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Home » Business MantraAM Naik gets Padma Vibhushan earlier he fought Ambani and Birla

कभी अंबानी-बिड़ला को अकेले दी थी मात, आज मोदी सरकार से मिला बड़ा सम्मान

एलएंडटी के ए एम नाइक को मिला पद्म विभूषण सम्मान

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नई दिल्ली. लार्सन एंड टुब्रो (Larsen and Toubro) को नई ऊंचाइयों को ले जाने वाले अनिल मणिभाई नाइक (Anil Manibhai Naik) को भारत के दूसरे बड़े नागरिक सम्मान पद्म विभूषण (Padma Vibhushan) सम्मान के लिए चुना गया है। ए एम नाइक नाम से चर्चित इस शख्स का उद्योग जगत में सफलता की राह आसान नहीं रही। यह वही शख्स हैं, जो एलएंडटी (L&T) को बचाने के लिए अकेले अंबानी फैमिली और आदित्य बिड़ला ग्रुप से टकरा गए थे। इतना ही नहीं उन्होंने उद्योग जगत के दिग्गज इन दोनों कॉरपोरेट ग्रुप के हाथों कंपनी को बिकने से बचाने में भी कामयाबी हासिल की थी।

 

एक ही कंपनी में हो गए 54 साल

वर्ष 1965 में जूनियर इंजीनियर के रूप में एलएंडटी से जुड़ने वाले नाइक अब कंपनी के चेयरमैन हैं। यह कंपनी 1.82 लाख करोड़ रुपए की मार्केट वैल्यू के साथ भारत की बड़ी एमएनसी कंपनियों में से एक है। एलएंडटी को कंस्ट्रक्शन बिजनेस के साथ ही डिफेंस सेक्टर में मजबूती से स्थापित करने में ए एम नाइक की अहम भूमिका रही है। नाइक को इससे पहले वर्ष 2009 में देश की तीसरा बड़ा सम्मान पद्म भूषण (Padma Bhushan) भी मिल चुका है।

 

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टेकओवर की कोशिशों को किया था नाकाम

एक दौर में अंबानी, बिड़ला समेत कई कारपोरेट के तरफ से हो रही टेकओवर की कोशिशों से कंपनी को बेहद मुश्किल दौर से गुजरना पड़ा था। ऐसे में नाइक ने अपने कर्मचारियों को भी समझाया कि यदि हम सब इसके मालिक रहेंगे तो कोई भी बाहर का व्यक्ति दोबारा कंपनी को खरीदने की कोशिश नहीं करेगा। उन्होंने तत्कालीन प्रधानमंत्री के सामने भी यह प्रस्ताव रखा। महीनों तक चली चर्चा के बाद एलएंडटी के कर्मचारियों के ट्रस्ट ने बिड़ला की पूरी हिस्सेदारी खरीद ली और बिड़ला को बाहर का रास्ता दिखाया।  ऐसा था नाइक का सफर...

 

अंबानी को दी थी तगड़ी टक्कर

नाइक ने एक इंटरव्यू में कहा था कि 1980 और 1990 के दशक में अंबानी की टेकओवर की कोशिशें बेहद गंभीर थीं। नाइक उस समय बोर्ड में भी नहीं थे। नाइक के मुताबिक अंबानी कंपनी को एक अन्य उद्योगपति छाबड़िया से बचाने के लिए आए थे। धीरूभाई एलएंडटी के अधिग्रहण की दिशा में धीरे-धीरे आगे बढ़ रहे थे। उन्होंने अपने दोनों बेटों (मुकेश और अनिल) को भी बोर्ड ऑफ डायरेक्टर्स में जगह दिला दी। एलएंडटी बोर्ड इस बात को भांप रहा था कि अंबानी कंपनी पर पूरा होल्ड चाहते हैं। उस समय एलएंडटी में धीरूभाई की स्थिति इतनी मजबूत हो गई थी कि उन्होंने कंस्ट्रक्शन कंपनी के नाम पर बाजार से करोड़ों रुपए भी उठा लिए थे। तब तक कंपनी में अंबानी की हिस्सेदारी बढ़कर लगभग 19 फीसदी तक हो चुकी थी, लेकिन 1989 में राजनीतिक परिदृश्य इस तरह बदला कि धीरूभाई के हाथ से यह मौका भी निकल गया। इस बार एलआईसी (उस वक्त की सबसे बड़ी शेयरहोल्डर) आगे आई और उसकी पहल पर अंबानी को एलएंडटी से बाहर जाना पड़ा।
 

