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एनजीटी से नहीं मिली इस दिग्गज कार कंपनी को छूट, कल तक देने होंगे जुर्माने के 100 करोड़ रुपए, नहीं तो जब्त होगी संपत्ति

कंपनी को कार्बन उत्सर्जन मानकों में जानबूझकर गड़बड़ी का दोषी पाया गया था। 

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नई दिल्ली. नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल ने जर्मन कार मेकर कंपनी फॉक्सवैगन (Volkswagen) को छूट देने से इनकार किया है। फॉक्सवैगन को कल केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड में 100 करोड़ रुपए जमा कारने का आदेश दिया गया है। ऐसा न होने पर कंपनी की संपत्ति को जब्त करने का आदेश दिया गया है। 

 

एनजीटी ने फॉक्सवैगन पर लगाया 171.34 करोड़ का जुर्माना

बता दें कि 15 फरवरी को एनजीटी की चार सदस्यीय समिति ने फॉक्सवैगन पर 171. 34 करोड़ रुपए का जुर्माना लगाया है। कंपनी पर वायु प्रदूषण मानकों के उल्लंघन का आरोप है। एनजीटी के मुताबिक कंपनी की कारों से उत्सर्जित नाइट्रोजन ऑक्साइड की अधिक मात्रा के चलते लोगों के स्वास्थ्य पर बुरा असर पड़ा है। एक एक्सपर्ट कमेटी की रिपोर्ट के मुताबिक कंपनी की कारों ने साल 2016 में देश के राजधानी दिल्ली में करीब 48.678 टन नाइट्रोजन ऑक्साइड का उत्सर्जन किया है। 

 

दोबारा ऐसी कार न बनाने की खाई कसम 

कंपनी ने अपनी पुरानी गलतियों से सबक लेते हुए भविष्य में दोबारा ऐसी कार न बनाने का फैसला किया है। जर्मनी की स्पोर्ट कार निर्माता कंपनी पोर्शे (Porsche) पहले ही ऐलान कर चुकी है कि अब वह कभी भी डीजल से चलने वाली कार नहीं बनाएगी। कंपनी के सीईओ ओलिवर ब्लूम ने एक अखबार से कहा था कि वह भविष्य में पोर्शे कार को सिर्फ पेट्रोल, हाईब्रिड और इलेक्ट्रिक वैरिएंट में बनाएंगे। उन्होंने कहा कि उनका पूरा ध्यान इलेक्ट्रिक कार बनाने पर होगा। 

क्या रही वजह

कंपनी के डीजल कार बनाने के पीछे की वजह काफी दिलचस्प है। दरअसल दिग्गज कंपनी पोर्शे की पैरेंट कंपनी फॉक्सवैगन को तीन साल पहले कारों में लगाए गए कार्बन उत्सर्जन मानकों में जानबूझकर गड़बड़ी का दोषी पाया गया था। फॉक्सवैगन ने खुद वर्ष 2015 में अमेरिकी जांच में स्वीकार किया था कि उसने दुनियाभर में 1.1 करोड़ कारों में ऐसे इक्विपमेंट लगाए, जो ज्यादा कार्बन उत्सर्जन को कम बताते थे। इस तरह कंपनी की सारी कारें प्रदूषण के मानकों पर खरी उतरती थीं। 

 

 

कैसे की गड़बड़ी

टेलीग्राफ के मुताबिक वर्ष 2008 से 2015 के दौरान कंपनी ने 1,98,500 Volkswagen कारों में E189 इंजन लगाया गया। इसमें 36,500  Audi वाहन शामिल थे, जो  प्रदूषण को कम करके दिखाता था। इसमें एक सॉफ्टवेयर का सहारा लिया गया, जो टेस्ट ड्राइव के दौरान इंजन की पावर और परफार्मैंस को नार्मल कर देता था। इसकी वजह से प्रदूषण कम होता था और कार टेस्ट में पास हो जाती थी। लेकिन रोड में चलाने के वक्त इंजन तय प्रदूषण लिमिट से 40 गुना ज्यादा प्रदूषण उत्पन्न करता था।

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