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    GST लागू होने पर ग्लोबल इकोनॉमी से जुड़ेगा भारतीय बाजार

    GST लागू होने पर ग्लोबल इकोनॉमी से जुड़ेगा भारतीय बाजार
    गुड्स एंड सर्विसेस टैक्‍स (जीएसटी) लागू करने के लिए केंद्र सरकार द्वारा किए जा रहे प्रयास सफल होते दिखाई पड़ रहे हैं। केंद्रीय वित्त मंत्री अरुण जेटली की ईमानदार कोशिशों और एंपावर्ड कमेटी के भीतर और निजी तौर पर राज्‍यों के वित्त मंत्रियों के साथ उनकी मुलाकातों के लंबे दौर के बाद ही यह सब संभव हो सका है।
     
    जीएसटी यदि लागू हो जाता है तो आजादी के बाद से अप्रत्यक्ष कर प्रणाली में अब तक का सबसे बड़ा टैक्‍स रिफॉर्म होगा। प्रस्तावित जीएसटी एक सिंगल लेवी होगी। वहीं इसमें सेंट्रल एक्साइज ड्यूटी (सेनवेट), अतिरिक्त एक्साइज ड्यूटी, सर्विस टैक्‍स, अतिरिक्त कस्टम ड्यूटी (सीवीडी) और अतिरिक्त स्पेशल एक्साइज ड्यूटी (एसएडी) जैसे केंद्रीय टैक्‍स, इस श्रेणी में आने वाले वैट/सेल्स टैक्‍स, मनोरंजन कर, आक्ट्रॉय, एंट्री टैक्‍स, परचेज टैक्‍स और लक्जरी टैक्‍स जैसे राज्‍य करों को जीएसटी में समाहित किया जाएगाा। इसी प्रकार एल्कोहल को छोड़कर वस्तुओं और सेवाओं पर लगने वाले सभी करों को जीएसटी में शामिल किया जाएगाा।
     
    नया टैक्‍स 1 अप्रैल 2016 से लागू होने की संभावना है। इस प्रकार सरकार और करदाताओं के पास इस नई कर व्यवस्था को समझने के लिए पर्याप्‍त समय मिल सकेगा। यहां यह बात जानना जरूरी है कि जीएसटी खरीद पर कई प्रकार के टैक्‍स भुगतानों को समाप्त करने के लिए जीएसटी एक नई प्रणाली की शुरूआत करेगा। जीएसटी विभिन्‍न चरणों पर लगने वाले टैक्‍स को खत्‍म करते हुए नया क्रेडिट मैकेनिज्म लागू करेगा। इसके लागू होने के बाद टैक्‍स के अलावा दूसरे किसी कारण से वस्तु की कीमत में कोई बदलाव नहीं होगा।
     
    साथ ही क्रेडिट मैकेनिज्म ट्रांजेक्शन कॉस्ट को भी कम करेगा। इसका फायदा कॉरपोरेट से लेकर छोटे कारोबारियों तक सभी को मिलेगा। इस व्यवस्था के लागू होने के बाद कारोबारियों को न सिर्फ अपने बिजनेस ऑपरेशन्स को बेहतर बनाने का मौका भी मिलेगा बल्कि ग्लोबल इकोनॉमी में भारतीय कारोबारियों को प्रतियोगी फायदा भी मिलेगा। संभव है कि जीएसटी के माध्यम से भारत गुड्स एवं सर्विसेस के क्षेत्र में एकीकृत राष्‍ट्रीय बाजार बन जाए।
     
    संविधान संशोधन विधेयक
     
    जीएसटी को लागू करने के लिए केंद्रीय वित्त मंत्री ने संसद में 122वां संविधान संशोधन विधेयक 2014 को पेश कर दिया है। 119वें संशोधन विधेयक जो कि पिछली लोकसभा के भंग होने के साथ ही विलोपित हो गया। उसके विपरीत जिस प्रकार नए बिल में राज्‍यों द्वारा उठाए गए टैक्‍स राजस्व में कमी और स्वायत्त जैसे मुद्दों का ध्यान रखा गया है। संभव है कि जीएसटी बिल अपने उद्देश्य में जरूर सफल होगा।
     
