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Budget 2019 : क्या इन 9 बजट के बारे में जानते हैं आप, जिन्होंने बनाया इतिहास

मोदी सरकार ने बदली बजट की परम्परा, आजादी के बाद पेश हुआ था पहला अंतरिम बजट

Budget 2019 : who tabled fist Indian budget after freedom

Budget 2019 : भारत का आर्थिक सफर हमेशा एक जैसा कभी नहीं रहा। नेहरू के लाइसेंस राज से मोदी के उदारीकरण तक देश ने कई ऐसे बजट देखे, जिन्होंने भारत की इकोनॉमी को नया आकार दिया। आजादी के तुरंत बाद नवंबर 1947 का अंतरिम बजट, 1951, 1956, 1961 और 1991 समेत ऐसे कुछ विशेष बजट हैं, जिन्होंने भारत में आर्थिक बदलाव की नई इबारत लिखी। आइए जानते हैं इतिहास लिखने वाले ऐसे ही कुछ बजट के बारे में- 
 

 
नई दिल्‍ली.
भारत का आर्थिक सफर हमेशा एक जैसा कभी नहीं रहा। नेहरू के लाइसेंस राज से मोदी के उदारीकरण तक देश ने कई ऐसे बजट देखे, जिन्होंने भारत की इकोनॉमी को नया आकार दिया। आजादी के तुरंत बाद नवंबर 1947 का अंतरिम बजट, 1951, 1956, 1961 और 1991 समेत ऐसे कुछ विशेष बजट हैं, जिन्होंने भारत में आर्थिक बदलाव की नई इबारत लिखी। आइए जानते हैं इतिहास लिखने वाले ऐसे ही कुछ बजट के बारे में- 
 

मोदी सरकार ने बदली परम्परा
मोदी सरकार ने बजट पेश करने को लेकर सालों से आ रही दो परम्पराओं को बदल दिया। पहले बजट 28 फरवरी को पेश होता था, लेकिन 2018 में यह तारीख बदल दी गई और 1 फरवरी 2018 को वित्त मंत्री अरुण जेटली ने बजट पेश किया। इसी बजट में सरकार ने रेल बजट को भी समाहित कर दिया। जबकि इससे पहले रेल बजट अलग से पेश किया जाता था। आइए, आजादी के बाद 8 ऐसे बजट के बारे में जानते हैं, जो ऐतिहासिक साबित हुए। 

 

1947 का बजट 

खासियत: देश का पहला बजट
वित्त मंत्री: आर के षनमुखम चेट्टी (देश के पहले वित्त मंत्री)
बजट पेश हुआ: 26 नबंबर 1947
 
बजट का निर्णय: बजट पेश करने का फैसला ही इस आम बजट का सबसे अहम फैसला रहा। यह बजट 15 अगस्त 1947 से 31 मार्च 1948 तक (7.5 माह) के लिए पेश किया गया। इससे देश में फरवरी में ही बजट पेश करने की परंपरा की शुरुआत हुई।
 
ऐसा करने की वजह: दरअसल इससे पहले जिस बजट को सरकार की ओर से मंजूरी दी गई थी, वह देश के बंटवारे के साथ प्रभावहीन हो गया था। भारत के सामने पाकिस्तान से आने वाले शरणार्थियों को बसाने की बड़ी चुनौती थी। इसके लिए सरकार के पास पैसा नहीं था। ऐसे में बजट ने सरकार के खर्चों का मार्ग प्रशस्त किया।

  
खास बात: देश का यह पहला बजट 197.3 करोड़ रुपए का था। सरकार ने 171.1 करोड़ रुपए के राजस्व का अनुमान लगाया था। इस हिसाब से सरकार पहले ही बजट में 24.59 करोड़ के घाटे में रही। व्यापक गरीबी के बाद भी इस बजट में 92 करोड़ रुपए (बजट की करीब 45 फीसदी राशि ) का आवंटन रक्षा के लिए किया गया था। इस बजट में पाकिस्तान से आए लोगों को बसाने और खाद्य आपूर्ति सुनिश्चित करने के लिए बड़े कदम उठाए गए थे। 
 

