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    क्या निर्यात मामले में भारत भी बन सकता है वैश्विक सिरमौर?

    क्या निर्यात मामले में भारत भी बन सकता है वैश्विक सिरमौर?

    जब भारत के साथ दुनिया के कई बड़े देश निर्यात में पिछड़ रहे हैं तब चीन के पास ऐसा कौन सा मंत्र है कि वह निर्यात में बढ़ोतरी हासिल कर रहा है। भारत के पास भी निर्यात क्षेत्र में बढ़ने के लिए काफी मौके हैं। बशर्ते उद्योग की क्षमताओं को नई तकनीक पर विकसित किया जाए। उत्पादों की ब्रांडिंग की जाए। उत्पादन पर विशेष जोर दिया जाए। आने वाले समय में निर्यातकों के बीच प्रतिस्पर्धा और बढ़ने वाली है। ऐसे में निर्यात की रेस में आगे निकलने के लिए यह चीजें बहुत ही अहम हो जाएंगी। 

    पिछले वित्त वर्ष (2013-14) में भारत निर्यात क्षेत्र में कुछ बेहतर नहीं कर पाया। अकेले चीन को छोड़ दें तो कई देश इस मामले में पिछड़ गए। चीन का निर्यात बहुत हद तक औद्योगिक उत्पादन पर निर्भर करता है। औद्योगिक उत्पादन के चलते पिछले साल (2013-14) चीन ने निर्यात में बढ़ोतरी हासिल की थी। भारत दो अहम कारणों के चलते निर्यात में बेहतर प्रदर्शन नहीं कर पाया। पहला कारण था वैश्विक सुस्ती और दूसरा यूरोपियन यूनियन में मौजूद आर्थिक संकट। इन दोनों ही मर्ज की दवा हमारे पास नहीं है। फिर भी हमारे पास ऐसे रास्ते जरूर हैं जिनके जरिए हम इस क्षेत्र में बेहतर कर सकते हैं। 

    एक बार फिर आंकड़े बता रहे हैं कि यूनाइटेड स्टेट्स यानी अमेरिका वापस मंदी की चपेट में है। यह भारतीय निर्यातकों के लिए अच्छी खबर नहीं है। क्योंकि अमेरिका में मंदी से मांग में कमी बनी रहेगी। इससे निर्यातकों के बीच जबर्दस्त प्रतिस्पर्धा का माहौल तैयार होगा। प्रतिस्पर्धा में विजयी होने के लिए निर्यातकों को अपने उत्पादों की कीमतें स्थिर या कम रखनी पड़ेंगी। इस हिसाब से निर्यात के लिए आने वाला समय और कठिन है। इसका हल सरकार और उद्योग दोनों को मिलकर निकालना होगा। 

    बेहतर निर्यात के लिए सरकार को सक्रिय भूमिका निभानी होगी। वहीं उद्योगों को अपने उत्पादन लागत को घटाना होगा और क्षमता विकसित करने पर ध्यान देना होगा। उद्योगों को बेहतर परिणाम के लिए नई तकनीक और सूचना प्रौद्योगिकी का सहारा लेना चाहिए। मसलन, क्लाउड कंप्यूटिंग और एडवांस एनालिटिक्स जैसी चीजें उद्योगों को काफी फायदा पहुंचा सकती हैं।सरकार को जरूरत है कि वह बहुआयामी नीति अपनाए।

    भारतीय निर्यातकों को जरूरत है कि वो अपने उत्पादों का प्रमोशन करें। वैल्यू चैन के जरिए ब्रांडेड उत्पादों का निर्यात करें। मौजूदा समय में नए ब्रांड स्थापित विकिसित होने चाहिए। इसमें बड़े खर्च की जरूरत होती है इसलिए ब्रांड विकसित करने में सरकार मदद करे। सरकार को चाहिए कि वह ब्रांड प्रमोशन स्कीम के तहत भारत में रजिस्टर्ड ब्रांड्स को और नए ब्रांड को अधिक से अधिक प्रोत्साहन दें। इससे भारतीय घरेलू बाजार के टर्नओवर या निर्यात में वृद्धि होगी।

    विकसित अर्थव्यवस्थाओं के भीतर भारत से निर्यात होने वाले उत्पादों में गिरावट जारी है। जबकि इस नुकसान की भरपाई भारत ने अफ्रीका, लैटिन अमेरिका, सीआईएस और एशिया में निर्यात के जरिए की है। यह भारत के लिए नए उभरते हुए बाजार हैं। भारत निर्यात के ट्रेंड में भी परिवर्तन आया है। भारतीय निर्यात ने अब आधुनिक अर्थव्यवस्थाओं ईयू और नॉर्थ अमेरिका की जगह एशिया, लैटिन अमेरिका और अफ्रीका में उभरती हुई अर्थव्यवस्थाओं की तरफ रुख किया है। दरअसल, विकसित अर्थव्यवस्थाओं के नुकसान का भारत को काफी फायदा हो रहा है। करीब एक दशक बाद भारत ने एशिया में 40 फीसदी से बढ़कर कुल 54 फीसदी निर्यात लक्ष्य हासिल किया है, जबकि ईयू और नॉर्थ अमेरिका में भारत से निर्यात घटा है। इसके अलावा भारत ने लैटिन अमेरिका निर्यात में बढ़ोतरी हासिल की है। यह मार्च, 2004 में 2.3 फीसदी था जो कि अब 2014, मार्च में बढ़कर 4.5 फीसदी पहुंच गया है। वहीं भारत से अफ्रीका निर्यात में भी बढ़ोतरी हुई है। अप्रैल-मार्च 2014  में भारत ने अफ्रीका को पिछले वित्त वर्ष (अप्रैल-मार्च) 5 फीसदी के मुकाबले 6.6 फीसदी ज्यादा निर्यात किया है।

    यदि देश में निर्यात के आकंड़े को मजबूती देना है तो उदयोगों को नई तकनीकी पर निर्भरता को बढ़ाना होगा। सरकार को नीतियों के स्तर पर कुछ बड़े फैसले लेने होंगे। उद्योगों को उत्पादन ज्यादा हो सके इस पर ध्यान देना होगा। सबसे अहम है ब्रांडिंग। उत्पादों का ब्रांड विकसित करने में भी सरकार को मदद देनी होगी। तभी निर्यात के जादुई आंकड़े हासिल किए जा सकते हैं।

    लेखक एफआईईओ में महानिदेशक और सीईओ हैं।  

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