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सोशल डिस्टेसिंग: कोरोना से रोजाना 140 रुपए कमाने वालों की बढ़ी मुसीबत, भय के साथ भुखमरी का डर, 80% घटी कमाई

  • रोजाना 140 रुपए कमाने वाले मजदूरों के लिए सोशल डिस्टेसिंग है मुसीबत, बंद हो गया कमाई का जरिया
  • भारतीय शहरों में 8.8 मिलियन से अधिक परिवार झुग्गियों में रहते हैं

Moneybhaskar.com

Mar 24,2020 03:48:58 PM IST

नई दिल्ली. सोशल डिस्टेसिंग (सामाजिक दूरी) एक तरह की लग्जरी लाइफस्टाइल है, जो ज्यादा आमदनी वाले अपना सकते हैं। यह रोजाना 140 रुपए कमाने वाले मजदूर के लिए बड़ी मुसीबत है। रोज कमाने-खाने वाले जैसे रिक्शा चालक, रेहड़ी वाले, फेरी वाले, घर की बाई की मुसीबत लॉकडाउन से बढ़ गई है। इन लोगों की एक दिन में 50 रुपए तक की कमाई नहीं हो पा रही है। ब्लूमबर्ग की रिपोर्ट के मुताबिक, 38 साल की बेबी देवी लोगों के घरों में काम करके अपना जीवन-यापन करती थी, उनकी मासिक कमाई 80 फीसदी तक कम हो गई है। बेबी देवी के घर में चार बच्चें हैं और वह अपने पूरे परिवार का खर्च वह उठाती है। बेबी के मुताबिक, जहां एक तरफ उन पर संक्रमण का खतरा है, वहीं दूसरी तरफ भूख की समस्या है। एक तो इनके बीच कोरोना का भय है, वहीं अब खाने-पीने की चीजें न होने के चलते भुखमरी जैसे हालात पैदा हो गए हैं।

इनके स्वास्थ्य की परवाह कौन करेगा?

बता दें कि सोशल डिस्टेसिंग के समय में आर्थिक सहायता तो मिलने से रही। वहीं, अब इन लोगों को स्वास्थ्य की चिंता सताने लगी है। इस संकट के समय महामारी से बचने के लिए वो अपने पूरे परिवार के साथ एक छोटे से घर में रहते हैं। जहां न तो साफ सफाई है न ही सैनिटाइजर। एक छोटा सा बाथरूम जिसे पूरे परिवार के सदस्य इस्तेमाल कर रहे हैं। खाना तो दूर साफ सफाई तक के लिए उनके पास पैसे नहीं है। ऐसे में इन पर संक्रमण फैलने का खतरा और बढ़ जाता है। बता दें कि यह कहानी सिर्फ बेबी देवी जैसे घरों में काम करने वाली महिला की नहीं है, बल्कि भारत के एक तिहाई से ज्यादा श्रमिकों की है। बेबी देवी की तरह ही मुंबई के मोहिबुल अंसारी जो कि प्लास्टिक के कंपनी में काम करके घर चलाते हैं। उनके पांच बच्चे हैं। वे एक छोटी सी बस्ती में परिवार के साथ बंद है। अंसारी के मुताबिक, अगर हममें से कोई बीमार पड़ जाए तो भगवान ही हमारी मदद कर सकते हैं। रोजाना कमाई पर जीवन यापन करने वाले कामगार अंसानी और उनके परिवार के पास मेडिकल केयर के लिए पैसे नहीं है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार, ईस्ट एशिया के देशों में 2015 में स्वास्थ्य सेवाओं पर 62.72 डॉलर प्रति व्यक्ति खर्च किया गया था। अमेरिकी सरकार ने 2025 तक अपनी जीडीपी का कुल 2.5 फीसदी हिस्सा स्वास्थ्य सेवाओं पर खर्च करने का वादा किया है। फिलहाल यह खर्च जीडीपी का 1.2 फीसदी है। बता दें कि भारत में असंगठित क्षेत्र में 36.9 करोड़ श्रमिक कार्यरत हैं।


भारतीय जीडीपी का बड़ा हिस्सा है ये श्रमिक

एशिया की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था वाले देश भारत में संगठित क्षेत्र जीडीपी में योगदान आधे से ज्यादा का योगदान करता है। यह क्षेत्र भारत के कुल कार्यबल के 90% से ज्यादा लोगों को रोजगार देता है। भारतीय शहरों में 8.8 मिलियन से अधिक परिवार झुग्गियों में रहते हैं। इनमें से अधिकांश पुरुष और महिलाएं रोजाना औसतन 2 डॉलर यानी 140-145 रुपए कमाई करते हैं। इनमें प्लंबर, बाई, कचरा इकट्ठा करने वाले, रिक्शा खींचने वाले और सड़क के किनारे विक्रेता शामिल हैं। इनके पास न तो कोई वित्तीय सुरक्षा है न ही घर से काम करने का विकल्प। इन्हें कमाने के लिए हर दिन बाहर निकला पड़ता है।

