योगदान /जेटली ने स्वीकारी थी बैंकिंग सेक्टर को बदहाली से बाहर निकालने की चुनौती

  • वित्त मंत्री बनते ही इस सेक्टर पर प्रमुखता से ध्यान दिया और बैंकों को मजबूत करने के लिए लगातार काम किया

Moneybhaskar.com

Aug 24,2019 08:54:00 PM IST

संजय कुमार साह. नई दिल्ली. वर्ष 2014 में जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार बनी तब बैंकिंग सेक्टर फंसे कर्ज और पूंजी की भारी कमी जैसे संकट से गुजर रहा था। वित्त मंत्री बनते ही अरुण जेटली ने इस सेक्टर पर प्रमुखता से ध्यान दिया। मोदी की पहली सरकार में वित्त मंत्री रहते उन्होंने इस सेक्टर को मजबूत करने के लिए लगातार काम किया। जेटली का शनिवार दोपहर एम्स में निधन हो गया। भारतीय बैंकिंग सेक्टर उनके योगदान को आसानी से नहीं भूल पाएगा।

पहली बजट में ही इरादे कर दिए थे स्पष्ट

कारोबारी साल 2014-15 के बजट भाषण में जेटली ने कहा था कि वित्तीय स्थिरता तेज आर्थिक विकास की बुनियादी जरूरत है। हमारी बैंकिंग प्रणाली को मजबूत करने की जरूरत है। उन्होंने कहा था कि 2018 तक बैंकों को 2.4 लाख करोड़ रुपये की शेयर पूंजी की जरूरत है, ताकि वे बासेल-तीन मानक पर खरे उतर सकें। उन्होंने स्पष्ट कर दिया था कि सरकार बिना नियंत्रण खोए बैंकों में हिस्सेदारी घटाएगी। उन्होंने बैंकिंग सेक्टर में विलय के भी संकेत दे दिए थे। उन्होंने वित्तीय समावेशीकरण की नीति की जरूरत बताई थी। इसके कारण बाद में जनधन योजना को बढ़ावा दिया गया और यह योजना दुनिया की सबसे बड़ी वित्तीय समावेशीकरण योजना बन गई। इसी बजट में अर्थव्यस्था के खास क्षेत्र की जरूरत पूरी करने के लिए आरबीआई द्वारा एक फ्रेमवर्क बनाने पर भी चर्चा की गई थी। यह बाद में लधु बैंकों और भुगतान बैंकों की स्थापना की बुनियाद बनी।

फंसे कर्ज से निकालने की प्रक्रिया तेज की

लंबे समय से कई कंपनियां बैंकों के अरबों-खरबों रुपये का कर्ज दबाए बैठी थी। इसके कारण बैंकों के फंसे कर्ज (एनपीए) का स्तर काफी बढ़ गया था। इसका असर बैंकों के बैलेंस शीट पर पड़ रहा था और वे कर्ज दे पाने में कठिनाई का सामना कर रहे थे। इस समस्या के समाधान के लिए जेटली ने इन्सॉल्वेंसी एंड बैंक्रप्सी कानून बनाया। इसके कारण बैंक कर्जदार कंपनियों से अपने कर्ज की वसूली कर पाने में अधिक सक्षम हो गए। इस कानून के बल पर बैंक कर्ज न चुकाने वाली कंपनियों से करीब डेढ़ लाख करोड़ रुपये की वसूली कर चुके हैं।

बैंकों की पूंजी बढ़ाई

नोटबंदी और जनधन योजना के कारण बैंकों की जमा पूंजी का स्तर काफी बढ़ गया। इसके कारण बैंक अधिक कर्ज देने में सक्षम हो गए। कम लागत पर बड़े पैमाने पर पूंजी मिलने के कारण बैंक कम दरों पर कर्ज देने में भी सक्षम हुए। इसके साथ ही सरकार ने बड़े पैमाने पर बैंकों में शेयर पूंजी का निवेश किया। इससे बैंकों की वित्तीय स्थिति और मजबूत हुई।

विलय के जरिये बढ़ाई ताकत

जेटली ने शुरू से ही विलय के जरिये बैंकों को शक्तशाली बनाने का इरादा स्पष्ट कर दिया था। उन्होंने इस नीति को स्पष्ट कर दिया था कि देश को कम संख्या में लेकिन अंतरराष्ट्रीय स्तर के बड़े बैंकों की जरूरत है। इसके तहत पहली अप्रैल 2017 को भारतीय स्टेट बैंक में उसके पांच सहयोगी बैंकों का विलय कर दिया गया। इसके बाद जेटली ने विजया बैंक और देना बैंक को बैंक ऑफ बड़ौदा में विलय करने की प्रक्रिया तेज की। इन तीनों बैंकों का इसी साल पहली अप्रैल को विलय हो गया। इसके बाद बैंक ऑफ बड़ौदा एसबीआई के बाद देश का दूसरा सबसे बड़ा सरकारी बैंक बन गया।

बैंक बोर्ड ब्यूरो का गठन

बैंकिंग व्यवस्था को मजबूत करने के लिए सरकार ने बैंक बोर्ड ब्यूरो का गठन किया। ब्यूरो ने पहली अप्रैल 2016 से काम करना शुरू कर दिया। इससे बैंकों के शीर्ष पदों पर बेहतरीन प्रतिभाओं के चयन की प्रक्रिया मजबूत हुई। ब्यूरो सरकारी बैंकों में गवर्नेंस सुधार के लिए भी काम करता है। यह बैंकों को रणनीति बनाने और पूंजी जुटाने में भी मदद करता है।

सुविधा से वंचित लोगों तक बैंकिंग सुविधा पहुंचाई

जेटली ने एक ओर जनधन खातों के सहारे सुविधा से वंचित करोड़ों लोगों तक बैंकिंग सुविधा पहुंचाई। जनधन योजना के तहत खुले खातों में आधे से अधिक महिलाओं के खाते हैं। वहीं, दूसरी ओर पोस्टल बैंक के सहारे डाक घर के विशाल नेटवर्क का उपयोग भी बैंकिंग सुविधा को देश के कोने-कोने तक पहुंचाने में किया।

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