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जानिए, क्‍या होती है थोक महंगाई दर, क्‍या है इसको मापने का पैमाना

जब वस्‍तुओं की कीमतें डिमांड और सप्‍लाई में अंतर की वजह से बढ़ जाती है तो ऐसी स्‍थति को महंगाई यानी (इन्‍फ्लेश्‍न) कहते हैं।

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नई दिल्‍ली। सामान्‍य तौर पर मार्केट में वस्‍तुओं की कीमतों में होने वाला बदलाव यानी इसमें आने वाला उतार-चढ़ाव महंगाई को दर्शाता है। जब वस्‍तुओं की कीमतें डिमांड और सप्‍लाई में अंतर की वजह से बढ़ जाती है तो ऐसी स्‍थति को महंगाई यानी (इन्‍फ्लेश्‍न) कहते हैं।
 
दूसरे शब्‍दों में हम कह सकते हैं कि महंगाई मार्केट में करेंसी की उपलब्‍धता और वस्‍तु की कीमतों को मापने का एक तरकीब भी है। देश में थोक महंगाई दर पिछले 10 महीनों से लगातार शून्‍य की स्थिति में बनी है। इसके आंकड़ों में गिरावट के बावजूद बाजार में खाने-पीने की चीजें महंगी बिक रही है। हम आपको विस्‍तारपूर्वक बताते हैं कि क्‍या होती है थोक महंगाई दर और इसको मापने का पैमाना क्‍या है।
 
क्‍या होती है थोक महंगाई दर
 
भारतीय इकोनॉमी में अहम नीतियों के निर्माण में थोक मूल्य सूचकांक पर आधारित महंगाई दर का इस्‍तेमाल किया जाता है। थोक बाजार में वस्‍तुओं के समूह की कीमतों में कितनी वृद्धि हुई है। इसका आकलन थोक मूल्य सूचकांक के जरिए किया जाता है। भारतीय अर्थव्‍यवस्‍था में थोक महंगाई दर की गणना 3 तरह की महंगाई, प्राथमिक वस्तुओं, फ्यूल और मैन्‍युफैक्चिरिंग प्रोडक्‍टस की महंगाई में बढ़त के आधार पर की जाती है। भारत में अभी भी वित्तीय और मौद्रिक नीतियों संबंधी कई फैसले थोक मूल्य सूचकांक पर आधारित महंगाई के हिसाब से ही होती है। जिसके आंकड़े हर माह वाणिज्‍य और उद्योग मंत्रालय के द्वारा जारी किया जाता है। जो कि साल 2009 से पहले हर हफ्ते और प्रत्‍येक मंगलवार को जारी होता था। साथ ही थोक महंगाई दर को मापने का आधार वर्ष भी बदल दिया गया है। अब इसका आंकड़ा साल 2011-12 को आधार वर्ष मानकर तय किया जाता है।
 
अगली स्‍लाइड में पढ़िए, क्‍या है थोक महंगाई दर को मापने का पैमाना……….

थोक महंगाई मापने का पैमाना
 
दरअसल इसमें हम यह जानने का प्रयास करते हैं कि थोक महंगाई दर कैसे घटती और बढ़ती है। इसके लिए एक सूचकांक (इंडेक्‍स) होता है जिसे थोक मूल्‍य सूचकांक (डब्‍ल्‍यूपीआई) कहते हैं। थोक महंगाई दर को मापने के लिए भारत में डब्‍ल्‍यूपीआई का इस्‍तेमाल किया जाता है। थोक बिक्री मूल्‍य में हो रहे उतार-चढ़ाव को मापने के लिए डब्‍ल्‍यूपीआई सबसे प्रमाणिक तरीका है। थोक महंगाई को मापते समय व्‍होलसेल प्राइस इंडेक्‍स के बढ़ने का मतलब हुआ महंगाई में तेजी आना और इसके गिरने का मतलब हुआ महंगाई में कमी। इस सूचकांक में 435 अलग-अलग वस्तुओं के लेखा-जोखा को रखा जाता है। क्‍योंकि, सूचकांक में शामिल हर वस्तु को एक-एक वेटेज यानी वजन दिया गया है। जो इस आधार पर तय किया गया है कि किन वस्तुओं की हमारी जिंदगी में कितनी अहमियत है।
 
थोक महंगाई का इकोनॉमी पर असर
 
थोक महंगाई दर अर्थव्‍यवस्‍था को कई तरह से प्रभावित करती है। जिसका सकारात्‍मक और नकारात्‍मक प्रभाव भी अर्थव्‍यवस्‍था पर पड़ता है। थोक महंगाई दर बढ़ने की मुख्‍य वजह डिमांड और सप्‍लाई में अंतर होता है। जब महंगाई बढ़ती है तो वस्‍तुओं की कीमत बढ़ जाती है और लोगों की खरीदने की क्षमता कम हो जाती है। जिसका असर मैन्‍युफैक्चिरिंग पर भी पड़ता है और इसकी वजह से निवेश भी प्रभावित होता है। इसके अलावा इसका असर रोजगार पर भी पड़ता है। साथ ही थोक महंगाई की वजह से इकोनॉमी भी प्रभावित होती है।
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