    जीएसटी काउंसिल
     
    जीएसटी बिल में एक जीएसटी काउंसिल के गठन का प्रस्‍ताव किया गया है। यह काउंसिल केंद्र और राज्‍य का जॉइंट फोरम होगी। केंद्रीय वित्त मंत्री इस काउंसिल के चेयरमैन होंगे, साथ ही सभी राज्‍यों के वित्त मंत्री इसके सदस्‍य होंगे। यह काउंसिल केंद्र, राज्‍य सरकारों और लोकल बॉडीज द्वारा लगाए जाने वाले टैक्स, सेस और सरचार्ज के संबंध में सलाह देगी। ये सभी टैक्‍स जीएसटी में शामिल किए जाएंगे। यह काउंसिल वस्तुओं और सेवाओं पर लगने वाले कर की दरों के स्‍तर, सीमित समय के लिए किसी विशेष दर, प्राकृतिक आपदा के समय अतिरिक्त राजस्व जुटाने के संबंध में केंद्र और राज्‍य को सलाह देगी। हालांकि इन सभी सिफारिशों को लागू करने के लिए तीन चौथाई मतों की आवश्यकता होगी। काउंसिल में केंद्र के पास एक तिहाई वोटिंग अधिकार होगा। वहीं राज्‍यों के पास दो तिहाई वोट होंगे। इस प्रकार केंद्र और राज्‍यों की सहमति के बाद जीएसटी में किसी भी प्रकार का बदलाव नहीं किया जा सकेगा। सिर्फ केंद्र या फिर राज्‍य के चाहने से कोई बदलाव नहीं किया जाएगाा।
     
    पेट्रोलियम प्रॉडक्ट
     
    इस बात की परवाह किए बिना कि हम उन वस्तुओं पर जीएसटी लेवी कर रहे हैं या नहीं, यह जरूरी है कि इन्हें संविधान संशोधन विधेयक में शामिल किया जाए। क्‍योंकि सूची से इन वस्तुओं को बाहर रखने के बाद भविष्य में इन्हें दोबारा जीएसटी में शामिल करने की संभावना समाप्त हो जाएगाी। भविष्य में जीएसटी के अंतर्गत किए जाने वाले किसी भी बदलाव के लिए एक नया संविधान संशोधन विधेयक लाना होगा। ऐसे में जरूरी है कि भविष्य की संभावनाओं को देखते हुए जरूरी है कि जीएसटी में टैक्‍स के स्‍कोप को संविधान की धाराओं के तहत सीमित न किया जाएगाा। सेल्स टैक्‍स और यूनियन एक्साइज ड्यूटी की तरह संविधान में कराधान शक्तियों को व्यापक बनाया जाए।
     
    फिलहाल इन कमोडिटीज को जीएसटी के दायरे से बाहर रखने का औचित्य सिर्फ रेवेन्यू पर आधारित है। हालांकि लंबी अवधि की जीएसटी टैक्‍स पॉलिसी से यह प्रदर्शित होता है कि मौजूदा समय में मोटर फ्यूल की खुदरा कीमत में इन करों की हिस्‍सेदारी 50 फीसदी से भी अधिक है। इस स्थिति में जब मोटर फ्यूल को सरकार नियंत्रण से मुक्त कर दिया गया है। ऐसे में जरूरी है कि हमारे देश की टैक्‍स पॉलिसी फ्लेक्सिबल और वैश्विक स्‍तर पर कच्चे तेल से लिंक हो। जिससे वैश्विक स्‍तर पर कच्चे तेल की कीमतों के बढ़ने से की स्थिति में भी तेल के दामों में स्थिरता के साथ ही अर्थव्‍यवस्‍था पर भी कम दबाव पड़े।
     
    इसके साथ ही इन वस्तुओं पर ग्रीन टैक्‍स के सिद्धांतों के तहत ही टैक्‍स लगाया जाएगा। ऐसे में इन वस्तुओं को पहले जीएसटी में शामिल किया जाए और फिर उसके बाद वाहनों द्वारा फैलाए जाने वाले प्रदूषण के स्‍तर के आधार पर इन पर अतिरिक्त कर लगाया जाए। इस बात को ध्यान में रखते हुए इन्हें जीरो रेट के तहत जीएसटी में शामिल करना बेहद औचित्य पूर्ण निर्णय दिखाई देता है। केंद्र और राज्‍य सरकारों द्वारा पेट्रोलियम और पेटो प्रॉडक्ट पर लगाए जा रहे सेल्स टैक्‍स, वैट, सीएसटी और एक्साइज ड्यूटी जैसे मौजूदा कर सीमित समय तक जारी रहेंगे।
    पूरी वेल्यू चेन पर केंद्र और राज्‍य साथ-साथ जीएसटी लेवी करेंगे। राज्‍य के भीतर सभी केंद्रीय वस्तु एवं सेवा कर (सीजीएसटी) पर केंद्र और राज्‍य गुड्स एवं सर्विस टैक्‍स (एसजीएसटी) पर राज्‍य करों का संकलन करेंगे। साथ ही सर्विस शब्‍द को वस्तु से पूरी तरह अलग करके परिभाषित किया गया है। इससे इसे समझने की किसी प्रकार को कोई मुश्किल नहीं आएगी। जीएसटी के डेस्टिनेशन आधारित टैक्‍स प्रणाली होने के कारण, अंतिम वस्तु पर सामान्य रूप से स्टेट जीएसटी वस्तु का उपभोग करने वाले राज्‍य के भीतर लगाया जाएगाा।
     
