 ऐसे मसले हैं, जिन पर अगर रुख बदले तो माना जा सकता है कि चीन रिश्‍तों को लेकर गंभीर है। प्रशांत के मुताबिक, इन दोनों मसलों पर चीन को किसी तरह का नुकसान नहीं है। यहां भारत का समर्थन करके चीन यह दिखा सकता है कि वह भारत के लिए गंभीर है। बता दें कि चीन के चलते ही एनएसजी में भारत की स्‍थायी सदस्‍यता का मामला अटका है। आतंकवाद को लेकर पाकिस्‍तान के खिलाफ यूएन में भारत की ओर से लाए जाने वाले हर प्रस्‍ताव का चीन विरोध करता आ रहा है।        

 

कारोबार के किन दो मोर्चों पर चीन ने भारत को राहत दी है?


1- भारतीय दवा कंपनियों के खुले चीन के दरवाजे: चीन ने भारत से आने वाली करीब 28 दवाओं पर से इंपोर्ट ड्यूटी हटा दी है। इससे भारतीय दवाओं को वहां के बाजार में आसान एंट्री मि‍ल पाएगी। भारतीय फार्मा सेक्‍टर के लि‍ए यह बड़ी खबर है। इनमें कैंसर की सभी दवाएं शामि‍ल हैं। भारतीय फार्मा कंपनि‍यों के लि‍ए यह अच्‍छी खबर है। इससे भारत और चीन के बीच जो व्‍यापार असंतुलन है, उसे भवि‍ष्‍य में कम करने में मदद मि‍लेगी।  

 

2- नाथुला दर्रे से कारोबार फिर शुरू हुआ: हर वर्ष की भांति इस वर्ष भी एक मई से छह माह तक भारत-चीन के बीच होने वाला कारोबार शुरू हो गया। दोनों देशों के बीच व्यापारिक रिश्तों की औपचारिकताएं समारोह पूर्वक आयोजित की गई। दोनों देशों के मध्य एक मई से शुरू होने वाला कारोबार सप्ताह में चार दिन अगले छह माह तक (30 नवंबर) तक जारी रहेगा। पिछले वर्ष डोकलाम तनातनी के कारण मात्र दो सप्ताह तक ही सीमा व्यापार हुआ तथा वाया नाथुला कैलाश मानसरोवर की यात्रा भी ठप रही।

 

यहां अब भी भारत के लिए चीन के दरवाजे बंद हैं 
 

1- चावल: भारत दुनिया के कई देशों को  5.3 अरब डॉलर का चावल एक्सपोर्ट करता है। वहीं चीन सालाना 1.5 अरब डॉलर का चावल विदेशों से इम्‍पोर्ट भी करता है। पर वह भारत से चावल नहीं खरीदता। 

2- भैंस का मांस: भारत दुनिया के प्रमुख मांस निर्यातक देश है। देश से हर साल करीब 3.68 अरब डॉलर कीमत के भैंस मांस कर निर्यात होता है।  चीन में भारत से भैंसों के मांस के आयात पर पूरी तरह रोक है। जबकि चीन दुनिया के अन्य देशों से सालाना 2.45 अरब डॉलर का मांस खरीदता है। 

 

3- एल्‍यूमिनियम एलॉय:  चीन हर साल 87 करोड़ 40 लाख डॉलर कीमत के ऐल्युमिनियम एलॉय की खरीदारी करता है। भारत से इस सामान की खरीदारी केवल 2 लाख डॉलर का ही करता है। 

 

भारत चीन कारोबार में भारतीय घाटे का लेखा जोखा क्‍या है? 
2000 के दौर में चीन के साथ कारोबारी रिश्‍तों में मजबूती आने के बाद चीन के साथ भारत की कारोबारी घाटा लगातार बढ़ा रहा है। बीते करीब 1 दशक की बात करे तो चीन के कारोबार में भारत कई 219 फीसदी का घाटा खा चुका है। 2007-08 में चीन के साथ भारत का करोबारी घाटा करीब 16 अरब डॉलर था। 2012-13 के 36.21 अरब डॉलर के लेवल पर पहुंचा। वहीं 2017 में बढ़कर करीब 51 अरब डॉलर हो चुका है। पिछले दिनों आए चीन सरकार के आंकड़ों मुताबिक, 2017 की बात करे तो दोनों देशों के बीच करीब 84.44 अरब डॉलर का ट्रेड हुआ, जो अपने तक का रिकॉर्ड लेवल है। इसमें भारत का घाटा करीब 51.75 अरब डॉलर का रहा। भारत ने इस दौरान जहां चीन को सिर्फ 16.34 अरब डॉलर का ही एक्‍सपोर्ट किया वहीं चीन ने भारत को करीब 68 अरब डॉलर का एक्‍सपोर्ट किया।

prev
next
मनी भास्कर पर पढ़िए बिज़नेस से जुड़ी ताज़ा खबरें Business News in Hindi और रखिये अपने आप को अप-टू-डेट