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Do you know: कितने तरह की होती है महंगाई

महंगाई बाजार में मुद्रा की उपलब्धता और वस्तुओं की कीमतों में बढ़ोत्तरी को मापने की एक तरकीब है।

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जब किसी देश में वस्तुओं या सेवाओं की कीमतें सामान्य से अधिक हो जाती हैं तो इस स्थिति को मंहगाई (इंफ्लेशन) कहते हैं। कीमतें बढ़ जाने की वजह से पर्चेजिंग पावर प्रति यूनिट कम हो जाती है। दूसरे शब्दों में यह भी कहा जा सकता है कि महंगाई बाजार में मुद्रा की उपलब्धता और वस्तुओं की कीमतों में बढ़ोत्तरी को मापने की एक तरकीब है।

आइए जानते हैं कितने तरह की होती है मंहगाई-

थोक महंगाई दर

भारत में नीतियों के निर्माण में थोक मूल्य सूचकांक पर आधारित महंगाई दर का इस्तेमाल किया जाता रहा है। थोक बाजार में वस्तुओँ के समूह की कीमतों में सालाना तौर पर कितनी बढ़ोत्तरी हुई है इसका आकलन महंगाई के थोक मूल्य सूचकांक के जरिए किया जाता है। भारत में इसकी गणना तीन तरह की महंगाई दर, प्राथमिक वस्तुओं, ईंधन और विनिर्मित वस्तुओँ की महंगाई में बढ़त के आधार पर की जाती है। अभी तक भारत में वित्तीय और मौद्रिक नीतियों के कई फैसले थोक मूल्य सूचकांक पर आधारित महंगाई दर के हिसाब से ही की जाती रही है।
 
आगे की स्लाइड्स में जानें अन्य के बारे में- 

 

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रीटेल महंगाई दर

रीटेल महंगाई दर (कंज्यूमर प्राइस इंडेक्स) वह महंगाई दर है जो जनता को सीधे तौर पर प्रभावित करती है और खुदरा कीमतों के आधार पर तय की जाती है। भारत में रीटेल महंगाई दर खाद्य पदार्थों की हिस्सेदारी 45 फीसदी के करीब है। दुनिया भर में ज्यादातर देशों में रीटेल महंगाई के आधार पर ही मौद्रिक नीतिय़ों का निर्माण होता है। भारत में भी अब नए आरबीआई गवर्नर ने स्पष्ट कह दिया है कि ब्याज दरें तय किए जाने से पहले रीटेल महंगाई दर पर नजर रखा जाएगा। हाल ही में सरकार ने महंगाई से बचने के लिए निवेशकों के लिए रीटेल महंगाई से जुड़े बांड जारी किए हैं।    
 

कोर इन्फ्लेशन

खाद्य पदार्थों की कीमतों और ईंधन की कीमतों को हटा कर जो रीटेल महंगाई दर बचती है उसे कोर इन्फ्लेशन कहा जाता है। इसे नॉन फूड मैन्युफैक्चरिंग इन्फ्लेशन भी कहा जाता है। इस आंकड़े के पीछे का तर्क ये है कि खाद्य पदार्थों और ईंधन की कीमतों में अचानक उतार-चढाव देखा जाता है और इसलिए उनके अस्थायी और अप्रत्याशित असर को बाहर कर कोर इन्फ्लेशन मापा जाता है।

खाद्य पदार्थों और ईंधन को छोड़कर अन्य पदार्थों की महंगाई दर की दिशा को मापने का यह एक असरदार जरिया है। कोर इन्फ्लेशन का अधिक होना किसी भी अर्थव्यवस्था के लिए एक गंभीर चुनौती है।     
 

मुख्य महंगाई दर

मुख्य महंगाई दर कमोडिटी के एक बास्केट की कीमतों के आधार पर तय होती है। इसमें खाद्य वस्तुओं और ईंधन की अस्थिर कीमतें शामिल नहीं की जातीं। कीमतों को नियंत्रण में रखने के लिए केंद्रीय बैंकों को इकोनॉमी में मांग के दबाव पर नजर रखनी पड़ती है। ज्यादा मांग की वजह से कीमतों में बढ़ोत्तरी होती है और महंगाई बढ़ती है। मुख्य महंगाई से मांग का पता चलता है।

यह इस बात का भी संकेत देती है कि क्या मैन्युफैक्चरर मांग में थोड़ी भी कमी के बगैर इनपुट कॉस्ट को उपभोक्ताओं पर लाद पा रहा है। इस तरह देखा जाए तो मुख्य महंगाई दर केंद्रीय बैंक को महंगाई का आकलन करने में मदद करती है। मुख्य महंगाई की ऊंची दरों का मतलब होता है कि इकोनॉमी में मांग का दबाव बना हुआ है जो महंगाई को रफ्तार दे सकती है, इसलिए केंद्रीय बैंक इसकी रफ्तार घटाने के लिए ब्याज दरों को बढ़ा देता है।

दूसरी ओर, अगर मुख्य महंगाई दर कम होती है तो केंद्रीय बैंक दरों में कटौती करता है और इससे मांग में इजाफा देखने को मिलता है। अगर केंद्रीय बैंक सिर्फ महंगाई दर पर फोकस करता है, तो मौद्रिक नीति असफल हो सकती है। क्योंकि इसमें खाद्य पदार्थों का मूल्य शामिल होता है और इसमें तेज घट-बढ़ देखने को मिल सकती है।
 

