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बजट 2018 : ग्रामीण विकास के लिए अरुण जेटली से हैं ये उम्‍मीदें

बजट 2018 : ग्रामीण विकास के लिए अरुण जेटली से हैं ये उम्‍मीदें

नई दि‍ल्‍ली. ग्रामीण भारत अपने जीवन में सकारात्‍मक बदलाव की राह देख रहा है और बजट 2018 से इसकी शुरुआत हो सकती है। बढ़ता कर्ज, गरीबी, फसल का वाजि‍ब दाम न मि‍लना और बढ़ती बेरोजगारी उनके जीवन का ऐसा हि‍स्‍सा बन गया है जो अलग नहीं हो पा रहा। ग्रामीणों खासतौर पर ग्रामीण गरीबों में बेचैनी बढ़ रही है और वह इस बजट से काफी आस लगाए हुए हैं। वि‍त्‍तमंत्री अरुण जेटली भी कह चुके हैं कि‍ कि‍सान और कि‍सानी पर अलग से ध्‍यान देने की जरूरत है। कुछ ऐसे कदम हैं, जिन्‍हें सरकार उठाए तो ग्रामीण जीवन में सकारात्‍मक बदलाव आ सकता है। 

 

बजट 2018 - लघु सचिवालय बनाया जाए

सरकारी योजनाओं का लाभ सही लोगों तक पहुंचाने के लि‍ए 10, 000 की आबादी वाले ग्रामीण इलाकों में एक लघु सचि‍वालय बनाया जाए। इसके लि‍ए बहुत कम आबादी वाली मौजूदा ग्राम पंचायतों को संगठि‍त कि‍या जा सकता है। इस लघु सचि‍वालय में ग्रामीण इलाकों से जुड़े वि‍भागों के अधि‍कारी बैठें। इसके अलावा स्‍थानीय स्‍तर पर पर्याप्‍त संख्‍या में टेक्‍नीकल व अन्‍य स्‍टाफ की भर्ती हो ताकि सभी काम स्‍थानीय स्‍तर पर ही हो सकें। ऐसी उम्‍मीद है कि इस बजट में इसके लि‍ए फंड का प्रावधान कि‍या जाए। 

 

 

बजट 2018 - कम्‍युनि‍केशन स्‍ट्रैटजी बने

ग्रामीण इलाकों में संचार की व्‍यवस्‍था उतनी दुरुस्‍त नहीं है जि‍तनी होनी चाहि‍ए। लोगों में जागरूकता फैलाने के लि‍ए कई तरह के कार्यक्रम चल रहे हैं मगर उनकी जानकारी सही लोगों तक नहीं पहुंच पाती। इसकी वजह से वो नतीजे नहीं आ पाते, जि‍नकी उम्‍मीद होती है। इसलि‍ए ग्रामीण इलाकों से जुड़े सभी कार्यक्रमों को कवर करते हुए एक कम्‍युनि‍केशन स्‍ट्रैटजी बनानी चाहि‍ए और उसे लागू करना चाहि‍ए। इसके लि‍ए ग्रामीण वि‍कास मंत्रालय, पंजायती राज मंत्रालय, पेयजल एवं स्‍वच्‍छता मंत्रालय तथा कृषि मंत्रालय से फंड का आवंटन कि‍या जाए। 

 

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कि‍सानों की कंपनी बनाई जाए 

खेतीबाड़ी से जुड़ी समस्‍याएं बहुत ही पुरानी हैं और उन्‍हें आधे अधूरे प्रयासों से नहीं सुलझाया जा सकता। कि‍सानों के सामने सबसे बड़ी समस्‍या ये है कि कि‍सानों को अपनी उपज के बदले सही कीमत नहीं मि‍ल पा रही है। एक कि‍सान क्‍लब के प्रेसि‍डेंट ने बताया कि नबार्ड से लोन लेने के लि‍ए शहरी इलाके में रहने का प्रमाण देना जरूरी होता है। अब सवाल ये उठता है कि ग्रामीण इलाकों में रहने वाला कि‍सान इस तरह का प्रमाण कैसे लाएगा। कि‍सानों की इस तरह की समस्‍याओं को सुलझाने के लि‍ए अलग अलग लेवल पर कि‍सानों की कंपनी बनाई जानी चाहि‍ए। इसके पीछे आइडि‍या ये है कि कि‍सान जो कुछ पैदा करते या बनाते हैं वह उनकी कंपनी के प्रोडक्‍ट के तौर पर उनके गांव से बाहर जाए। उम्‍मीद है कि बजट 2018 में इस तरह की पायलट परि‍योजना की घोषणा हो सकती है। 

 

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मशीनरी बैंक की स्‍थापना की जाए 
छोटे और सीमांत कि‍सानों की मशीनों से जुड़ी जरूरतों को पूरा करने के लि‍ए मशीनरी बैंक जैसी योजना शुरू की जा सकती है। इस बैंकों से कि‍सान एक तयशुदा कि‍राया देकर मशीनें हासि‍ल कर सकते हैं। 


केंद्र कर सकता है 100 फीसदी फंडिंग 
श्‍यामा प्रसाद मुखर्जी ररबन मि‍शन के तहत 60 फीसदी फंड केंद्र सरकार की ओर से दि‍या जाता है और बाकी का 40 फीसदी फंड राज्‍य सरकार की ओर से आता है। उम्‍मीद की जा रही है कि बजट 2018 में इस तरह की घोषणा कर दी जाए कि सारा फंड केंद्र सरकार की ओर से ही आएगा।

 

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आ सकती हैं नई योजनाएं 
ऐसी उम्‍मीद है कि बजट 2018 में 115 पि‍छड़े जिलों के लि‍ए कुछ योजनाओं की घोषणा हो सकती है। हालांकि जब तक स्‍थानीय ग्रामीण गवर्नेंस  को मजबूत नहीं कि‍या जाता तब तक हाशिए पर रहने वाले लोगों का सशक्‍ति‍करण नहीं हो सकता। 

 

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डॉक्‍टर महि‍पाल सि‍ंह इंडि‍यन इकोनॉमि‍क सर्वि‍सेज के पूर्व अधि‍कारी हैं  (तोयज कुमार सिंह से बातचीत पर आधारित) 

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