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2017-18 में 5 साल में सबसे कम रही FDI इनफ्लो की ग्रोथ रेट, सर्विस सेक्‍टर में 23% घटा निवेश

देश के सर्विस सेक्‍टर में FDI 2017-18 में करीब 23 फीसदी घटकर 6.7 अरब डॉलर रह गया।

FDI in services sector slumps 23% in 2017-18

नई दिल्‍ली. देश के सर्विस सेक्‍टर में प्रत्‍यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआई) 2017-18 में करीब 23 फीसदी घटकर 6.7 अरब डॉलर रह गया। कुल एफडीआई इनफ्लो की बात करें तो 2017-18 में इसकी ग्रोथ रेट पांच साल में सबसे कम 3 फीसदी दर्ज की गई। डीआईपीपी ने यह जानकारी दी है। 2016-17 में सर्विस सेक्‍टर में 8.68 अरब डॉलर का एफडीआई इनफ्लो हुआ था। सर्विस सेक्‍टर में फाइनेंस, बैंकिंग, इंश्‍योरेंस, आउटसोर्सिंग, आरएंडी, कुरियर, टेक टेस्टिंग और एनॉलसिस शामिल है। भारत की जीडीपी में सर्विसेस सेक्‍टर का योगदान 60 फीसदी से ज्‍यादा है। 

 

 

FDI इनफ्लो की ग्रोथ रेट 5 साल में सबसे कम 
डीआईपीपी के अनुसार, कुल एफडीआई इनफ्लो की बात करें तो 2017-18 में इसकी ग्रोथ रेट पांच साल में सबसे कम 3 फीसदी दर्ज की गई। इस दौरान कुल एफडीआई इनफ्लो 44.85 अरब डॉलर हुआ था। डेलॉय इंडिया के लीड इकोनॉमिस्‍ट और पार्टनर अनिस चक्रवर्ती का क हना है कि अमेरिकी जैसे देशों से निवेश की री-रूटिंग के चलते एफडीआई में सुस्‍ती रहने की आशंका है। अमेरिकी में डॉलर की मजबूती के साथ-साथ ब्‍याज दरों में बढ़ोत्‍तरी हुई है। इससे माना जा रहा है कि अमेरिकी अर्थव्‍यवस्‍था में सुधार हो रहा है। 

 

इस साल में विदेशी निवेश में रह सकती है सुस्‍ती 
चक्रवर्ती का कहना है कि अमेरिकी का केंद्रीय बैंक फेडबरल रिजर्व आगे भी ब्‍याज दरों में बढ़ोत्‍तरी कर सकता है। साथ ही टैरिफ के मामले में अमेरिका अपना रुख आक्रामक रखेगा। इसके चलते इस साल भी विदेशी निवेश के इनफ्लो में सुस्‍ती रह सकती है। उन्‍होंने कहा कि एफडीआई ग्रोथ रेट में गिरावट पर सरकार को ध्‍यान देना चाहिए और उसे मैक्रो इकोनॉमिक मैनेजमेंट पर फोकस करना होगा। 

 

केमिकल्‍स सेक्‍टर का FDI भी घटा 
डीआईपीपी के अनुसार, केमिकल्‍स सेक्‍टर की एफडीआई ग्रोथ रेट भी गिरा है। 2017-18 के दौरान केमिकल्‍स सेक्‍टर में एफडीआई 1.30 अरब डॉलर रहा, जोकि 2016-17 में 1.39 अरब डॉलर था। 

 

भारत के लिए FDI इनफ्लो जरूरी 
आने वाले सालों में ग्रोथ को रफ्तार देने के लिए इन्‍फ्रास्‍ट्रक्‍चर सेक्‍टर में भारी-भरकम निवेश की जरूरत को देखते हुए एफडीआई इनफ्लो भारत के लिए महत्‍वपूर्ण है। एफडीआई में गिरावट देश के पेमेंट बैलेंस पर दबाव डाल सकता है साथ ही इसका असर रुपए की कीमत पर भी देखने को मिलेगा। 

 

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