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    क्‍या है ग्रीस संकट, क्‍या है इसकी वजह और क्‍या होगा इसका असर

    क्‍या है ग्रीस संकट, क्‍या है इसकी वजह और क्‍या होगा इसका असर
    नई दिल्ली। ग्रीस का संकट अहम मोड़ पर है। अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) का डिफॉल्टर बनने वाला वह दुनिया का पहला देश बन गया है। क्‍योंकि ग्रीस डेडलाइन के अंदर कर्ज का 1.5 बिलियन यूरो आईएमएफ को वापस करने में विफल रहा। ग्रीस में अर्थव्यवस्था की हालत खस्ता है। वहां स्थिति इतनी बदतर हो चुकी है कि बैंकों को 7 जुलाई तक के लिए बंद कर दिया गया है। दरअसल ग्रीस में इस संकट की आहट लंबे समय से थी। जब 1999 में आए भयंकर भूकंप और 2004 के ओलंपिक की तैयारियों की वजह से ग्रीस लगातार कर्ज में डूबता चला गया। ग्रीस सरकार ने भारी कर्ज लेकर देश के पुनर्निर्माण पर अंधाधुंध पैसे खर्च किए। इसके बाद कर्ज चुकाने के लिए और कर्ज लिया और यह सिलसिला चल निकला जो अब बड़े संकट के रूप में सामने है। ग्रीस का संकट इतना बड़ा है कि वह यूरोजोन से बाहर हो सकता है। इसके साथ ही ग्रीस को दिवालिया भी घोषित किया जा सकता है। अब सभी को 5 जुलाई का इंतजार है। क्‍योंकि उस दिन ग्रीस में होने वाले जनमत संग्रह में ग्रीस के यूरोजोन में बने रहने पर फैसला होगा।
     
    ग्रीस संकट की क्‍या है वजह
     
    साल 2008 की आर्थिक मंदी ने दुनिया के प्रत्येक हिस्से पर अपना असर डाला। ग्रीस की अर्थव्यस्था भी इससे अछूती नहीं रह सकी। जब आर्थिक मंदी का दौर शुरू हुआ तो ग्रीस उससे निपटने के लिए बिल्कुल भी तैयार नहीं था। 1999 में आए विनाशकारी भूकंप से ग्रीस का ज्यादातर हिस्सा तबाह हो गया था और लगभग 50,000 इमारतों का पुनर्निर्माण करना पड़ा था। सरकार ने इन सभी काम को सरकारी धन खर्च करके पूरा किया। इसी दौरान ग्रीस की शिपिंग और पर्यटन उद्योग को भी गहरा धक्का लगा। इन संकटों की वजह से ग्रीस की विकास दर सबसे निचले स्तर पर पहुंच गई और वित्तीय घाटा बढ़त गया। जिसकी भरपाई हेतु ग्रीस ने अंतरराष्‍ट्रीय मुद्रा कोष (आईएफएम) और यूरोपीय केंद्रीय बैंक (ईसीबी)  से कर्ज लिया। ग्रीस की जनसंख्या जहां 1 करोड़ दस लाख के करीब है, जबकि उस पर कर्ज 340 अरब यूरो से ज्‍यादा है। वहीं यहां बेरोजगारी दर 27 फीसदी और ब्याज दरें 30 फीसदी के स्‍तर पर पहुंच गई है। जबकि ग्रीस को अब तक 2 से 3 चरणों में आर्थिक सहायता दी जा चुकी है। ग्रीस और उसका कर्ज यूरोजोन के लिए मुसीबत बना हुआ है।
     
    ईयू और ग्रीस के बीच का संबंध
     
    दरअसल यूरोप में स्थित 28 सदस्य देशों का संघ यूरोपियन यूनियन (ईयू) कहलाता है। इस पूरे संघ का एक साझा बैंक है। इसके अलावा ईयू का साझा अंतरराष्ट्रीय कोर्ट है, साझा काउंसिल और साझा आयोग है। पूरा संघ एक साझे बाजार के रूप में काम करता है। जहां लोगों, वस्तुओं और सेवाओं की बेरोकटोक आवाजाही हो सकती है। साल 2002 में इनमें से 18 देशों ने अपनी मुद्रा को साझा करके यूरो को जन्म दिया। यूरो मुद्रा साझा करने वाले समूह को यूरोजोन के नाम से जाना जाता है। ईयू का हिस्‍सा होने की वजह से ग्रीस में भी यूरो करंसी ही चलती है।
     
    ईयू से बाहर निकलना चाहता है ग्रीस
     
    ग्रीस यूरोपीय यूनियन से बाहर निकलना चाहता है ताकि अपनी अर्थव्‍यवस्‍था को ठीक करने का रास्ता निकाल सके। लेकिन यूरोपीय यूनियन बिखरने की डर से ऐसा नहीं चाहता। यूरोपीय यूनियन का हिस्‍सा होने की वजह से ग्रीस में भी यूरो करंसी ही चलती है। ग्रीस की नई सरकार अब कोई बेलआउट पैकेज नहीं लेना चाहती। अपनी इकोनॉमी को अपने अनुकूल स्‍वरूप देने में ग्रीस को काफी मुश्किलें आ रही है। दरअसल अपनी इकोनॉमी को बचाने के लिए ग्रीस करंसी की कीमत भी घटाने का दांव नहीं चल सकता है। क्‍योंकि उसको यूरोपीय यूनियन के साथ बंधकर चलना पड़ रहा है। यही कारण है कि ग्रीस यूरोपीय यूनियन से बाहर आना चाहता है। ग्रीस को इस संकट से निकालने के लिए तमाम कोशिशें की जा रही है। लेकिन इसके नाकाम रहने की स्थिति में ग्रीस को डिफॉल्ट करार दिया जाएगा।
     
    क्‍या है ग्रीस का बेलआउट पैकेज
     
    यूरोप में हलचल मचाने वाले ग्रीस कर्ज से यूरोपीय यूनियन (ईयू) के अलावा दुनिया के अन्‍य देशों में भी संकट गहराता जा रहा है। क्‍योंकि ग्रीस को कुछ आर्थिक सुधारों की शर्तों के साथ अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएफएम) और यूरोपीय केंद्रीय बैंक (ईसीबी) ने बेलआउट पैकेज दिया है। क्‍योंकि ग्रीस का राजकोषीय घाटा हकीकत में कहीं ज्यादा है और वह कर्ज में पूरी तरह से डूबा हुआ है। जिस समय ग्रीस को संकट से निकलने के लिए बेलआउट पैकेज दिया गया उस पर जीडीपी की तुलना में 113 फीसदी कर्ज था, जो कि यूरोजोन में सबसे ज्यादा था। 

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