बरगद के पेड़ के नीचे 5 लोगों ने शुरू किया था स्टॉक एक्सचेंज को

moneybhaskar.com

Jul 03,2014 08:11:00 AM IST

बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज सेंसिटिव इंडेक्स (बीएसई सेंसेक्स) लाखों भारतीयों की जीवन रेखा है। इसे बीएसई-30 या सिर्फ सेंसेक्स के नाम से भी जाना जाता है। भारतीय पूंजी बाजार के विकास में इस एक्सचेंज की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। इसके सूचकांक पर दुनियाभर की निगाहें रहती हैं। भारत के अलग-अलग सेक्टर्स की तीस प्रमुख, सक्रिय और वित्तीय रूप से मजबूत कंपनियां इस बाजार का संचालन करती हैं। ये कंपनियां भारतीय अर्थव्यवस्था का भी प्रतिनिधित्व करती हैं।

पांच हजार कंपनियां

जर्मनी स्थित ड्यूश बोर्स और सिंगापुर एक्सचेंज बीएसई के स्ट्रेटेजिक पार्टनर के रूप में जुड़े हुए हैं। बीएसई में पांच हजार से अधिक कंपनियां रजिस्टर्ड हैं। इस लिहाज से ये दुनिया का सबसे बड़ा एक्सचेंज है। पिछले 139 साल से बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज भारतीय बाजार की पूंजी व्यवस्था का निर्धारण कर रहा है।

कैसे अस्तित्व में आया बीएसई

एशिया के इस सबसे पुराने एक्सचेंज की स्थापना का श्रेय उन चार गुजराती और एक पारसी शेयर ब्रोकर्स को जाता है, जो 1850 के आसपास अपने कारोबार के सिलसिले में मुंबई (तब बॉम्बे) के टाउन हॉल के सामने बरगद के एक पेड़ के नीचे बैठक किया करते थे। इन ब्रोकर्स की संख्या साल-दर-साल लगातार बढ़ती गई। 1875 में इन्होंने अपना 'द नेटिव शेयर एंड स्टॉक ब्रोकर्स एसोसिएशन’ बना लिया। साथ ही दलाल स्ट्रीट पर एक ऑफिस भी खरीद लिया। आज इसे बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज कहा जाता है।

आगे की स्लाइड्स में पढ़ें शेयर मार्केट के बारे में अन्य खास बातें और जानें कौन है भारत का वारेन बफेट-

नेशनल स्टॉक एक्सचेंज
 
नेशनल स्टॉक एक्सचेंज ऑफ इंडिया (एनएसई) भी भारत का प्रमुख स्टॉक एक्सचेंज है। इसकी स्थापना 1990 में डिमिचुअल इलेक्ट्रॉनिक एक्सचेंज के रूप में की गई थी। विभिन्न सेक्टर्स की शीर्ष कंपनियां इसका संचालन करती हैं। इसमें 1600 से अधिक कंपनियां रजिस्टर्ड हैं। वर्ल्ड फेडरेशन ऑफ एक्सचेंज दुनिया के एक्सचेंज सिस्टम को नियंत्रित करने के लिए वर्ल्ड फेडरेशन ऑफ एक्सचेंज बनाया गया है। इसका मुख्यालय पेरिस में है। दुनिया के प्रमुख 62 स्टॉक एक्सचेंज इसके सदस्य हैं। इनमें से बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज भी एक है।
 

खात बातें-
 
=> 25 जनवरी, 2001 को बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज (बीएसई) ने डॉलेक्स-30 लॉन्च किया था। इसे बीएसई का डॉलर लिंक्ड वर्जन कहा जाता है।
 
=> 11वां दुनिया का सबसे बड़ा स्टॉक एक्सचेंज मार्केट है बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज। यह खिताब बीएसई को बाजार पूंजी के आधार पर मिला है।
 
=> 1.32 ट्रिलियन की कुल बाजार पूंजी को बीएसई संचालित करता है। नंबर ऑफ ट्रांजेक्शन्स के हिसाब से बीएसई दुनिया का पांचवां बड़ा एक्सचेंज है।
 
भारत के वारेन बफेट
 
मुंबई के राकेश झुनझुनवाला को सबसे सक्रिय बुल ट्रेडर माना जाता हैं। इन्हें लोग भारत का वारेन बफेट कहते हैं। वे जिस कंपनी का शेयर खरीद लेते हैं, उसके भाव अपने आप ही बढ़ जाते हैं। झुनझुनवाला हंगामा डिजिटल मीडिया इंटरटेनमेंट के चेयरमैन भी हैं।
 

कहां से आए बुल और बीअर?
 
