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जानिए, क्‍यों फ्लॉप हो जाती है ब्‍लैकमीन स्‍कीम, क्‍या है इसकी वजह

नई दिल्‍ली।विदेश में जमा ब्‍लैकमनी को वापस लाने की मोदी सरकार की मुहिम और स्‍कीम दोनों ही फ्लॉप साबित हुई है। दरअसल एक साल की मशक्‍कत के बाद सरकार ने 1 जुलाई, 2015 को ब्‍लैकमनी के लिए सख्‍त कानून बनाया और स्‍वेच्‍छा से इसकी घोषणा करने वालों को कु‍छ रियायत के साथ एक मौका भी दिया था। इसके बावजूद 30 सितंबर, 2015 तक महज 638 लोगों ने मात्र 4,147 करोड़ रुपए के ब्‍लैकमनी का ही खुलासा किया। जबकि लोगों को सपने कई लाख करोड़ डॉलर के दिखाए गए थे। ऐसे में सवाल पैदा होता है कि आखिर क्‍यों पिछली बार की तरह यह स्‍कीम फेल हो गई और इसकी क्‍या है वजह।
 
ब्‍लैकमनी होल्‍डर्स की पहचान करना कठिन
 
जेएनयू में इकोनॉमिक्‍स के प्रोफेसर और ब्‍लैकमनी मामलों के जानकार अरुण कुमार के मुताबिक सरकार के इस स्‍कीम के विफल होने की सबसे बड़ी वजह किसके पास और कितनी ब्‍लैकमनी है, इसको तय कर पाना सरकारी एजेंसियों के लिए मुशिकल है। क्‍योंकि लेयरिंग प्रोसेस से हवाला के जरिए ब्‍लैकमनी देश से विदेश में भेजी जाती है। जिसकी वजह से उसके बारे में जानकारी हासिल कर पाना बेहद कठिन हो जाता है। कुमार के अनुसार देश में जितनी ब्‍लैकमनी है, उसका मात्र 10 फीसदी ही विदेश भेजा जाता है।
 
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