जानिए, क्या है अल-नीनो, दुनियाभर में मौसम को कैसे करता है प्रभावित

Do You Know Team

Jan 15,2016 06:32:00 PM IST
नई दिल्‍ली। जब सर्दी के मौसम में भी गर्मी का अहसास होने लगे तो, यह अल नीनो के आने का संकेत है। क्‍योंकि, इससे जनजीवन तो प्रभावित होता ही है, इसका सबसे बुरा प्रभाव फसलों पर पड़ता है। मौसम वैज्ञानिकों के अनुसार मौसम में यह बदलाव अल-नीनो की वजह से ही हो रहा है। पिछले सौ साल के इतिहास पर यदि नजर डालें तो अल नीनो का असर साल 2015 में सबसे ज्‍यादा दिखा और 2016 में भी इसका असर दिखना शुरू हो गया है।
अल नीनो की वजह से ही पूरे भारत में जाड़े में भी अधिक तापमान का सामना करना पड़ रहा है। जबकि इस समय कड़ाके की ठंड पड़नी चाहिए थी। जबकि तापमान सामान्‍य से 4-5 डिग्री सेल्सियस अधिक रहा है। पश्चिमी राजस्‍थान में तो तापमान सामान्‍य से 8 डिग्री सेल्सियस तक अधिक रहा है। पिछले कई साल से भारत में सर्दियों के मौसम में भी तापमान अधिक रहा है।
वैज्ञानिक मौसम में आए इस बदलाव के लिए ग्‍लोबल, रीजनल एवं लोकल फैक्‍टर को जिम्‍मेदार मान रहे हैं। भारत में सर्दियों में गर्मी के इस अहसास को मौसम के वैश्विक पैटर्न का हिस्‍सा माना जा रहा है, जो हजारों मील दूर समुद्री जल के एक असामान्‍य वार्मिंग की वजह से पैदा हुआ है। भारत में अल नीनो का असर कम मानसून के रूप में महसूस किया जा रहा है।
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क्या होता है अल नीनो उष्ण कटिबंधीय प्रशांत क्षेत्र में पेरू और ईक्वाडोर के तटवर्ती इलाकों में पैदा हुई स्थिति को अल नीनो कहा जाता है। इसके तहत समुद्र की सतह के तापमान में असामान्य तौर पर इजाफा हो जाता है। इसकी वजह से दक्षिण अमेरिका के पश्चिमी तट पर स्थित ईक्वाडोर और पेरू के तटीय क्षेत्र धीरे-धीरे समुद्र में समाते जा रहे हैं। इससे आसपास के क्षेत्रों का तापमान भी बढ़ने लगता है। अल-नीनो का भारत पर प्रभाव भारत में अल नीनो का प्रभाव साफ दिख रहा है। पिछले दो साल से मानसून सामान्य से कम रह रहा है। इससे किसानों की फसलें खराब हो रही हैं। भारत के साथ इंडोनेशिया और ऑस्ट्रेलिया में भी सूखे के आसार बढ़ जाते हैं।अल नीनो 1950 के बाद सबसे मजबूत अल नीनो का प्रभाव सर्दियों में महसूस किया जा रहा है। सामान्य तौर पर गर्मी धीरे-धीरे बढ़ती जा रही है। वैज्ञानिकों के मुताबिक वार्मिंग को लेकर जो चेतावनी प्रशांत महासागर तक के लिए जारी की गई थी, वह दो-तीन महीनों के अंतराल में हिंद महासागर तक फैल गई। वहीं, वार्मिंग को लेकर जो पुराने आंकड़ें मौजूद हैं, उनके अनुसार स्थानीय कारणों की वजह से भी अल नीनो का असर देखा जाता है। अभी जो अल नीनो देखने को मिल रहा है वह काफी मजबूत और ज्याद समय तक टिका रहने वाला है। नेशनल ओसनिक एंड एटमोस्फेरिक एडमिनिस्ट्रेशन (एनओएए) द्वारा हाल ही में जारी एडवाइजरी के मुताबिक वर्तमान अलनीनो साल 1950 के बाद का तीसरा सबसे बड़ा और मजबूत है।अल नीनो वर्ष में तापमान सामान्य से अधिक आमतौर पर अल नीनो वर्ष में तापमान सामान्य से थोड़ा ज्यादा रहता है। विगत 100 साल में तापमान में उतार-चढ़ाव देखने को मिला है जिसे नीचे दिए गए चार्ट के माध्यम से समझा जा सकता है। चार्ट में तापमान डिग्री सेल्सियस में दिया गया है। इसे साल 1972 से 2010 तक के आंकड़ों के जरिए दिखाया जा रहा है जो इस प्रकार है:- क्रम संख्या अक्टूबर-दिसंबर न्यूनतम तापमान अक्टूबर-दिसंबर अधिकतम तापमान जनवरी-फरवरी न्यूनतम तापमान जनवरी-फरवरी अधिकतम तापमान सामान्य तापमान 16.51 डिगी सेल्सियस 27.15 डिगी सेल्सियस 13.85 डिगी सेल्सियस 24.56 डिगी सेल्सियस 1. 1972-73 16.53 27.21 14.12 25.35 2. 1982-83 16.81 27.26 13.57 24.62 3. 1997-98 17.21 26.65 14.49 24.96 4. 2009-10 17.20 27.96 14.51 25.96भारत में वेस्टर्न डिस्टर्वेंस का अभाव उत्तर-पश्चिम भारत में दिसंबर के आखिरी हफ्ते और जनवरी के पहले हफ्ते में ज्यादा बारिश होने की वजह से तापमान में गिरावट दर्ज की गई और हवा में नमी की मात्रा भी बढ़ गई। बारिश में कमी की वजह वेस्टर्न डिस्टर्वेंस की कमी भी है।
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