    जीएसटी की दरें
     
    जीएसटी की दरें पूरे देश में एक समान होगी। हालांकि केंद्र और राज्‍य को वित्तीय स्वायत्तता देने के लिए सीजीएसटी और एसजीएसटी के फ्लोर रेट के ऊपर और नीचे सीमित टैक्‍स बैंड का प्रावधान हो सकता है। हालांकि अभी तक दरों का निर्धारण नहीं किया गया है। लेकिन जरूरी है कि ढांचा इस प्रकार तैयार किया जाए कि जिसमें वस्तु की आवश्यकता और कमियों को देखते हुए सिर्फ एक स्‍टैंडर्ड रेट और दो अन्‍य रेट (एक नीची दर दूसरी ऊंची दर) हों। यहां इस बात को समझना जरूरी है कि भारत जैसे विशाल देश में जहां आबादी के एक बड़ा हिस्‍सा गरीबी रेखा के नीचे गुजर बसर कर रहा है। वहां कर की एक मात्र दर होना किसी भी तरह से व्यवहारिक नहीं है।
    कनाडा में गरीब नागरिकों द्वारा अदा किए गए जीएसटी के लिए आयकर विभाग रिफंड का चैक जारी करता है। भारत में प्रशासनिक रूप से ऐसा हो पाना व्यवहारिक रूप से संभव ही नहीं है। साथ ही राजनीतिक दृष्टि से भी आवश्यक वस्तुओं पर कर की ऊंची दरें लगाना ठीक नहीं है। ऐसा करने से राज्‍यों को जीएसटी के माध्यम से प्राप्‍त होने वाले राजस्व पर भी असर पड़ेगा।
     
    घाटे की भरपाई
     
    सीएसटी से होने वाले घाटे की भरपाई के लिए केंद्र सरकार के पिछले प्रदर्शन की बात करें तो राज्‍यों का अनुभव काफी खराब रहा है। राज्‍यों का मानना है कि केंद्र सरकार अभी भी अपने राजस्व घाटे के प्रबंधन में भारी मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा है। ऐसे में राज्‍यों को शक है कि जीएसटी लागू होने के बाद उससे होने वाले नुकसान की समय पर पूरी भरपाई हासिल करने के लिए मुश्किलों का सामना करना पड़ सकता है। इस परिप्रेक्ष्य में यह जरूरी है कि केंद्र सरकार को राज्‍यों के बीच इस बात का भरोसा देना होगा कि जीएसटी को लेकर केंद्र ने जिस प्रतिबद्धता की बात कही है, वह उस पर पूरी तरह से खरा उतरेगा। ऐसे में संशोधन विधेयक में राज्‍यों के घाटे की भरपाई का प्रावधान शामिल करना बेहद स्वागत योग्‍य कदम है। जैसा बताया गया है कि केंद्र जीएसटी लागू होने के पहले पांच साल (पहले तीन साल 100%, चौथे साल 75% और पांचवे साल 50%) तक राज्‍यों को होने वाले राजस्व घाटे की भरपाई करेगा।
     
    राज्‍यों के बीच होने वाले कारोबार पर टैक्‍स
     
    राज्‍यों के बीच होने वाले कारोबार के तहत होने वाली सप्लाई पर लगने वाले इंटरस्टेट टैक्‍स को इंटीग्रेटेड जीएसटी (आईजीएसटी) के माध्यम से लेवी किया जाएगाा। इसे भारत सरकार द्वारा डेस्टिनेशन के आधार पर या फिर जीएसटी काउंसिल की सलाह के आधार पर संसद द्वारा बनाए गए कानून के आधार पर संकलित किया जा सकता है। इसके लिए वस्तु और सेवाओं की आपूर्ति या भारतीय सीमाओं में होने वाले आयात या फिर अंतरराज्यीय कारोबार को भी वस्तुओं और सेवाओं की सप्लाई माना जाएगाा। हालांकि जीएसटी के अच्‍छे पहलुओं के बावजूद राज्‍यों के बीच होने वाले कारोबार में ऑरिजन बेस्ड टैक्‍स के लिए अव्‍यवस्‍था का माहौल भी लेकर आएगा। जीएसटी बिल में राज्‍यों के बीच कारोबार के लिए 2 साल अथवा जीएसटी काउंसिल द्वारा सुझाई गई अवधि के अंतर्गत वस्तु की आपूर्ति पर 1 फीसदी तक गैर वैट अतिरिक्त कर लगाए जाने का प्रावधान है। यह जीएसटी के तहत सीएसटी को संभालने जैसा है। इसके लिए उत्पादक राज्‍यों को होने वाले नुकसान और केंद्र की ओर से मिलने वाले नुकसान की भरपाई की राशि का ध्यान रखना होगा।

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