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जानिए, क्या है खरीफ फसलों का शास्त्र

मक्के की खेती राजस्थान, बिहार, आंध्र प्रदेश, कर्नाटक और उत्तर प्रदेश में मुख्य रुप से की की जाती है।

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कमजोर मानसून का असर न सिर्फ बुआई पर पड़ रहा है, बल्कि एग्री वायदा कारोबार भी इससे अछूता नहीं है। मानसून के रफ्तार ने पकड़ने से अनाज, दालें, मसाले और खाने के तेलों की कीमतें में काफी तेजी आ गई है। कपास, ग्वार और कैस्टर जैसी खरीफ फसलों में भी तेजी देखने को मिल रही है। आखिर खरीफ फसलों पर मानसून का ऐसा असर क्यों पड़ता है, इसे जानने के लिए खरीफ फसलों के बारे में जानना जरूरी है।

आइए जानते हैं क्या है खरीफ फसलों का शास्त्र-
 

मक्का:
 
मक्के की खेती राजस्थान, बिहार, आंध्र प्रदेश, कर्नाटक और उत्तर प्रदेश में मुख्य रुप से की की जाती है। आमतौर इसकी बुआई 15 जून से 15 जुलाई तक की जाती है। यह 90 से 100 दिन की फसल है। इसे 8 बार पानी की जरूरत होती है।
 
अगस्त में इसकी कटाई शुरु हो जाती है और सितंबर के पहले हफ्ते से मंडियों में इसकी आवक शुरु हो जाती है। मानसून कमजोर होने से मक्के का रकबा घटेगा साथ ही अगर फली बनने के समय बारिश होती है तो उत्पादन घट सकता है। सरकारी अनुमान के मुताबिक साल 2013-14 में मक्का का उत्पादन 161.9 लाख टन से बढ़कर 175.1 टन होने का अनुमान है।
 
आगे की स्लाइड्स में जानें अन्य फसलों के बारे में- 
 

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सोयाबीन:
 
सोयाबीन मुख्य रुप से मध्य प्रदेश की फसल है इसके साथ ही इसकी बुआई राजस्थान, महाराष्ट्र और कर्नाटक में होती है। इसकी बुआई जुलाई के शुरुआत से 15 जुलाई तक होती है। यह 100 दिन की फसल है। सोयाबीन को ज्यादा पानी की जरुरत नहीं होती और फसल पर केवल 4 बार पानी देना होता है।
 
हालांकि बारिश कम होने से इसकी क्वालिटी खराब हो सकती है जिससे उत्पादन घटने का अनुमान है। इसकी कटाई सितंबर-अक्टूबर माह में होती है। सोयाबीन का उत्पादन साल 2013-14 में घटकर 1194.8 लाख टन रहने का अनुमान है। जो कि 2012-13 में 1466.6 लाख टन थी। सोया कारोबारियों के मुताबिक मानसून का सबसे ज्सोयादा असर सोयाबीन की कीमतों पर देखने को मिलेगा जिसके चलते 5000 रुपए प्रति क्विंटल तक जा सकता है। 
 

ग्वार:
 
ग्वार मुख्य रुप से राजस्थान की फसल है हालांकि हरियाणा और गुजरात में भी इसकी खेती होती है। इसकी बुआई जून से जुलाई के बीच होती है। यह 120 दिन की फसल है। ग्वार को बुआई के समय पानी चाहिए होता है। मानसून में देरी से बुआई का रकबा घट सकता है।
 
श्रीगंगानगर के ग्वार कारोबारी जय देव गुप्ता के मुताबिक मानसून में देरी से ग्वार की कीमतों में तत्काल 400 से 500 रुपए की तेजी आ सकती है। कारोबारियों के मुताबिक साल 2014 में ग्वार का उत्पादन 1.50 से 2 करोड़ बारी रह सकता है जो कि पिछले साल 2.50 करोड़ बोरी रही थी।
 

कपास:
 
कपास की खेती मुख्य रुप से उत्तर भारत में राजस्थान, पंजाब,हरियाणा में की जाती है। वहीं इसकी खेती कर्नातक, महाराष्ट्र, और आंध्र प्रदेश में भी होती है। इसकी बुआई प्री-मानसून से शुरु हो जाती है। इसकी बुआई मई से जुलाई के पहले हफ्ते तक होती है। यह 135 से 200 दिन की फसल है। इसकी पिकिंग अक्टूबर से शुरु हो जाती है। 100 दिन के बाद इसको पानी चाहिए होता है।
 
सरकारी अनुमान के मुताबिक साल 2013-14 में कपास का उत्पादन 365 लाख टन हो सकता है जो कि 2012-13 में 342.20 टन था। मानसून कमजोर रहने से कापस के फसल को नुकसान पहुंच सकता है जिसके कारण उत्पादन घट सकता है। जानकारों के मुताबिक इस बार फिर से कपास सफेद सोना बन सकता है।
 
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