 
धीरूभाई ने नहीं मानी हार, 1991 में फिर की कोशिश

धीरूभाई ने हार नहीं मानी। 1991 में अंबानी के भाग्य ने फिर उनका साथ दिया। धीरूभाई ने खुद को एलएंडटी का चेयरमैन और मुकेश अंबानी को एमडी बनवाने की कोशिश की। तब तक एलऐंडटी समझ चुकी थी कि अंबानी उसके लिए छाबड़िया से बड़े खतरे बन गए हैं, जिसे रोकने के लिए कंस्ट्रक्शन कंपनी खुद उन्हें लाई थी। एलऐंडटी की सबसे बड़ी हिस्सेदारी एलआईसी की जनरल मीटिंग में यह मामला जोर-शोर से उछला, लेकिन ज्यादातर शेयरहोल्डर्स ने इसे नकार दिया। इस तरह से धीरूभाई का सपना तो टूट गया, लेकिन वह कुछ ऐसा कर गए जिससे एलएंडटी के सामने अधिग्रहण की चुनौती बरकरार रही।
 

नाकाम अंबानी ने बिड़ला को बेची अपनी स्टेक

धीरूभाई को आखिरकार जाना पड़ा, लेकिन जाते-जाते वह अपनी हिस्सेदारी उस दौर के एक अन्य बड़े कारोबारी कुमार मंगलम बिड़ला को बेच गए। यह इसलिए भी अहम था, क्योंकि बिड़ला की कंपनी उस वक्त एलएंडटी की सबसे बड़ी प्रतिद्वंदी कंपनियों में से एक थी। बिड़ला के लिए एलएंडटी बाजार का ऐसा ‘नगीना’ थी, जिसके अधिग्रहण पर उनका बाजार पर काफी हद तक एकाधिकार हो जाता। हालांकि बिड़ला का ख्वाब भी एक ऐसे शख्स ने तोड़ा, जिसे उन्होंने खुद एलऐंडटी का सीईओ और एमडी बनवाया था।
 

 
नाइक ने ऐसे तोड़ा बिड़ला का सपना

भले ही बिड़ला ने ही नाइक को सीईओ बनाया था, लेकिन एलएंडटी के टेकओवर की कोशिशों में वही सबसे बड़ी बाधा बन गए। कुमार मंगलम बिड़ला ने फरवरी, 2002 में एलएंडटी के टेकओवर की सबसे बड़ी कोशिश की, जब वह 190 रुपए के रेट ओपन ऑफर लेकर आए। मैं उस समय कह रहा था कि हमने शेयरहोल्डर वैल्यु तैयार की है। उस समय हर किसी ने कहा कि एलएंडटी टेक्निकली अच्छी कंपनी है, लेकिन मार्केट कैप का क्या? नाइक को हर जगह से निराशा ही हाथ लग रही थी। नाइक ने एलएंडटी को बचाने के लिए प्रधानमंत्री से लेकर कंपनी की सबसे बड़ी शेयरहोल्डर एलआईसी के सामने भी प्रस्तुतीकरण दिए। उसके बाद नाइक ने ऐसा दांव चला, जिसने बिड़ला ही उन दूसरी कंपनियों के सारे रास्ते बंद कर दिए जो एलएंडटी के टेकओवर का सपना देख रही थीं।
 

6 हजार करोड़ से 1.82 लाख करोड़ की हुई कंपनी

वर्ष 2003 में कंपनी की मार्केट वैल्यू लगभग 6 हजार करोड़ रुपए थी, अब तक नाईक की देखरेख में कंपनी की मार्केट कैप 31 गुना तक बढ़ गई। इस समय 1.82 लाख करोड़ रुपए से ज्यादा है, जिसमें कंपनी के कर्मचारियों (कर्मचारी ट्रस्ट) की भी बड़ी हिस्सेदारी है। नाईक ने कंपनी के लिए जो सपना देखा था वो पूरा हो रहा है। वह कहा करते थे कि एक दिन कंपनी इतिहास जरूर बनाएगी।
 

 
एक समय इंग्लिश में कमजोर होने से नहीं मिली थी नौकरी

ए एम नाइक गुजरात के एक छोटे से गांव से ताल्लुक रखते थे, उनके पिता शिक्षक थे। नाइक ने गुजरात के वल्लभ विद्यानगर के बिड़ला विश्वकर्मा इंजीनियरिंग कॉलेज से मैकेनिकल इंजीनियरिंग में बैचलर डिग्री की थी। वह मुंबई की एक कंपनी में गए तो वहां पर्सनल मैनेजर ने उनसे इंग्लिश में सुधार करने के लिए कहा। उन्होंने अपनी इंग्लिश स्किल पर काम शुरू कर दिया। इस बीच उन्होंने एक पारसी के स्वामित्व वाली कंपनी नेस्लर बॉयलर्स में नौकरी मिली। 15 मार्च 1965 को उन्होंने एलएंडटी में जूनियर इंजीनियर के रूप में नौकरी मिली। 1986 में वह जनरल मैनेजर बन गए थे। 1999 में सीईओ के बाद 2003 में वह एलएंडटी का चेयरमैन बन गए थे।

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