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कभी न खरीदें ऐसी सेकंड हैंड कार, वरना होगा नुकसान

कम बजट होने पर या नई कार खरीदने से पहले अकसर लोग सेकंड हैंड कारों को खरीदने का ऑप्‍शन बेहतर समझते हैं।

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नई दि‍ल्‍ली। कम बजट होने पर या नई कार खरीदने से पहले अकसर लोग सेकंड हैंड कारों को खरीदने का ऑप्‍शन बेहतर समझते हैं। लेकि‍न सेकंड हैंड कार खरीदते वक्‍त आपको कुछ चीजों को ध्‍यान रखना चाहि‍ए क्‍योंकि‍ अगर आप ऐसा नहीं करेंगे तो सेकंड हैंड कार खरीदते के बाद बड़ा नुकसान भी हो सकता है। यहां हम आपको ऐसी कुछ चीजें बता रहे हैं जो सेकंड हैंड कार को खरीदते वक्‍त आपके काम आ सकती हैं और आप बड़े नुकसान से बच सकते हैं।  
 
अगर कार में ये है खराबी तो होगा नुकसान
 
-कार को चारों तरफ से चेक करें। यह देखें कि‍ कार पर कि‍या गया पेंट एक समान है या नहीं। अगर कहीं कार का कलर अलग है तो इसका मतलब है कि‍ उसका एक्‍सीडेंट हुआ है।
-कार के ओडोमीटर को चेक करना जरूरी है। आमतौर पर 40 हजार से 50 हजार कि‍मी चलने पर कार के टायर्स को बदला जाता है। इसलि‍ए टायर के थ्रेड को नजदीक से देखें।
-कार के इंटीरि‍यर को भी ध्‍यान से देखें। सीट कवर, सीट का फैब्रि‍क साफ है या नहीं।
-कार के सभी दरवाजों को खोल और बंद करके देख लें कि‍ कही इसमें से आवाज तो नहीं आ रही।
-इसके अलावा, ब्रेक, क्‍लच, पि‍कअप, गि‍यर, स्‍टीरिंग को भी देख लें कि‍ यह आराम से काम कर रहे हैं या नहीं।
-एक बार कार की टेस्‍ट ड्राइव जरूर करें।

 

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ओनरशि‍प के डॉक्‍युमेंट्स को चेक करें
 
कार के लि‍ए RC की कॉपी सबसे अहम डॉक्‍युमेंट हैं। कार सेल के लि‍ए आरटीओ में ओरि‍जनल RC कॉपी को जमा करना जरूरी है। ट्रांसफर के वक्‍त डुप्‍लि‍केट कॉपी (DRC) को स्‍वीकार नहीं कि‍या जाता। RC को ध्‍यान से पढ़े। उस पर मॉडल, सब वेरि‍एंट, ओनर का नाम, एड्रेस, रजि‍स्‍ट्रेशन नंबर को ध्‍यान से पढ़ें। RC बुक और इंश्‍योरेंस पॉलि‍सी में कार के इंजन नंबर का मि‍लान करें। RC बुक में मैन्‍युफैक्‍चरिंग ईयर और रजि‍स्‍ट्रेशन ईयर को चेक करें। अगर इसमें अंतर आता है तो कार की कीमत पर असर पड़ेगा।

 

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अगर कार के इंश्‍योरेंस में है यह गड़बड़ी
 
-इंश्‍योरेंस पॉलि‍सी पर्चेस की डेट पर वैलि‍ड होनी चाहि‍ए और RC ट्रांसफर होने से कम से कम 3 हफ्ते पहले इसकी एक्‍सपायरी डेट होनी चाहि‍ए।
-इंश्‍योरेंस पॉलि‍सी पर ओनर का नाम चेक करें। इसके अलावा, चेसी नंबर और इंजन नंबर को भी चेक करें। 

 

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नो क्‍लेम बोनस का ट्रांसफर
 
नो क्‍लेम बोनस इंश्‍योर्ड को मि‍लता है न कि‍ इंश्‍योर्ड व्‍हीकल को। इसलि‍ए व्‍हीकल ट्रांसफर होने पर इंश्‍योरेंस पॉलि‍सी नए ओनर के पास ट्रांसफर होती है लेकि‍न नो क्‍लेम बोनस नहीं। नए ओनर को बचे हुए पॉलि‍सी पीरि‍यड के लि‍ए नो क्‍लेम बोनस के अंतर का भुगतान करना होगा।

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