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    क्या है वायदा कारोबार और कमोडिटी एक्सचेंज, कैसे की जाती है हेजिंग

    क्या है वायदा कारोबार और कमोडिटी एक्सचेंज, कैसे की जाती है हेजिंग
    वायदा कारोबार
    वायदा कारोबार में कोई कारोबारी अपनी भविष्य की जरूरतों को ध्यान में रखकर सौदे करता है और इसमें पूरा पैसा भी एक साथ नहीं दिया जाता है, लेकिन एक्सपायरी की तारीख आने तक आपको अपना सौदा क्लियर करना होता है। भारत में कई कमोडिटी एक्सचेंज हैं, जिनमें कमोडिटी का वायदा कारोबार होता है। इनमें एमसीएक्स, एनसीडीएक्स, एनएमसीई और आरसीएक्स प्रमुख हैं। 
     
    कमोडिटी एक्सचेंज
    कमोडिटी एक्सचेंज  वे इंटरमीडियरी होते हैं, जो कमोडिटी कारोबार के लिए प्लेटफॉर्म मुहैया कराते हैं। इस समय देश में पांच राष्ट्रीय स्तर के कमोडिटी एक्सचेंज हैं- एमसीएक्स, एनसीडीईएक्स, एसीई, आईसीईएक्स और एनएमसीई। ये सभी एक्सचेंज भारत सरकार द्वारा वायदा बाजार के नियमन के लिए स्थापित वायदा बाजार आयोग (एफएमसी) के नियंत्रण में काम करते हैं। हालांकि, इनके अलावा देश में 20 और कमोडिटी एक्सचेंज हैं, लेकिन देश में कमोडिटी कारोबार के काफी बड़े हिस्से पर एमसीएक्स और एनसीडीईएक्स का ही कब्जा है।
     
    स्पॉट प्राइस
    किसी कमोडिटी का नकदी बाजार में जो मूल्य होता है, उसे उसकी स्पॉट प्राइस कहते हैं। यह ठीक वैसा ही है, जैसे हम नकदी दे कर बाजार से कोई जिंस खरीदते हैं, जबकि उसका फ्यूचर प्राइस वह कीमत होता है, जो भविष्य में होने की संभावना है। किसी जिंस का फ्यूचर प्राइस उसके स्पॉट प्राइस से कम भी हो सकता है या अधिक भी हो सकता है। जब निकट भविष्य में फसल आने वाली होती है तो उस कृषि उत्पाद का फ्यूचर प्राइस उसके स्पॉट प्राइस से कम हो जाता है।
     
    क्या है हेजिंग?
    शेयर बाजार या कमोडिटी बाजार में निवेश के दौरान जोखिम से बचने के लिए निवेशक हेजिंग का इस्तेमाल करते हैं। खासकर, शेयर बाजार में वायदा अनुबंधों के दौरान किसी कंपनी के शेयरों में निवेश किए गए भावों में अचानक गिरावट दर्ज की जाने लगे, तो ऐसी विपरीत परिस्थितियों से बचने के लिए हेजिंग का उपयोग किया जाता है। सामान्य तौर पर हेज का इस्तेमाल शेयर बाजार में विपरीत परिस्थितियों से बचने के लिए किया जाता है।
    आप इसे एक उदाहरण के जरिए समझ सकते हैं। आपने किसी कंपनी का शेयर खरीदा और फिर उसको वायदा अनुबंधों के तहत किसी को बेच दिया। जाहिर है कि वायदा अनुबंध करते समय कोई कीमत भी तय कर दी जाती है। भविष्य के लिए किए गए सौदे की तारीख में आपको तय कीमत मिल सके, इसलिए हेजिंग का सहारा लिया जाता है। निवेशक हेजिंग का सहारा बाजार की अनिश्चितताओं से बचने के लिए करते हैं। एक बेहतर हेजिंग रणनीति उस निवेशक के जोखिम को शून्य की स्थिति तक पहुंचा सकताी है।
     
    ऐसे करते हैं लॉन्ग हेज
    भविष्य में मार्केट में कीमतों की अस्थिरता को देखते हुए एक कमोडिटी निवेशक फ्यूचर्स कॉन्ट्रेक्ट में आगे के सौदे के लिए हेजिंग करते हैं, जिसे लॉन्ग हेज कहा जाता है। कंपनियां जब फ्यूचर्स कॉन्ट्रेक्ट करती हैं तब उनके लिए लॉन्ग हेजिंग फायदेमंद होती है। कंपनियों को यह पता होता है कि उन्हें भविष्य में कोई संपत्ति खरीदनी है या शेयर खरीदना है और फ्यूचर्स में मार्केट ऊपर की ओर जाएगा, तब स्वाभाविक सी बात है कि उसकी कीमतों में बढ़ोत्तरी होगी। इन हालात में कंपनियां सौदा या संपत्ति की कीमतों के लिए फ्यूचर्स कॉन्ट्रेक्ट कर लेती है। कंपनियों को इसका बहुत लाभ मिलता है। किसी कंपनी ने कोई सौदा छोटी अवधि के लिए किया है और उसे लगता है कि आगे भविष्य में मार्केट में उतार-चढ़ाव दर्ज किया जा सकता है तब वह अपने सौदों के अनुबंध में सुधार करके लॉन्ग हेजिंग में उसे तब्दील कर सकता है। आप एक उदाहरण के जरिए लॉन्ग हेजिंग को आसानी से समझ सकते हैं। अभी वर्ष 2010 के अक्टूबर का महीना चल रहा है और किसी उत्पादक को 25,000 पाउंड कॉपर यानी तांबा चाहिए। उत्पादक को तांबे की जरूरत मार्च में पड़ेगी। तांबे की वर्तमान समय में कीमत प्रति पाउंड की दर 1.50 डॉलर है, लेकिन इसकी वायदा कीमत प्रति पाउंड 1.40 डॉलर है। इस स्थिति में उत्पादक के लिए लॉन्ग हेजिंग करना फायदेमंद रहेगा, क्योंकि उत्पाद फिलहाल वायदा कारोबार पर कॉन्ट्रेक्ट कर लेता है तब उसे प्रति पाउंड तांबे पर 0.10 डॉलर की बचत होगी। यह संभव है कि तांबे की वायदा कीमतें 1.45 डॉलर प्रति पाउंड ही हो, लेकिन इस सूरत में भी आपको 0.05 डॉलर प्रति पाउंड का फायदा तो होगा ही।
     
    कौन होते हैं हेजर्स? 
    कमोडिटी बाजार में विभिन्न प्रकार के सहभागी होते हैं, उनमें हेजर्स काफी अहम भूमिका में होते हैं। ये कमोडिटी बाजार के वे सहभागी हैं जो किसी कमोडिटी विशेष में निहित जोखिम का फायदा उठाने की कोशिश करते हैं। हेजर्स दो प्रकार के होते हैं- प्रोड्यूसर हेजर्स और कंज्यूमर हेजर्स। प्रोड्यूसर हेजर्स उस समय के जोखिम को कम करना चाहते हैं, जब बाजार में उत्पाद आने पर उसके मूल्य में कमी हो जाए।  

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