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जानिए, आखिर क्यों नहीं बन पाई दुनिया की सबसे बड़ी एडवर्टाइजिंग कंपनी

अमेरिकी कंपनी ऑमनीकॉम और उसके फ्रांसीसी प्रतिद्व्ंद्वी पब्लिसिस के बीच चल रही 35 बिलियन डॉलर की मर्जर डील शुक्रवार को विफल हो गई है

Why World's largest advertising firm failed to take shape
अमेरिकी कंपनी ऑमनीकॉम और उसके फ्रांसीसी प्रतिद्व्ंद्वी पब्लिसिस के बीच चल रही 35 बिलियन डॉलर की मर्जर डील शुक्रवार को विफल हो गई है। इन दोनों कंपनियों के विलय होने पर यह दुनिया की सबसे बड़ी एडवर्टाइजिंग कंपनी बन जाती और यही वजह इस मर्जर डील की विफलता का कारण भी बन गई।
 
क्या थी डील
ऑमनीकॉम और पब्लिसिस के विलय करार में दोनों मालिकों के बीच 50-50 फीसदी शेयरों का बंटवारा होना था। करार में इस बात पर भी आम राय बन चुकी थी कि दोनों मालिक जॉन रेन और मॉरिस लेवी विलय के बाद 30 महीनों तक संयुक्त सीइओ रहेंगे।
 
विशेषज्ञों का मानना है कि दोनों कंपनियां विलय इसलिए कर रही थीं कि वह साथ में मिलकर गूगल और फेसबुक का डिजिटल एडवर्टाइजिंग में मुकाबला कर सकें। गैरतलब है कि गूगल औऱ फेसबुक दोनों डिजिटल दुनिया में लगभग एक चौथाई कारोबार पर कब्जा कर चुके हैं।
 
डील में क्यों हुआ गतिरोध
 
ऑमनीकॉम और पब्लिसिस ने विलय की कोशिशें जुलाई 2013 से शुरू कर दी थीं, लेकिन दुनिया की सबसे बड़ी एडवर्टाइजिंग  संस्था को अंजाम देने में दोनों देशों की टैक्स व्यवस्था से गतिरोध पैदा हो गया। फ्रांस की पब्लिसिस ब्रिटेन को टैक्स रेसिडेन्सी बनाना चाहती थी, जबकि उसका कंपनी हेडक्वार्टर नीदरलैंड था, वहीं ऑमनीकॉम व्यापार के लिए अमेरिका को हेडक्वार्टर बनाना चाह रही थी।  
 
इसके अलावा दोनों कंपनियों की कॉरपोरेट संस्कृति में भी जमीन-आसमान का अंतर होने के कारण दोनों पक्ष  इसे घाटे का सौदा मानते हुए बातचीत से पीछे हट गए।
 
एक और समस्या जो इस करार को पूरा होने से रोकने में जिम्मेदार है वह यह है कि दोनों कंपनियां चीफ फाइनेंशियल ऑफिसर(सीएफओ) के पद को लेकर आपस में भिड़ी रहीं। दोनों चाह रहे थे कि नई कंपनी के सीएफओ कि महत्वपूर्ण जिम्मेदारी उनके पास ही रहे।

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