31 मार्च तक लॉकडाउन

बता दें कि दुनियाभर में कोरोना मरीजों की संख्या में तेजी से इजाफा हो रहा है। इस बीच भारत में कोरोनावायरस से संक्रमित लोगों की संख्या बढ़कर करीब 500 पर पहुंच गई है। इससे देश में कम से कम 9 लोगों की जान चली गई है। 22 राज्यों के 76 जिलों को पूरी तरह लॉकडाउन किया गया है। रेलवे स्टेशन पर पूरी तरह से सन्नाटा पसरा हुआ है। 31 मार्च तक रेल सेवा, हवाई यात्रा स्थगित कर दी गई है। लगभग सभी बाॅर्डर सील है, लोगों से यह भी कहा गया है कि वे घरों में रहें और जरुरत पड़ने पर बाहर निकलें।

इन राज्य सरकारों की आर्थिक मदद की घोषणा

  • हरियाणा सरकार

हरियाणा सरकार ने कोरोना वायरस के कारण किए गए लाकडाउन की वजह से गरीब, मजदूर और दिहाड़ीदार वर्ग के साथ-साथ रिक्शा चालकों की आर्थिक सहायता करने का ऐलान किया है। राज्य सरकार श्रमिकों, निर्माण मजदूरों के अलावा रेहड़ी-फड़ी वालों के लिए आर्थिक मदद देगी। मुख्यमंत्री मनोहर लाल ने ऐसे लोगों को 4500 रुपए मासिक की आर्थिक मदद देने का निर्णय लिया है। यह सहायता चार किस्तों में साप्ताहिक आधार पर दिया जाएगा, ताकि लाकडाउन के दौरान किसी गरीब के घर में रोटी का संकट पैदा न हो सके। इलाज करते हुए हेल्थ वर्कर की मृत्यु पर सरकार 10 लाख रुपए की एक्सग्रेशिया राशि प्रदान करेगी।

  • बिहार सरकार

इस बीच बिहार सरकार के आदेश ने उनका काम आसान कर दिया है। पटना में लगभग साढ़े आठ लाख लोग ऐसे हैं, जिन्हें अब राशन को लेकर समस्या नहीं होगी। जिले में 20 हजार से अधिक सरकारी राशन की दुकाने हैं, जहां वह आसानी से मुफ्त में अनाज ले सकेंगे। भविष्य में पटना के हालात और बिगड़ सकते हैं, इस कारण सरकार ने गरीबों को ध्यान में रखकर योजना बनाई है।

  • उत्तर प्रदेश सरकार

उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ द्वारा एक हजार रुपए (प्रत्येक व्यक्ति) 15 लाख दिहाड़ी मजदूर और 20.37 लाख निर्माण श्रमिकों को उनकी दैनिक जरूरतों को पूरा करने में मदद करने के लिए दिए जाएंगे। यूपी में 15 लाख दिहाड़ी मजदूर पंजीकृत हैं, उन्हें 1000 रुपए की मदद देंगे। साथ ही चिन्हित 20.37 लाख मजदूरों (रिक्शा वाले, खोमचे वाले, रेहड़ी वाले, फेरी वाले, निर्माण कार्य करने वाले) को भी 1000 रुपए की सहायता राशि दी जाएगी।

कई राज्यों ने मुफ्त अनाज वितरण की घोषणा की

  • उत्तर प्रदेश सरकार ने 16.5 मिलियन गरीब परिवारों को 1 महीने का राशन मुफ्त देने की घोषणा की है।
  • दिल्ली सरकार ने प्रति व्यक्ति-प्रतिमाह 7 किलो गेहूं और 5 किलो चावल बिना चार्ज देने का ऐलान किया है।
  • पुणे शहर में आवश्यकता पड़ने पर एक महीने का राशन एडवांस दिया जाएगा।
  • केरल सरकार ने कोरोना पीड़ितों को मुफ्त खाद्य अनाज देने का ऐलान किया है।
  • राजस्थान सरकार ने 1 करोड़ बीपीएल परिवारों को दो महीने का अनाज मुफ्त में एडवांस देने की घोषणा की है। इसके अलावा एनएफएसए से बाहर के लोगों को आवश्यक वस्तुओं के फूड पैकेट दिए जाएंगे।
  • कर्नाटक सरकार ने प्रत्येक बीपीएल परिवार को 10 किलो चावल और 2 किलो गेहूं मुफ्त देने की घोषणा की है।
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