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वैश्विक परिचालन में बज रहा घरेलू कंपनियों का डंका

Agency

Dec 08,2013 09:56:00 AM IST

एक अध्ययन के मुताबिक चीन और ब्राजील की स्पर्धियों के मुकाबले भारतीय कंपनियों में ग्लोबल ऑपरेशन की भूख ज्यादा

खुलासा
विदेशी बाजारों में परिचालन की भारतीय कंपनियों की भूख जर्मनी और अमेरिका की कंपनियों के साथ मुकाबला कर रही है और उनसे पीछे नहीं हैं
सोर्सिंग, मैन्यूफैक्चरिंग, डिस्ट्रीब्यूशन/सेल्स व मार्केटिंग/प्रमोशन जैसे मोर्चे पर 55 फीसदी भारतीय कंपनियां अंतरराष्ट्रीय परिचालन में प्रमुखता से मौजूद हैं

88 फीसदी भारतीय मैन्यूफैक्चरर कंपनियों का परिचालन दायरा दुनियाभर में फैला हुआ है, जबकि चीन के लिए यह आंकड़ा 68 और ब्राजील के लिए 64 फीसदी है
अध्ययन के मुताबिक ग्लोबलाइजेशन के चलते मैन्यूफैक्चरर अब ग्राहकों की पसंद-नापसंद और सोर्सिंग में नैतिकता के बारे में सोचने पर मजबूर हुए हैं

उभरते बाजारों में भारतीय मैन्यूफैक्चरिंग कंपनियों की तुलना चीन, रूस और ब्राजील की कंपनियों से की जाती रही है। एक हालिया अध्ययन में पता चला है कि एक महत्वपूर्ण मुकाबले में मैन्यूफैक्चरिंग क्षेत्र की भारतीय कंपनियों ने चीन और ब्राजील की अपनी स्पर्धियों को पीछे छोड़ दिया है।

अध्ययन के मुताबिक विदेशी बाजारों में परिचालन की भूख के मामले में भारतीय कंपनियां चीन और ब्राजील जैसी स्पर्धी कंपनियों के मुकाबले बेहद आगे हैं। अध्ययन में यह भी कहा गया है कि विदेशी बाजारों में परिचालन की भारतीय कंपनियों की भूख जर्मनी और अमेरिका की कंपनियों के साथ मुकाबला कर रही है और उस मुकाबले में इन विकसित बाजारों की कंपनियों से पीछे नहीं हैं।

सेफ्टी साइंस कंपनी यूएल ने 'प्रोडक्ट माइंडसेट 2013Ó नाम से एक अध्ययन रिपोर्ट जारी किया है। इस अध्ययन में कहा गया है कि 88' भारतीय मैन्यूफैक्चरर कंपनियों के परिचालन का दायरा दुनियाभर में फैला हुआ है। इसके मुकाबले चीन की महज 68 फीसदी मैन्यूफैक्चरिंग कंपनियां ही दुनियाभर में कारोबार कर रही हैं।

इस मोर्चे पर ब्राजील की कंपनियां थोड़ा और पीछे हैं। अध्ययन के मुताबिक ब्राजील की सिर्फ 64 फीसदी मैन्यूफैक्चरिंग कंपनियां ही वैश्विक परिचालन में हैं। भारतीय मैन्यूफैक्चरिंग कंपनियों की एक खास बात यह है कि वे कई महत्वपूर्ण मामलों में जर्मनी और अमेरिकी कंपनियों के साथ मुकाबला कर रही हैं और उस मुकाबले में टिकी हुई हैं।

अध्ययन में कहा गया है कि सोर्सिंग, मैन्यूफैक्चरिंग, डिस्ट्रीब्यूशन/सेल्स व मार्केटिंग/प्रमोशन जैसे मोर्चे पर 55 फीसदी भारतीय कंपनियां अंतरराष्ट्रीय परिचालन में प्रमुखता से मौजूद हैं।

इन्हीं पहलुओं पर अमेरिका का आंकड़ा 54 फीसदी, जबकि जर्मनी का आंकड़ा 50 फीसदी है। अध्ययन की मानें तो चीन की महज 32 फीसदी व ब्राजील की 31 फीसदी कंपनियां ही सोर्सिंग, मैन्यूफैक्चरिंग, डिस्ट्रीब्यूशन/सेल्स व मार्केटिंग/प्रमोशन जैसी गतिविधियों को अंतरराष्ट्रीय बाजार तक पहुंचा सकी हैं। भारतीय कंपनियों को अपनी इस भूख का फायदा भी मिला है।

और भारतीय कंपनियां ही क्यों, हर कंपनी को ग्लोबल परिचालन का फायदा मिला है। अध्ययन के मुताबिक ग्लोबलाइजेशन के चलते मैन्यूफैक्चरर अब ग्राहकों की पसंद-नापसंद और सोर्सिंग में नैतिकता के बारे में सोचने पर मजबूर हुए हैं।

तीसरे वर्ष के इस अध्ययन में कहा गया है कि मैन्यूफैक्चरर्स और ग्राहकों की प्राथमिकताओं और उनकी चिंताओं के बारे में सोचने का वक्त आ गया है। अध्ययन का कहना है कि भारतीय ग्राहक अब ईको-फ्रेंडली प्रोडक्ट्स के बारे में जागरूक हो रहे हैं।

ईको-फ्रेंडली प्रोडक्ट के लिए ज्यादा दाम चुकाने वाले भारतीय ग्राहकों की तादाद 81 फीसदी तक पहुंच गई है। अध्ययन में एक महत्वपूर्ण बात यह कही गई है कि भारत में अभी प्रोडक्ट रिकॉल करने की परंपरा बहुत मजबूत नहीं हो पाई है। हालांकि नियामकों में बढ़ रही चुस्ती के चलते कंपनियां इस दिशा में कदम उठा रही हैं।

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