पहले Loksabha चुनाव में गोदरेज ने बनाए थे 5 रुपए प्रति नग में 16 लाख बैलेट बॉक्स, जानें ऐसी ही रोचक जानकारी 

अभी भारत को आजाद हुए पांच साल ही हुए थे। संविधान लागू हुए भी दो साल। इतने कम वक्त में ही लोकतंत्र की कामयाबी की परीक्षा की मुश्किल घड़ी आ गई। परीक्षा चुनावों की। देश के पहले आम चुनाव की। वह भी ऐसे मुल्क में जहां 85 फीसदी आबादी का अक्षर ज्ञान तक नहीं। जिसे लोकतंत्र या अपने वोट डालने का अधिकार तक नहीं मालूम। सबसे बड़ी चिंता संसाधनों की। वोट कैसे डलेंगे,  मत पेटियों का इंतजाम कैसे होगा, अमिट स्याही कहां से आएगी जैसे कई सवाल उस समय भारतीय राजनीति में गूंज रहे थे।  आप भी जानें कैसे हमने इन चुनौतियां का समाधान किया?

money bhaskar

Mar 23,2019 01:54:00 AM IST

नई दिल्ली. अभी भारत को आजाद हुए पांच साल ही हुए थे। संविधान लागू हुए भी दो साल। इतने कम वक्त में ही Democracy की कामयाबी की परीक्षा की मुश्किल घड़ी आ गई। परीक्षा चुनावों की। देश के पहले आम चुनाव (Loksabha election) की। वह भी ऐसे मुल्क में जहां 85 फीसदी आबादी का अक्षर ज्ञान तक नहीं। जिसे लोकतंत्र या अपने वोट डालने का अधिकार तक नहीं मालूम। सबसे बड़ी चिंता संसाधनों की। वोट कैसे डलेंगे, मत पेटियों का इंतजाम कैसे होगा, अमिट स्याही कहां से आएगी जैसे कई सवाल उस समय भारतीय राजनीति में गूंज रहे थे। आप भी जानें कैसे हमने इन चुनौतियां का समाधान किया? इस मुश्किल काम का जिम्मा मिला सुकुमार सेन को। देश के पहले मुख्य चुनाव आयुक्त। जिन्होंने विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र में चुनाव का पूरा ढांचा खड़ा किया।

सेन ने निकला था बैलेट पेपर से Voting का रास्ता

मारे सहयोगी प्रकाशन दैनिक भास्कर की खबर के मुताबिक 22 की उम्र में सुकुमार सेन ने इंडियन सिविल सर्विस जॉइन की थी। आजादी के वक्त वे पश्चिम बंगाल के चीफ सेक्रेटरी थे। वो सर्वोच्च पद...जहां तक कोई आईसीएस ऑफिसर ब्रितानी राज में नहीं पहुंच सकता था। सेन ने ही बैलेट पेपर के जरिए मतदान का रास्ता निकाला। फिर आनन-फानन में गोदरेज कंपनी को बैलेट बॉक्स बनाने का काम दिया गया। पांच रुपए प्रति नग के हिसाब से 16 लाख बैलेट बनाने थे। कंपनी ने रोज 15 हजार बैलेट बनाकर यह मुश्किल काम पूरा किया। इतिहासकार रामचंद्र गुहा की किताब "भारत गांधी के बाद' से यह जानकारियां हासिल हुई हैं।

पहले चुनाव की यह बड़ी बातें

1. कुल वोटर 17.6 करोड़ थे। ये वाे लोग थे जो 21 की उम्र से ऊपर थे। यह पहली बार था जब उम्र, लिंग के आधार पर पूरे देश में वोटर्स का डेटाबेस तैयार हुआ। देशभर में करीब साढ़े सोलह हजार क्लर्कों को छह महीनों के लिए कॉन्ट्रैक्ट पर रखा गया।
2. जिन लोगों को प्राथमिक शिक्षा तक हासिल नहीं थी। उन्हें वोट देना समझाना मुश्किल काम था। देश के तीन हजार से ज्यादा थिएटर में फिल्मों के दौरान डॉक्यूमेंट्री दिखाई जाती, जिसमें वोट देने का
तरीका समझाया जाता था।
3. दूसरा बड़ा सवाल था कि वोटर कैसे अपनी पसंद का उम्मीदवार चुनेगा। तो हल निकला हर उम्मीदवार का अलग बैलेट बॉक्स होगा। वोटर बैलेट बॉक्स पर पार्टी का चिह्न देखकर अपना मतपत्र उसमें
डाल देगा।
4. महिलाएं पर्दे में रहती थीं। उनकी खुद की कोई पहचान नहीं थी। ऐसे में जब मतदाता सूची में नाम जोड़े गए तो महिलाओं के नाम कुछ इस तरह लिखे गए थे...रामू की मां, इमरान की जोरू...जब वोटर
लिस्ट सुकुमार सेन ने देखी तो नाराज हुए। इस तरह के 28 लाख नामों को हटाया गया।
5. सुकुमार सेन परेशान थे कि निरक्षर वोटरों को कैसे पता चलेगा कि उनका उम्मीदवार कौनसा है। यही से दलों को चुनाव चिह्न देने का आइडिया आया। सभी 14 नेशनल पार्टियों को चिह्न दिए गए। पहले चुनाव में कांग्रेस का सिंबल बैलों की जोड़ी था। हाथ फॉरवर्ड ब्लॉक का चिह्न था।
6. पहला चुनाव 4500 सीटों पर हुआ था। 489 तो लोकसभा की...बाकी राज्यों की सरकारों की। पहले लोकसभा चुनाव के लिए जानी-मानी कंपनी गोदरेज ने विक्रोली प्लांट में 16 लाख बैलेट बॉक्स तैयार
किए थे। एक बॉक्स की कीमत पांच रुपए आई थी। रोज 15 हजार बॉक्स बनते थे।
7. एक व्यक्ति एक से ज्यादा वोट न दे पाए, इसलिए तब अमिट स्याही विकसित की गई। पहले चुनाव में अमिट स्याही की 3 लाख 89 हजार 816 शीशियां इस्तेमाल हुईं।

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