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फ्री में बेस रेट से MCLR पर लोन शिफ्ट करने की मिलेगी सुविधा, RBI दे सकता है निर्देश

जल्द ही बैंक कस्टमर अपने पहले से चल रहे लोन को एमसीएलआर सिस्टम पर फ्री में शिफ्ट करा सकेंगे।

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नई दिल्ली. जल्द ही बैंक कस्टमर अपने पहले से चल रहे लोन को एमसीएलआर सिस्टम पर फ्री में शिफ्ट करा सकेंगे। आरबीआई बैंकों को ऐसा निर्देश दे सकता है कि बैंक बिना कोई कनवर्जन फीस लिए अपने कस्टमर को लोन शिफ्ट कराने सुविधा दे। ऐसा होने पर बेस रेट पर लोन लिए करोड़ों कस्टमर को सस्ते लोन का फायदा मिल सकता है। इसके पहले आरबीआई कई बार यह कह चुका है कि अभी भी कर्ज देने के एमसीएलआर और बेस रेट सिस्टम में इंटरेस्ट रेट का बहुत अंतर है। ऐसे में बैंकों को बेस रेट पर कर्ज  लिए हुए कस्टमर को सस्ते इंटरेस्ट का फायदा मिलना चाहिए।

 
क्या है प्लान? 
 
- आरबीआई ने 7 फरवरी में पेश मॉनेटिरी पॉलिसी में कहा था कि बैंक अप्रैल 2018 से बेस रेट कस्टमर को सस्ते कर्ज का फायदा दें। यानी उनके लोन एमसीएलआर से लिंक कर दिए जाएं। इसके लिए आरबीआई ने एक कमेटी भी बना दी है। हालांकि बैंकों ने आरबीआई को कहा है कि अभी एमसीएलआर रेट से बेस रेट को लिंक करना संभव नहीं है। कई मुद्दों को हल कर इसे अप्रैल 2019 से लागू किया जाना चाहिए।
-बैंकों के इस रवैये को देखते हुए आरबीआई इस बात के निर्देश दे सकता है, जब तक बैंक बेस रेट को एमसीएलआर से लिंक करने का सिस्टम नहीं डेवलप कर पाते हैं, तब तक कस्टमर को अपने लोन को एमसीएलआर पर शिफ्ट करने के लिए कोई फीस नहीं ले। अभी कस्टमर को बेस रेट से एमसीएलआर पर अपना लोन शिफ्ट कराने के लिए कनवर्जन फीस देनी पड़ती है। प्रमुख रुप से 0.5 फीसदी से लेकर एक फीसदी तक बैंक कनवर्जन फीस लेते हैं।
- बेस रेट और एमसीएलआर मॉडल में इंटरेस्ट में करीब 0.50 फीसदी का औसतन अंतर है। यानी बेस रेट पर कर्ज ले रखे कस्टमर को 0.50 फीसदी के करीब लोन महंगा  पड़ता है। जैसे अभी एसबीआई का तीन साल का एमसीएलआर 8.10 फीसदी है 8.65 फीसदी है।
 
अभी रिटेल लोन पर कुछ  बैंक दे रहे हैं सुविधा
 
- बढ़ते कॉम्पिटिशन को देखते हुए कई पब्लिक सेक्टर बैंकों ने रिटेल लोन जैसे कार लोन और पर्सनल लोन को शिफ्ट करने पर कनवर्जन फीस नहीं ले रहे हैं। हालांकि अभी भी होम लोन, बिजनेस लोन सहित दूसरे लोन पर यह सुविधा बैंक नहीं दे रहे हैं।
 
इसलिए आया था एमसीएलआर फॉर्मूला
 
- पूर्व गवर्नर रघुराम राजन के समय कर्ज देने के लिए बेस रेट की जगह एमसीएलआर फॉर्मूला लाया गया था। इसको लाने के पीछे तर्क यह था कि बेस रेट पर कर्ज सस्ता होने का फायदा तुरंत कस्टमर को नहीं मिलता है।
- आरबीआई की प्रॉब्लम यह है कि अभी बैंकों के कस्टमर का बड़ा हिस्सा बेस रेट पर ही लोन ले रखा है। जिसकी वजह से एमएसएलआर में कटौती के बाद भी सस्ते कर्ज का फायदा नहीं मिल रहा है। अभी बैंकों द्वारा दिए गए कुल लोन में 60 फीसदी से ज्यादा कर्ज बेस रेट पर है।
- इसी को देखते हुए आरबीआई ने एक वर्किंग ग्रुप का गठन किया है। जिसे गाइडलाइन तैयार कर एक अप्रैल 2018 से लागू करने की जिम्मेदारी दी गई है।
 
बैंकों ने तीन प्वाइंट पर किया विरोध
 
- सूत्रों के अनुसार आरबीआई के सामने बैंकों ने तीन प्वाइंट पर विरोध किया है। उनका कहना है कि जब तक इन प्वाइंट्स में सुधार नहीं किया जाय, तब तक नए सिस्टम को नहीं लागू किया जाय। ऐसे  में आरबीआई को अप्रैल 2018 की जगह  2019 की डेडलाइन तय की जाय।
- बैंकों ने कहा है कि डिपॉजिट रेट के आधार पर लेंडिंग बेंचमार्क को सुधार किया जाय। इसी तरह लोन देने समय फिक्स होने वाले स्प्रेड के मैकेनिज्म में भी प्रमुख रूप से बदलाव किया जाय। 
 
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