स्टॉक मार्केट के प्रचलित शब्द बीअर और बुल कहां से आए, इसको लेकर अलग-अलग मान्यताएं हैं, जो कुछ इस तरह हैं।
 
बुल
 
बुल शब्द के पीछे धारणा यह है कि बुल यानी सांड हमेशा सींग ऊपर करके हमला करता है, इसलिए इसे उछाल और लाभ वाले बाजार का प्रतीक माना गया होगा। एक धारणा यह भी है कि 17 वीं शताब्दी में ब्रिटेन के लंचियन क्लब में बुल की प्रतिमा लगी होती थी। ऐसा अंधविश्वास था कि जिस दिन बुल प्रतिमा के सींगों से हाथों को रगड़ा जाता था, उस दिन व्यवसाय में फायदा होता था। शायद इसीलिए बाद में तेजडिय़ों के लिए 'बुल’ प्रतीक का इस्तेमाल किया गया होगा।
 

बीअर
 
बुल से पहले बीअर शब्द प्रचलन में आया। अमेरिका स्थित फाइनेंशियल सर्विसेज कंपनी मोटली फुल की मानें तो बीअर यानी भालू जब किसी चीज पर झपटता है तो उसके पंजे नीचे की ओर होते हैं, इसीलिए बीअर को गिरावट का प्रतीक मानते हैं। एक धारणा यह भी है कि 17 वीं शताब्दी में भालू की स्किन बेचने वाले भालू को पकडऩे से पहले ही सौदा कर लेते थे। ऐसे में यदि बाजार में स्किन के दाम कम हो जाते हैं तो भी भालू पकडऩे वाले को पूरा पैसा देना पड़ता। इसे घाटे का सौदा मानते थे, इसीलिए बीअर ट्रेडिंग शब्द प्रचलित हुआ होगा।
 

यह भी जानें-
 
मंदडि़ए-तेजडि़ए

 
बाजार में मंदी लाने वाले समूह या ऑपरेटर्स को मंदिड़ए कहा जाता है। इनकी कोशिश बाजार में शेयर बेचकर लाभ कमाने की होती है। इसके उलट तेजडि़ए समूह बाजार में शेयर खरीदकर तेजी लाते हैं और लाभ कमाते हैं। ये अधिक तरलता वाली कंपनियों में सक्रिय होते हैं।
 
शेयर कॉर्नर
 
किसी विशेष कंपनी या इंडस्ट्री के शेयर इकट्ठे करना शेयर कॉर्नर कहलाता है। ऐसा तभी होता है जब किसी कंपनी के शेयर बढऩे की पूरी संभावना होती है। साथ ही यदि किसी कंपनी का फंडामेंटल (बुनियाद) बेहतर होता है, तब ये स्थिति आती है।
 

चकरी
 
चकरी उस स्थिति को कहते हैं कि जब शेयर बाजार में मंदडि़ए और तेजडि़ए दोनों सक्रिय हो जाते हैं। ऐसी स्थिति में ब्रोकर्स की कोशिश किसी कंपनी के अधिक से अधिक शेयर को खरीदने की होती है। यह स्थिति किसी शेयर बाजार में ठीक नहीं मानी जाती। ब्लू चिप कंपनियां बाजार में जिन कंपनियों की तरलता (फ्लो) ज्यादा होती है यानी जिनका लेन-देन अधिक सक्रिय होता है, उन्हें ब्लू चिप कंपनियां कहा जाता है। इनमें अधिकतर वे कंपनियां होती हैं, जिनका रिकॉर्ड लगातार निवेशकों को मुनाफा देने का रहा है।
 
ओपनिंग बेल
 
ओपनिंग बेल का चलन न्यूयॉर्क स्टॉक एक्सचेंज की देन माना जाता है। वर्ष 1800 के आसपास यहां ट्रेडिंग शुरू होने और खत्म होने के सूचक के रूप में डेस्क पर हथौड़ा बजा दिया जाता था। 1903 में हथौड़े की जगह घंटी ने ले ली। तब से आज तक यह परंपरा चली आ रही है। बीएसई में बेल बीएसई में ओपनिंग बेल की परंपरा न्यूयॉर्क स्टॉक एक्सचेंज से ही आई। 1995 के पहले तक फ्लोर मैनेजर ही बेल बजाता था। इसके बाद यह परंपरा बनी कि रोज बेल न बजाकर जब कोई कंपनी इनीशियल पब्लिक ऑफरिंग (आईपीओ) लाए, तभी ओपनिंग बेल बजाई जाए।
 
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