1951 का बजट
 
खासियत: लोकतांत्रिक भारत का पहला बजट
वित्त मंत्री: जॉन मथाई
बजट पेश हुआ: 28 फरवरी 1950
 
बजट का निर्णय: इस बजट ने देश में योजना आयोग (अब नीति आयोग) की स्थापना का रास्‍ता साफ किया। रूस के तर्ज पर बने इसी आयोग ने देश में विकास को एक आकार दिया।
 
ऐसा करने की वजह: तत्कालीन सरकार का मानना था कि आजादी के बाद से ही देश भारी महंगाई और गरीबी के अलावा लो प्रोडक्टिविटी के साथ खस्ताहाल निवेश और प्रोडक्शन की समस्या से जूझ रहा था। ऐसे में एक पूर्णकालिक आयोग ही देश के भीतर मौजूद संसाधनों के अधिकतम इस्तेमाल से जरूरत के मुताबिक, अलग-अलग क्षेत्रों में विकास का खाका खींच सकता था। 
इससे भारत में क्‍या बदला: बाद के सालों में या कहें कि अब तक भारत ने बुनियादी विकास का जो सफर तय किया है, उसका रास्ता योजना आयोग ने ही दिखाया था। 2014 में आई मोदी सरकार ने इसे थोड़ा आधुनिक और इसकी कार्यप्रणाली को ज्यादा प्रभावी बनाने के लिए इसके ढांचे में बदलाव के साथ इसका नाम बदलकर नीति आयोग कर दिया। 

 

बजट की अहम बातें: पहली बार बजट की विस्तृत प्रति पेश की गई। बजट में इनकम टैक्स में कटौती की अब तक की सबसे बड़ी घोषणा की गई। सरकार ने इनकम टैक्स की दर को पांच आना (30 फीसदी) प्रति रुपए से घटाकर चार आना (करीब 25 फीसदी) कर दिया। वहीं 1.21 लाख से अधिक आय वालों पर 8.5 आना प्रति‍ रुपए के हिसाब से सुपर टैक्स लगाया गया। उस समय अधिकतम इनकम टैक्स 12.5 आना (78 फीसदी) प्रति रुपए तक था।  

 


1957 का बजट
 
वित्त मंत्री: टीटी कृष्णामचारी
खासियत: देश में एक टैक्स ढांचा सामने आया
बजट पेश करने की तरीख: 15 मई 1957
 
बजट का निर्णय: इंपोर्टर लाइसेंस सिस्टम के जरिए इंपोर्ट पर बहुत से प्रतिबंध लगाए गए। एक्सपोर्ट को बढ़ावा देने के लिए एक्सपोर्ट रिस्क इन्श्योरेंस कॉर्प का गठन किया गया। खर्च पर लगने वाले वेल्थ टैक्स की शुरुआत। इसके अलावा रेल टिकट पर टैक्स लगाया गया। एक्साइज ड्यूटी को बढ़ाकर अधिकतम 400 फीसदी तक दिया। इनकम टैक्स की दर को बढ़ाया गया। बजट में पहली बार एक्टिव इनकम (सैलरी और बिजनेस) और पैसिव इनकम ( ब्याज और किराया) की परिभाषा तय की गई।   
 
ऐसा करने की वजह: फॉरेन एक्सचेंज रिजर्व और बैलेंस ऑफ पेमेंट पर दबाव के कम करने के लिए सरकार ने यह कदम उठाए। खाद्यान्न के अधिक इंपोर्ट के कारण बढ़ी महंगाई इसका प्रमुख कारण थी।
 
भारत में क्या असर पड़ा: इंपोर्ट पर रोक और ज्यादा टैक्स से हालात खासे बिगड़ गए। बढ़ता बाहरी घाटा ज्यादा जटिल हो गया। 
 
