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सरकारी बैंकों के बट्टे खाते पर राहत, FY17 में घटकर रह गया 13 फीसदी

बैंकों के कर्ज को राइट ऑफ (बट्टा खाता) करने में मार्च 2018 में कमी दर्ज की गई है।

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नई दिल्‍ली. बैंकों के कर्ज को राइट ऑफ (बट्टा खाता) करने में मार्च 2018 में कमी दर्ज की गई है। इस साल मार्च में बैंकों ने अपने कुल ग्रॉस नॉन परफार्मिंग आसेट (NPAs) का केवल 13 फीसदी ही लोन राइट ऑफ किया है, जबकि 2011 में यह 25 फीसदी था। यह जानकारी भारतीय रिजर्व बैंक ने दी है। बैंकों के सामने NPA का बढ़ता पहाड़ काफी बड़ी समस्‍या है। जब यह कर्ज नहीं वसूल हो पाता है तो बैंक पहले इसे NPA घोषित करते हैं और इसके बाद भी अगर नहीं वसूला जा सके तो इसे राइट आफ करना पड़ता है। ऐसा करने के पहले बैंकों को इस राइट ऑफ के लिए 100 फीसदी प्रोविजनिंग करनी पड़ती है।

 

 

कम हो रहा राइट ऑफ

बैंकों ने मार्च 2006 में अपने कुल ग्रॉस एनपीए का करीब 21 फीसदी राइट ऑफ किया था, जो मार्च 2011 में बढ़कर सबसे ज्‍यादा 25 फीसदी हो गया था। वहीं मार्च 2015 में बैंकों ने 18 फीसदी ग्रास एनपीए का राइट ऑफ किया था। 2011 के बाद से इसमें गिरावट के ट्रेंड लगातार कायम है और मार्च 2017 में 13 फीसदी हिस्‍सा ही राइट ऑफ किया गया है।

 

 

राइट ऑफ बैंकों का रेग्‍युलर काम

बैंक अपने न वसूले जा सके लोन को समय समय पर राइट ऑफ करते रहते हैं। यह बैंकों की एक रुटीन कार्रवाई है। बैंक अपनी बैलेंसशीट को क्‍लीन करने के लिए यह कदम उठाते हैं। बैंक यह कार्रवाई RBI के नियमों के तहत करते हैं।

 

 

कर्ज माफी नहीं है राइट ऑफ

बैंकों का अपनी बैलेंसशीट पर डूबे हुए कर्ज को राइट ऑफ करने का मतलब यह नहीं है कर्ज माफ हो गया है। यह लोन बैंक बाद में कर्जदार से वसूलने का प्रयास करते रहते हैं। इन राइट ऑफ लोन को वसूलने के लिए कई नियम हैं, जिनके तहत यह प्रक्रिया चलाई जाती है। आरबीआई के डाटा के अनुसार सरकारी बैंकों ने 2014-15 से लेकर सितबंर 2017 तक करीब 2,41,911 करोड़ रुपए का एनपीए राइट ऑफ किया है।


 
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