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    छोटी नॉन-बैंकिंग फाइनेंस कंपनियों का काम पड़ा मंदा

    छोटी नॉन-बैंकिंग फाइनेंस कंपनियों का काम पड़ा मंदा

    झटका- चालू वित्त वर्ष में भारी वाणिज्यिक वाहनों के फाइनेंस में 35% कमी


    कठिन डगर
    देश की 50 फीसदी से ज्यादा छोटी एनबीएफसी उत्तर भारत में कारोबार करती हैं
    भारी वाणिज्यिक वाहनों की मांग में करीब 40 फीसदी की कमी का बुरा असर
    स्मॉल एनबीएफसी को बैंकों से महंगी दर पर कर्ज का मिलना भी प्रमुख कारण

    आर्थिकमुसीबतों का सामना कर रही छोटी नॉन-बैंकिंग फाइनेंस कंपनियों (एनबीएफसी) का कारोबार चालू वित्त वर्ष के दौरान काफी सुस्त रहा है। इन कंपनियों का मूल कारोबार भारी वाणिज्यिक वाहनों (खासकर ट्रक, ट्रैक्टर, टैम्पो आदि) और कृषि उपकरणों के लिए लोन मुहैया करना है, जिसमें इस दौरान भारी गिरावट रही है।

    पीकेएफ के प्रबंध निदेशक और पंजाब एवं हरियाणा फाइनेंस कंपनी एसोसिएशन के महासचिव आलोक सोढी ने बिजनेस भास्कर को बताया कि उत्तरी भारत में देशभर की करीब 50 फीसदी से ज्यादा छोटी एनबीएफसी अपना परिचालन कर रही हैं।

    इन कंपनियों का प्रमुख पोर्टफोलियो कॉमर्शियल व्हीकल्स को फाइनेंस करना है, लेकिन इस साल मांग कम होने की वजह से कारोबार मंदा पड़ गया। इस वित्त वर्ष के दौरान भारी वाणिज्यिक वाहनों की मांग में करीब 40 फीसदी की कमी देखी गई है, जिसका प्रभाव फाइनेंस करने वाली कंपनियों पर भी दिखा है।

    वित्त वर्ष 2012-13 के दौरान वाणिज्यिक वाहनों के फाइनेंस में 30 से 35 फीसदी तक की गिरावट दर्ज की गई है।
    उन्होंने बताया कि इस गिरावट में सुस्त रही ऑटो इंडस्ट्री के अलावा बैंकों द्वारा ऊंची ब्याज दर पर कर्ज मुहैया करना भी प्रमुख कारण है। बैंक स्मॉल एनबीएफसी को काफी ऊंची दरों पर कर्ज मुहैया करा रहे हैं।

    एक ओर, जहां इन कंपनियों के लिए फंड जुटाना और डिपॉजिट करना मुश्किल होता जा रहा है, वहीं अब बैंकों से कर्ज लेना भी आसान नहीं रहा। सोढी ने बताया कि बैंकों ने अब स्मॉल एनबीएफसी को कर्ज देने के लिए कई मापदंड अपनाने शुरू कर दिए हैं। कुल मिलाकर कहा जाए तो स्थिति काफी हद तक विकट हो गई है।

    श्रेई इक्युपमेंट फाइनेंस लिमिटेड के सीनियर वाइस प्रेसिडेंट रमन अग्रवाल ने बताया कि वैश्विक आर्थिक सुस्ती के साथ-साथ घरेलू ऑटो इंडस्ट्री की धीमी गति का प्रतिकूल प्रभाव ऑटो फाइनेंस पर देखा गया है।

    हालांकि, यह स्थिति इतनी गंभीर नहीं है। पिछले साल की तुलना में इस साल बाजार में भारी वाणिज्यिक वाहनों के खरीदार कम होने कारण फाइनेंस कंपनियों का काम भी कुछ हद तक प्रभावित हुआ है।

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