एल्गो ट्रेडिंग

moneybhaskar.com

Jul 22,2014 08:40:00 AM IST
ट्रेडिंग कम्प्यूटर प्रोग्राम या एक खास तरह के सॉफ्टवेयर के माध्यम से की जाने वाली शेयरों की खरीद-बिक्री एल्गोरिद्मिक ट्रेडिंग कहलाती है। इस तरह के सॉफ्टवेयर को उचित शेयरों की पहचान और उनकी खरीद-बिक्री के लिए इंसान की जरूरत नहीं होती।

एल्गोरिद्मिक ट्रेडिंग को ऑटोमेटेड ट्रेडिंग, ब्लैक बॉक्स ट्रेडिंग या एल्गो ट्रेडिंग भी कहा जाता है। इसके तहत इलेक्ट्रॉनिक प्लेटफॉर्म पर ट्रेडिंग की जाती है। इसमें ऑर्डर की टाइमिंग, कीमत और मात्रा सभी कुछ पहले से दिया गया होता है। जैसे ही पहले से निर्धारित समय, मात्रा और कीमत से मार्केट की स्थितियां मेल खाती हैं, उसी वक्त ऑटोमेटिक तरीके से ट्रांजैक्शन हो जाता है। ये कम्प्यूटर प्रोग्राम खुद यह तय करते हैं कि कब, कहां और किस शेयर का कारोबार करना है।

आगे की स्लाइड में जानें किसमें होता है एल्गो ट्रेडिंग का सबसे अधिक इस्तेमाल-


इसका इस्तेमाल सबसे अधिक इन्वेस्टमेंट बैंकों, पेंशन फंड, म्यूचुअल फंड आदि में किया जाता है। यह इसलिए किया जाता है, ताकि बड़े ट्रेड को कुछ हिस्सों में बांटकर छोटे-छोटे हिस्सों में ट्रेड किया जा सके, जिससे कि मार्केट इंपैक्ट और रिस्क को मैनेज किया जा सके।

साल 2008 से डायरेक्ट मार्केट एक्सेस की अनुमति मिलने के बाद एल्गोरिद्मिक ट्रेडिंग को बढ़ावा मिला है। मिली सेकंड के भीतर ही ऐसे सॉफ्टवेयर आर्बिट्रेज के मौकों की तलाश कर सौदों को अंजाम दे डालते हैं।

आगे की स्लाइड में बातें इससे जुड़े कुछ खास तथ्य- 
 

ये भी जानें-

=> बोस्टन स्थित आइट ग्रुप एलएलसी (Aite Group LLC) के अनुसार, 2006 में यूरोपियन यूनियन और अमेरिका में हुए कुल ट्रेड का एक तिहाई ट्रेड ऑटोमेटिक एल्गोरिद्म से ही हुआ।

=> 2006 में लंदन स्टॉक एक्सचेंज में 40 प्रतिशत से भी अधिक की ट्रेडिंग ऑटोमेटिक एल्गोरिद्म से हुई थी।

=> अमेरिकन मार्केट और इक्विटी मार्केट में किसी अन्य मार्केट से काफी अधिक एल्गो ट्रेड होता है। 

=> 2006 में फॉरेन एक्सचेंज मार्केट में लगभग 25 प्रतिशत ट्रेड ऑटोमेटिक ट्रेडिंग से किया गया था।
 
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