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बैंकों ने सस्ता कर्ज देने पर लगाया अड़ंगा, कहा-एमसीएलआर लिंक बेस रेट तय करना अभी संभव नहीं

नई दिल्ली। बैंकों ने बेस रेट पर कर्ज ले चुके कस्टमर को सस्ता लोन मिलने की राह में रोड़ा लगा दिया है। आरबीआई को बैंकों ने कहा है कि बिना अहम बदलाव किए उनके लिए बेस रेट कस्टमर कर को एमसीएलआर का फायदा नहीं दिया जा सकता है। इसके लिए आरबीआई से कहा है कि अप्रैल 2019 के पहले कोई कदम न उठाया जाय। जबकि आरबीआई ने 7 फरवरी को आई मॉनेटरी पॉलिसी में कहा था कि बैंक अप्रैल 2018 से बेस रेट कस्टमर को सस्ते कर्ज का फायदा दें। यानी उनके लोन एमसीएलआर से लिंक कर दिए जाएं। अभी लोन देने के सिस्टम में एमसीएलआर (मार्जिनल कॉस्ट ऑफ लेंडिंग रेट) का मॉडल अपनाया जा रहा है। जबकि अप्रैल 2016 से पहले बैंक बेस रेट के आधार पर कस्टमर को लोन देते थे। 

 
आरबीआई ने क्या कहा था
 
पूर्व गवर्नर रघुराम राजन के समय कर्ज देने के लिए बेस रेट की जगह एमसीएलआर फॉर्मूला लाया गया था। इसको लाने के पीछे तर्क यह था कि बेस रेट पर कर्ज सस्ता होने का फायदा तुरंत कस्टमर को नहीं मिलता है। आरबीआई की प्रॉब्लम यह है कि अभी बैंकों के कस्टमर का बड़ा हिस्सा बेस रेट पर ही लोन ले रखा है। जिसकी वजह से एमएसएलआर में कटौती के बाद भी सस्ते कर्ज का फायदा नहीं मिल रहा है। अभी बैंकों द्वारा दिए गए कुल लोन में 60 फीसदी से ज्यादा कर्ज बेस रेट पर है। इसी को देखते हुए आरबीआई ने एक वर्किंग ग्रुप का गठन किया है। जिसे गाइडलाइन तैयार कर एक अप्रैल 2018 से लागू करने की जिम्मेदारी दी गई है।
 
बैंकों ने तीन प्वाइंट पर किया विरोध
 
सूत्रों के अनुसार आरबीआई के सामने बैंकों ने तीन प्वाइंट पर विरोध किया है। उनका कहना है कि जब तक इन प्वाइंट्स में सुधार नहीं किया जाय, तब तक नए सिस्टम को नहीं लागू किया जाय। ऐसे  में आरबीआई को अप्रैल 2018 की जगह  2019 की डेडलाइन तय की जाय। बैंकों ने कहा है कि डिपॉजिट रेट के आधार पर लेंडिंग बेंचमार्क को सुधार किया जाय। इसी तरह लोन देने समय फिक्स होने वाले स्प्रेड के मैकेनिज्म में भी प्रमुख रुप से बदलाव किया जाय। 
 
1.बैंकों ने आरबीआई से कहा है कि अभी भारत में आइडियल इंटरेस्ट रेट स्वैप मार्केट डेवलप नहीं हो पाया है। ऐसे में पूरी इंडस्ट्री के लिए बेंचमार्क तय करते समय डिपॉजिट रेट के आधार पर फॉर्मूला तैयार किया जाय।
 
2.इसी तरह इंटरेस्ट रेट फिक्स करने के लिए रिसेट पीरियड को भी बदला जाना चाहिए। जिससे कि नए सिस्टम में वह इफेक्टिव रुप से बाजार से लिंक हो पाए। अभी होम लोन कस्टमर का लोन एक साल बाद रिसेट होता है। यानी अगर एमसीएलआर में कटौती हो भी जाय, तो भी कस्टमर का लोन उसके द्वारा लिए गए लोन की डेट के एक साल बाद ही तय होगा।
 
3.इसी तरह बैंक इंटरेस्ट रेट फिक्स करते समय एमसीएलआर के साथ-साथ लोन की क्वॉलिटी के आधार पर स्प्रेड तय करते हैं। यानी अगर एसबीआई का एमसीएलआर 8.30 फीसदी है, तो वह होम लोन या कार सहित दूसरे लोन देते समय एक फिक्स स्प्रेड यानी अतिरिक्त इंटरेस्ट तय करता है। ऐसे में इफेक्टिव रेट 8.30 की जगह 8.5 फीसदी या कुछ और हो सकता है।
 
बैंकों का कहना है यह अभी पहले से फिक्स रहता है। इसको तय करने  का अधिकार पूरी तरह से बैंकों के पास होना चाहिए। साथ ही अपनी सिचुएशन के आधार पर उसे घटा-बढ़ा भी सके। बैंकों के अनुसार इन तीन प्वाइंट को एड्रेस करने का बाद ही नए सिस्टम को लागू करने की डेडलाइन तय की जाय। ऐसे में इसे एक अप्रैल 2019 की डेट तय की जानी चाहिए। 

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