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    जीएसटी है मोदी सरकार की सबसे बड़ी उम्मीद

    जीएसटी है मोदी सरकार की सबसे बड़ी उम्मीद
    नई सरकार के चुनाव के साथ ही देश में अब गुड्स एंड सर्विसेस टैक्स (जीएसटी) को जल्द से जल्द लागू करने संबंधी चर्चाओं का दौर शुरू हो चुका है। जीएसटी के पिछले आठ सालों के इतिहास पर गौर करें तो तत्कालीन वित्त मंत्री प्रणब मुखर्जी और पश्चिम बंगाल के वित्त मंत्री असीम दासगुप्ता और उसके बाद पी चिदंबरम और भाजपा नेता सुशील मोदी ने इसके लिए अपनी ओर से जीएसटी की ओर ईमानदार कोशिशें तो जरूर कीं। लेकिन उसके बाद भी राज्योंं, राजनीतिज्ञों और अधिकारियों के निजी हितों के कारण यूपीए-2 जीएसटी लागू करने में पूरी तरह विफल रही है। अब एक बार फिर भी जीएसटी को लेकर नई सरकार से काफी आशा है। 
     
    महत्वपूर्ण बात यह है कि संभावित विपक्षी दल कांगेस यह बात साफ कर चुका है कि जीएसटी लागू करने में राजनीतिक मतभेदों को बीच में नहीं लाया जाएगा। मजेदार बात यह है कि जिस जीएसटी का सृजन राजनीतिक सरोकारों में मतभेद के साथ होने जा रहा है। इन्हीं विरोधों के बीच नई सरकार की शुरुआत के साथ ही अब एक बार फिर जीएसटी को लेकर हलचल तेज होने जा रही है। 
     
    जीएसटी लागू करने के लिए तीन बातें लगा सकती हैं अड़ंगा 
     
    मे‍रे विचार से अभी भी जीएसटी की राह में केंद्र-राज्य  संबंध, विकसित और विकासशील राज्यों के बीच खाई और प्रशासनिक अधिकारियों और रिवेन्यू सर्विसेस के बीच चले आ रहे मतभेद भी एक बडा अड़ंगा बन सकते हैं। जीएसटी की राह में अभी तक संघीय भारत और इसके राज्यों  के बीच पारदर्शिता और संबंधित विषय पर आपसी समझ ऐतिहासिक रूप से मतभेद का मुख्य कारण रहे हैं। संघवाद के ताने-बाने के बीच केंद्र से और अधिक प्रभुत्व और स्वायत्‍ता की मांग केंद्र और राज्यों के बीच लड़ाई का केंद्र बिंदु रहा है। राज्यों को डर है कि यदि टैक्स से जुड़े अधिकार भी राज्योंं से छीन लिए जाएंगे तो उनके ही राज्य में उन्हें  कौन पूछेगा। इससे सर्वाधिक प्रभावित राज्यों के भीतर अपना प्रभुत्व रखने वाली क्षेत्रीय पार्टियों के हितों पर पड़ेगा। राष्ट्रीय पार्टियां बड़े औद्योगिक घरानों से भारी भरकम चंदा हासिल करती हैं। वहीं दूसरी ओर क्षेत्रीय दल अपने राजनीतिक चंदे के लिए पूरी तरह से राज्य  के छोटे और बड़े कारोबारियों और ठेकेदारों पर ही निर्भर होते हैं। अब यदि उनके आर्थिक अधिकार ही छीन लिए जाएंगे तो कोई भी छोटा और मझोला कारोबारी इन राजनीतिक दलों को चंदा नहीं देगा। 

    जीएसटी को लेकर दूसरी बाधा राज्यों की आर्थिक स्थिति को लेकर है। उल्लेखनीय है कि जीएसटी एक तरह से खपत आधारित टैक्सी है, जो कि सीधे कंज्‍युमर से एकत्रित किया जाएगा। ऐसे में सर्वाधिक विकसित (औद्योगिक) राज्यों को डर रहेगा कि उत्तर-प्रदेश, बिहार, मध्य-प्रदेश, आेडिशा और पश्चिम-बंगाल जैसे कम विकसित लेकिन सर्वाधिक जनसंख्या वाले राज्यों के कारण उनको राजस्‍व की बड़ी चपत लग सकती है। इन राज्यों का डर अकारण है। इससे लेबर सरप्ल स वाले राज्‍यों के मुकाबले इन विकसित राज्यों  को सर्वाधिक फायदा उनकी जनसंख्या को बड़ी संख्यां में रोजगार सृजन से मिल मिलेगा और एक बार इस जनसंख्या को लगातार आय प्राप्त होगी तो इससे लोकल डिमांड बढ़ेगी। लोगों द्वारा उपभोग बढ़ने के चलते इन राज्यों को जीएसटी का फायदा भी अल्प-विकसित राज्यों  के मुकाबले अधिक मिल सकेगा। ऐसे में विकसित और आद्योगिक राज्यों  का विरोध उनका अदूरदर्शी नजरिया ही दिखाता है। 

    जीएसटी की राह में तीसरी बाधा प्रशासनिक है। चूंकि इस पूरे बदलाव की आधिकारिक जिम्मेदारी इंडियन रिवेन्यू सर्विसेज पर होगी। लेकिन अभी तक राजस्व पर अधिकार रखने वाली आईएएस बिरादरी अपने से निचले दर्ज के अधिकारी के लिए अपने ऐतिहासिक फायदेमंद अधिकार को किसी भी कीमत पर नहीं छोड़ना चाहेगी। दोनों अधिकारी वर्ग के बीच यह उलझन लंबे समय से चली आ रही है। और यही जीएसटी की धीमी गति का एक महत्वपूर्ण कारण भी है। आईएसएस बिरादरी पहले ही जीएसटी नेटवर्क के लिए स्पेशल पर्पज व्हीकल के एमडी और चेयरमैन के पद पर अपना अधिकार जमाने की तैयारी कर चुका है। वहीं इस समय रिवेन्यू हेडक्वार्टर इस पूरे मुदृदे पर केंद्र का प्रतिनिधि‍त्व कर रहा है। ऐसे में आईआरएस जीएसटी के उच्च पदों पर अपना प्राकृतिक अधिकार मान रहे हैं। दोनों के बीच का यह झगड़ा जीएसटी निर्माण की क्वालिटी पर भी असर डाल रही है। 
     
    लेखक  टैक्‍स एक्‍सपर्ट और  taxindiaonline.comके सीईओ और मैनेजिंग डायरेक्टर हैं। 
     

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