खास बात: टीटी कृष्णमचारी ने टैक्स से जुड़े ये निर्णय हंगरी के अर्थशास्त्री निकोलस कैल्डोर के कहने पर लिए थे। टीटी कृष्णामचारी ने IDBI बैंक, इंडस्ट्रियल क्रेडिट एंड इन्वेस्टमेंट कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया, UTI और दामोदर घाटी कॉरपोरशन के गठन में अहम भूमिका निभाई। 

 


1968 का बजट
 
खासियत: पहला पीपुल सेंसिटिव बजट
वित्त मंत्री: मोरारजी देसाई
बजट पेश करने की तारीख: 29 फरवरी 1968


बजट का निर्णय: फैक्टरी के गेट पर एक्साइज विभाग के अधिकारियों द्वारा किसी सामान की स्टैंपिंग और एसेसमेंट की बाध्यता को खत्म किया गया। इसकी जगह सेल्फ एसेसमेंट का सिस्टम लाया गया। आज भी यही सिस्टम काम कर रहा है।
 
ऐसा करने की वजह: एक्साइज डिपार्टमेंट पर काम का बोझ कम करना और एक्साइज विभाग के फील्ड अधिकारियों को मिली असाधारण शक्तियों को कम करना।  


इसका क्या असर हुआ: इसके चलते देश में मैन्युफैक्चरिेंग को बूस्ट करने में काफी मदद मिली। गुड्स रिमूवल की लंबी प्रक्रिया आसान और छोटी हो गई।


खास बात: मोरारजी देसाई एक मात्र वित्‍त मंत्री थे, जिन्होंने अपने जन्मदिन 29 फरवरी को दो बार 19664 और 1968 में देश का बजट पेश किया। देसाई सबसे ज्यादा 10 बार बजट पेश करने वाले वित्त मंत्री भी बने। पति और पत्नी दोनों के टैक्स पेयर होने पर उन्होंने इस बजट में छूट का एलान किया।  

 
1973 का बजट
 
खासियत: बड़ी कंपनियों का राष्ट्रीयकरण
वित्त मंत्री: यशवंत राव चव्हाण 
बजट पेश किया गया: 28 फरवरी 1973


बजट का निर्णय: देश की जनरल इन्श्योरेंस कंपनियों, कॉपर कॉर्प्‍स और कोयला खदानों के राष्ट्रीयकरण की अहम घोषणा की गई। सरकार ने इसके लिए 65 करोड़ रुपए का आवंटन किया। इसके चलते सरकार का बजट घाटा 550 करोड़ रुपए हो गया। 

    
ऐसा करने का कारण: सरकार का मानना था कि पावर, सीमेंट और स्टील सेक्टर के लिए बढ़ी कोयले की मांग को पूरा करने के लिए ऐसा करना उस वक्त जरूरी था। ऐसा माना जा रहा था कि कोयला खदानों के सरकार के हाथ में आने से वहां काम करने वाले मजदूरों के शोषण में कमी आएगी।   


इसका देश पर क्या असर हुआ: तर्क दिया जाता है कि कोयला खदानों के राष्ट्रीयकरण के चलते ही देश में कोयला उत्पादन में व्यापक बढ़ोत्तरी देखने को मिली। हालांकि, इसके चलते कोयले के मार्केट में कॉम्पिटीशन खत्म हो गया। कोयला उत्पादन में नई तकनीक का विकास नहीं हो सका।


खास बात: चव्हाण महाराष्‍ट्र के सीएम भी रहे। उन्होंने अपने दोनों बजट में सिगरेट पर टैक्स में बढ़ोतरी की।  

 

1986 का बजट
 
खासियत: बहुत ही नपा-तुला बजट

 

वित्त मंत्री: वीपी सिंह

 

बजट पेश करने की तारीख: 28 फरवरी 1986

 

