पिघलती चॉकलेट देख आया आइडिया, खड़ा हो गया 1.5 लाख करोड़ का बिजनेस

बहुत ही कम लोग जानते हैं कि आपके घर में लगा माइक्रोवेव-ओवन का अविष्कार कैसे हुआ। एक ऐसे व्यक्ति ने इसका अविष्कार किया, जो कभी कॉलेज नहीं गया। लेकिन बेहद तकलीफों भरा बचपन देखने वाले इस शख्स ने हर चीज को गंभीरता से लेने का गुण विकसित कर लिया। पर्सी स्पेंसर नाम के इस  शख्स  का यह गुण काम आया और उसने दुनिया भर में अपना नाम कर दिया। 

 

Money Bhaskar

Jan 02,2019 04:37:00 PM IST

नई दिल्ली। बहुत ही कम लोग जानते हैं कि आपके घर में लगा माइक्रोवेव-ओवन का अविष्कार कैसे हुआ। एक ऐसे व्यक्ति ने इसका अविष्कार किया, जो कभी कॉलेज नहीं गया। लेकिन बेहद तकलीफों भरा बचपन देखने वाले इस शख्स ने हर चीज को गंभीरता से लेने का गुण विकसित कर लिया। पर्सी स्पेंसर नाम के इस शख्स का यह गुण काम आया और उसने दुनिया भर में अपना नाम कर दिया।


ऐसे मिला बिजनेस आइडिया
- सेकेंड वर्ल्ड वॉर के दौरान पर्सी एक ऐसी कंपनी के साथ जुड़े थे, जो अमेरिकी सेनाओं के लिए रडार बना रही थी।
- एक दिन काम करते वक्त पर्सी ने गौर किया कि उनकी जेब में रखी चॉकलेट कवर के अंदर ही पिघल गई है।
- ऐसा अनुभव करने वाले पर्सी पहले नहीं थे, प्लांट में काम करने वाले कई लोगों ने ऐसा अनुभव किया था, लेकिन वो इस पर गौर नहीं करते थे।
- पर्सी ने गौर किया कि जिस समय रडार सेट चालू रहता है, तब चॉकलेट गर्म होकर पिघल जाती है।
- पर्सी ने इस खासियत को पहचान लिया और आने वाले समय में ये माइक्रोवेव ओवन के रूप में सामने आया जो आज घर घर में आम हो चुका है।


टाइटैनिक हादसे से कनेक्शन
- पर्सी की सफलता के पीछे जाने अनजाने टाइटैनिक हादसे का कनेक्शन भी है।
- 18 साल की उम्र में जब पर्सी ने आर्मी ज्वाइन की थी, तो उस साल मीडिया में टाइटेनिक हादसा छाया हुआ था। दुर्घटना के साथ जिस स्टोरी ने मीडिया में सबसे ज्यादा सुर्खियां बटोरी थी, वो थी टाइटैनिक के वायरलैस ऑपरेटर की कहानी। इन कहानियों को पढ़कर ही पर्सी ने भी वायरलैस कम्युनिकेशंस पर फोकस किया।
- सेना में रहते हुए पर्सी रेडियो टेक्नोलॉजी का एक्सपर्ट बना। ये सब उसने अपने बल पर किताबें पढ़ते हुए हासिल किया। 1912 में सेना में नौकरी शुरू करने के साथ पर्सी 1939 तक आते आते रडार ट्यूब डिजाइन के एक्सपर्ट बन चुके थे।

4 गुना महंगा था पहला ओवन
- पर्सी ने सबसे पहले अपना एक्सपेरीमेंट पॉपकॉर्न पर किए। इसके बाद तरंगों को केंद्रित करने के लिए एक बॉक्स का डिजाइन किया। 8 अक्टूबर 1945 को पर्सी की कंपनी ने ओवन को पेटेंट करा लिया।
- 1947 में पहला कमर्शियल ओवन मार्केट में उतारा गया। शुरूआती ओवन करीब 6 फुट ऊंचा और 300 किलो से ज्यादा वजनी था। इसकी कीमत 5000 डॉलर के करीब थी। 1947 में एक आम कार करीब 1500 डॉलर की थी। वहीं एक आम अमेरिकी की औसत सालाना सैलरी 3500 डॉलर थी। इस वजह से पर्सी लगातार ओवन पर काम करते रहे।
- 20 साल बाद 1967 में पहला सस्ता ओवन सामने आया जो करीब 500 डॉलर का था। वहीं ये इतना छोटा था कि आम किचन में रखा जा सके। आज ये ओवन हर घर का हिस्सा बन चुके हैं।

कंपनी ने उठाया फायदा
- कमाल की बात ये है कि पर्सी को इस खोज से कमाई के मामले में बड़ा फायदा नहीं हुआ। दरअसल पर्सी अमेरिकन कंपनी रेथियॉन के लिए काम करते थे। इसलिए पेटेंट का फायदा सीधे कंपनी को मिला।
- पर्सी को इस खोज की वजह से कंपनी के बोर्ड ऑफ डायरेक्टर में शामिल किया गया। वहीं इसी वजह से पर्सी को डॉक्टरेट की डिग्री मिली हालांकि पर्सी कभी भी कॉलेज भी नहीं गए। ऊंची पोजीशन मिलने की वजह से पर्सी उस दौर के अमीरों की लिस्ट में शामिल हो गए। हालांकि इनकी खोज से कंपनी ने आने वाले सालों में करोड़ों की कमाई की।
-1967 में रेथियॉन ने एक और कंपनी आमना को खरीदा जिसने सस्ते और हल्के ओवन लॉन्च किए। लॉन्च के साथ ही ओवन मार्केट में हिट हो गए।
- 1970 में 40 हजार माइक्रोवेव की बिक्री हुई थी जो सिर्फ 5 साल में 10 लाख तक पहुंच गई यानि सेल्स 5 साल में 2 करोड़ डॉलर से बढ़कर 50 करोड़ डॉलर तक पहुंच गई।
- 2020 तक माइक्रोवेव ओवन का मार्केट 2500 करोड़ डॉलर यानि करीब 1.5 लाख करोड़ रुपए का होने का अनुमान है।

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