स्टैगफ्लेशन

स्टैगफ्लेशन यानी महंगाई जनित मंदी एक जटिल आर्थिक स्थिति है। यह शब्‍द स्‍टैगनेशन और इन्‍फलेशन यानी ठहराव व महंगाई से मिलकर बना है। इसमें विकास दर थम जाती है या घट जाती जबकि महंगाई की दर गजब ढाने लगती है। बेकारी बढ़ने के लिए यह आदर्श स्थिति है। स्‍टैगफ्लेशन की इसलिए जटिल है क्‍यों कि उत्‍पादन बढ़ाने के लिए कर्ज सस्‍ता किया जाता है और बाजार में पूंजी का प्रवाह बढ़ाया जाता है। बाजार में ज्‍यादा धन महंगाई का ईंधन बन जाता है। इसलिए स्‍टैगफ्लेशन का दुष्‍चक्र तोड़ना मुश्किल हो जाता है।

1970 में मिला इस अवधारणा को समर्थन

स्टैगफ्लेशन की अवधारणा को 1960 के दशक तक स्वीकृति हासिल नहीं थी। पहली बार ब्रिटिश पार्लियामेंट में लेन मेकलोड ने 1965 में स्टैगफ्लेशन शब्द का इस्तेमाल किया था।1970 के दशक में स्टैगफ्लेशन की अवधारणा को समर्थन मिला। जब वस्तुओं की उत्पादन कम था, बेरोजगारी दर और महंगाई चरम पर थी।
 
दुनिया भर में रही है स्टैगफ्लेशन

दुनिया में कई अर्थव्यवस्थाओं में स्टैगफ्लेशन आ चुका है। 1970 के दशक में दुनिया भर में फैले स्टैगफ्लेशन के दौरान भी ऐसा ही हुआ था। यह तेल की कीमतों की वजह से पैदा हुई थी। यह लंबा चला और इस दौरान केंद्रीय बैंक सस्‍ते कर्ज से ग्रोथ वापसी की रणनीति में नाकाम रहे थे।
 

हाइपर इन्फ्लेशन

हाइपर इन्फ्लेशन एक ऐसी स्थिति होती है, जिसमें महंगाई की दर काफी ऊंचे स्तर पर चली जाती है। सामान्य स्थितियों में, किसी अर्थव्यवस्था में वस्तुओं और मुद्रा की कीमत मोटे तौर पर स्टेबल रहती है, लेकिन हाइपर इन्फ्लेशन की स्थिति में किसी अर्थव्यवस्था में चीजों की कीमतें घरेलू स्तर पर बड़ी तेजी से बढ़ती हैं। इसका मतलब यह है कि उस देश की मुद्रा की कीमत में उथल-पुथल होती है, जबकि विदेशी करेंसी में कोई ज्यादा बदलाव नहीं होता है। इसका परिणाम यह होता है कि उस देश की घरेलू मुद्रा अपनी वास्तविक कीमत बड़ी तेजी से खोने लगती है।
 
दुनिया भर में हाइपर इन्फ्लेशन के कई उदाहरण हैं। स्टीव एच हेंक और निकोलस क्रूज ने एक अध्ययन के जरिए बताया है कि पिछली शताब्दी में हाइपर इन्फ्लेशन के लगभग 56 मामले दर्ज किए गए हैं। हाइपर इन्फ्लेशन का सबसे बड़ा मामला 1945-46 के दौरान हंगरी में दर्ज किया गया था, जब चीजों की कीमतें औसतन हर 15 घंटे में दोगुनी हो जाती थीं। ताजा उदाहरण देखें तो जिंबाब्वे में आए हाइपर इन्फ्लेशन के दौर को देखा जा सकता है, जहां मार्च 2007 से नवंबर 2008 के बीच वस्तुओं की कीमत औसतन हर 24.7 घंटे में दोगुनी हो जाती थीं। जर्मनी में भी 1922-23 के दौरान हाइपर इन्फ्लेशन का दौर आया था।
 

महंगाई दर और ब्याज दरों का सम्बन्ध

जब ब्याज दरें कम होती हैं, तो लोग ज्यादा कर्ज लेते हैं। ज्यादा कर्ज ले कर लोग वस्तुएं खरीदते हैं। ऐसे में वस्तुओं की मांग बढ़ जाती है और महंगाई बढ़ सकती है। इसके उलट अगर ब्याज दरें बढ़ती हैं, तो लोग कम खर्च करेंगे और महंगाई दर कम हो जाएगी। लेकिन ऐसा हमेशा ही सच हो, ऐसा नहीं है। जिन अर्थव्यवस्थाओं में महंगाई का स्तर कम है (जैसे विकसित अर्थव्यवस्थाएं), वहां ब्याज दरें भी काफी कम हैं, जबकि जहां पर महंगाई का स्तर ज्यादा है (जैसे विकासशील अर्थव्यवस्थाएं), वहां ब्याज दरें भी ज्यादा हैं।
 
ध्यान देने वाली बात यह भी है कि वक्त के साथ पैसे की कीमत घटती जाती है क्योंकि महंगाई दर बढ़ने से मुद्रा की क्रय शक्ति घटने लगती है। अगर आपका निवेश महंगाई दर से कम रिटर्न देता है, तो सौदा घाटे का है। अगर आपका बैंक आपके पैसे पर 4 फीसदी का रिटर्न दे रहा है और महंगाई दर 8 फीसदी है तो आपको बैठे बिठाए 4 फीसदी का नुकसान हो रहा है।
 
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