बजट का निर्णय:  इस बजट में MODVAT क्रेडिट का प्रावधान किया गया। इसके तहत फाइनल प्रोडक्ट की जगह रॉ मेटेरियल पर ड्यूटी लगाने का प्रावधान किया गया।


ऐसा करने की वजह: सामान की आखिरी कीमत पर पड़ने वाले टैक्स के भारी बोझ को कम करने के लिए यह कदम उठाया गया।


भारत पर क्या असर पड़ा: यह भारत में इन डायरेक्ट टैक्स रिफॉर्म की छोटी सी शुरुआत थी। हालांकि, यह रिफॉर्म GST लागू होने तक शायद पूरा नहीं होगा।  


खास बात: इसी बजट में स्मॉल इंडस्ट्रीज डेवलपमेंट बैंक के गठन के साथ म्युनिसिपल सफाईकर्मियों के लिए दुर्घटना बीमा और रिक्शा वालों व मोची जैसा छोटा रोजगार करने वालों को बैंक लोन में सब्सिडी का प्रस्ताव किया गया। UTI  और MTNL के गठन का प्रस्ताव भी इसी बजट में किया गया। 

 

1987 का बजट
 
खासियत: देश में कॉरपोरेट टैक्स की शुरुआत
वित्त मंत्री: राजीव गांधी
बजट पेश करने की तारीख: 28 फरवरी 1987


बजट का निर्णय: मिनिमिम कॉरपोरेट टैक्स का प्रावधान। मौजूदा दौर में इसे MAT कहा जाता है।


ऐसा करने की वजह: कानून की आड़ लेकर इनकम टैक्स से बचने वाली ज्यादा मुनाफा कमाने वाली कंपनियों को टैक्स के दायरे में लाना था। 


इससे भारत में क्या बदलाव आया: बाद के दिनों में कॉरपोरेट टैक्स भारत सरकार की आय का प्रमुख स्रोत बन गया। 1987 के बजट से सरकारी खजाने को इस टैक्स से 75 करोड़ रुपए के अतिरिक्त राजस्व की उम्मीद थी।    

 

खास बात: कॉरपोरेट टैक्स का आइडिया अमेरिका से लिया गया था। साथ ही, इस बजट में सिगरेट पर भी टैक्स बढ़ाने की एलान किया गया। 

 

1991 का बजट
 
वित्त मंत्री: मनमोहन सिंह
खासियत: देश में उदारीकरण की शुरुआत
बजट पेश करने की तारीख: 24 जुलाई 1991
बजट का निर्णय: इंपोर्ट और एक्सपोर्ट के क्षेत्र में बड़ा निर्णय। लाइसेंस राज की समाप्ति की घोषणा। सभी बड़े सेक्टर देशी-विदेशी कंपनियों के लिए खोले गए। भारतीय अर्थव्यवस्था को ज्यादा प्रतिस्पर्धी बनाया गया। कस्टम ड्यूटी को 220 फीसदी से घटाकर 150 फीसदी किया गया।      
ऐसा करने का कारण: भारतीय आर्थव्यस्था नाजुक दौर में पहुंच चुकी थी। देश के सामने भुगतान संतुलन का संकट पैदा हो चुका था। सरकार के सामने रिफॉर्म के अलावा कोई चारा नहीं बचा था। 
 
देश पर इसका क्या असर पड़ा: बाद के दिनों में आर्थिक उदारीकरण के चलते ही भारत वर्ल्ड इकोनॉमी के पावर हाउस के तौर पर उभरा। आज भारत दुनिया की सबसे तेज ग्रोथ करने वाली अर्थव्यवस्थाओं में शुमार है। 
 
 
अहम बात: मनमोहन ने अपने वित्त मंत्री रहने के दौरान 1994 में सर्विस टैक्स की शुरुआत की। आज यह सरकार की आय का सबसे बड़ा जरिया बन चुका है। 1994 में सरकार को सर्विस टैक्स से 400 करोड़ रुपए की आय हुई थी।
 

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