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Momos वाली मैडम: कॉरपोरेट जॉब छोड़कर शुरू किया बिजनेस, अब हर साल कमाती हैं करोड़ों रुपए

Success story : 2004 में शुरू किया था छोटा सा रेस्त्रां, रोज बनाती है 30-35 हजार मोमोज

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नई दिल्ली। मोमोज वाली मैडम के नाम से मशहूर दिल्ली की पूजा महाजन ने खुद के बूते सफल बिजनेस खड़ा किया है। कुछ ही साल पहले तक वह कॉरपोरेट इंडस्ट्री में काम करती थीं। उनके क्लाइंट्स में बड़ी-बड़ी कंपनियां शामिल थीं। तब वह अपना खुद का बिजनेस शुरू करने का सपना देखती थीं। आज वे Unitas Foods की डायरेक्टर हैं और Yum! Yum! Dimsums नाम से उनके मोमोज और अन्य प्रोडक्ट्स देशभर में खरीदे जाते हैं। महीने भर में उनकी फ्रैक्ट्री में 10 से 12 लाख मोमोज बनाए जाते हैं और वह अपने घर की पहली महिला काराेबारी हैं। उनकी फैक्ट्री में वेज-नॉन वेज मोमोज, स्प्रिंग रोल्स, समोसा, इडली और बटाटा वड़ा भी बनता है। मनी भास्कर की प्रतिभा सिंह से पूजा महाजन ने अपनी कारोबारी दास्तां का बखान किया, पेश हैं अंशः

 

इस फील्ड में आने का कैसे इरादा किया?

मेरा बैकग्राउंड सर्विस क्लास का है। माता-पिता दोनों टीचर हैं। हमारी फैमिली में किसी ने बिजनेस नहीं किया था। 1998 में मैंने कारपोरेट वर्ल्ड में काम करना शुरु किया। कई बड़ी कंपनियों से जुड़ी। जॉब करते वक्त लगा कि खुद का बिजनेस करना चाहिए।

 

शुरुआत कैसे की?

2004 में अपनी जॉब छोड़कर गुड़गांव के डीएलएफ मॉल में बॉम्बे चौपाटी नाम से रेस्त्रां शुरू किया। रेस्त्रां के अपने कुछ चैलेंजेस थे। अपनी इनकम को बढ़ाने के लिए मैंने ट्रॉली बिजनेस में इंवेस्ट किया। यह बॉम्बे का एक ब्रांड था सिड फ्रैंकी। यह बिजनेस बहुत अच्छा चल निकला। इसको देखकर मैंने माेमोज की ट्रॉली शुरू की।

 

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माेमोज बनाने की फैक्ट्री शुरू करने की क्यों सोची?

जब मोमोज की ट्रॉली शुरू की तो माेमोज की सप्लाई नहीं आती थी ठीक से। कभी माेमोज मिल जाते थे और कभी नहीं। जब हमने पता कि मार्केट में किससे मोमोज ले सकते हैं तो पता चला कि मोमोज के सेक्टर में कोई भी ऑर्गेनाइज्ड प्लेयर नहीं है। सभी अनऑर्गेनाइज्ड तरीके से बिजनेस कर रहे हैं। तब हमने 2008 में दिल्ली के घिटोरनी में माेमोज बनाने की फ्रैक्ट्री शुरू की।

 

किन चुनौतियों का सामना किया और कैसे मदद मिली?

सबसे पहली चुनौती तो यही थी कि मैं अपने परिवार में बिजनेस करने वाली पहली शख्स थी तो कुछ जानती नहीं थी। कोई गाइड करने वाला नहीं था, इसलिए गलतियां ज्यादा हुईं। शुरू में दो-तीन साल बहुत मुश्किल रहे। तब हम हाथ से ही मोमोज बनाते थे। इसके बाद हमें सरकार की तरफ से लोन मिल गया। इस स्कीम के तहत मीडियम स्केल की इंडस्ट्रीज के लिए मशीनरी लेने और वर्किंग कैपीटल जुटाने के लिए एक करोड़ तक का लोन मिल जाता है। इस स्कीम के तहत हमने लोन लिया और ताइवान से मोमोज बनाने की मशीन इंपोर्ट की। इसके बाद कोल्ड रूम लगवाए।

 

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कहां तक है आपकी फ्रैक्ट्री के मोमोज की पहुंच?

अब हमारे प्लांट में दिन के लाखों हजारों पीस बनते हैं जो ऑल इंडिया शप होते हैं। देश के बड़े-बड़े सिनेमा हॉल, मल्टीप्लेक्सेस, होटल, बैक्विंट, केटरर्स, रेस्त्रां, कॉफी चेन में हमारी फैक्ट्री के माेमोज भेजे जाते हैं। ये सारा माल फ्रीजर में ही शिप किया जाता है। हम सिर्फ 20-25 बड़े प्लेयर्स के साथ काम करते हैं जो देश में अभी लिमिटेड हैं। छोटे या इंडीविजुअल बिजनेसमैन के साथ काम करने के लिए जो लॉजिस्टिक सपोर्ट लगता है वह बहुत बढ़ाना पड़ता है और वह अभी हमारे पास है नहीं। इसलिए हम बहुत ज्यादा लोगों के साथ काम नहीं करते हैं, लेकिन जिनके साथ काम करते हैं वह एक पार्टी 3-4 लाख मोमोज ले लेती है। हम हाइजीन का बहुत खयाल रखते हैं इसलिए हमारे मोमोज पसंद किए जाते हैं।

 

कितना सफल है मोमोज का बिजनेस?

अभी हमारे घरों में मोमोज बनाने का कल्चर नहीं आया है और वो कभी आएगा भी नहीं। देश में हर 100 किमी पर क्यूजीन बदल जाता है। ऐसे में अगर आपको बाहर कहीं माेमोज मिल रहे हैं तो आप घरों में क्यों बनाएंगे और हमारे देश में स्ट्रीट फूड कल्चर कभी खत्म नहीं होगा। जब तक छोटी-छोटी रेहडियां लग रही हैं, जब तक खरीदार बैठे हैं।

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