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वाराणसी... काशी आर्द्र बनी मोस्ट अट्रैक्टिव मूली:IIVR में विकसित हुई इस प्रजाति के पत्तों का वजन और संख्या सामान्य मूली से आधी

वाराणसी7 महीने पहले
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वाराणसी के भारतीय सब्जी अनुसंधान संस्थान (IIVR) द्वारा विकसित काशी आर्द्र मूली अगले साल मई तक बाजार में आ जाएगी। - Money Bhaskar
वाराणसी के भारतीय सब्जी अनुसंधान संस्थान (IIVR) द्वारा विकसित काशी आर्द्र मूली अगले साल मई तक बाजार में आ जाएगी।

वाराणसी में काशी आर्द्र नामक मूली की ऐसी प्रजाति विकसित की गई है जिसके पत्तों का वजन और संख्या नॉर्मल मूली की आधी ही होती हैं। यानि कि नॉर्मल मूली में 15 पत्ते होते हैं तो इसमें केवल 7, वहीं साइज भी छोटे। पत्ते गाढ़े हरे रंग के होते हैं, जिनका पालक के साग की तरह से उपयोग किया जा सकता है।

दूसरी सबसे फायदे की बात इस मूली की जड़ें सामान्य मूली से बड़ी होती हैं। बारिश के दिनों में या आर्द्रता वाले क्षेत्रों में मूली के पत्तों का विकास तेजी होता है, जबकि जड़ों (खाने वाला भाग) का ग्रोथ रूक जाता है। इस मूली में ऐसा नहीं है। इसका विकास सिर्फ जड़ों में ही होगा, पत्तों में कम।

रेस्टोरेंट और शादियों में होगी आकर्षण का केंद्र

वाराणसी के भारतीय सब्जी अनुसंधान संस्थान (IIVR) द्वारा विकसित इस प्रजाति को नेशनल सीड कॉरपोरेशन (NSC) से मोस्ट अट्रैक्टिव मूली के रूप में भी पहचान मिली है। इसके पत्ते कम होते हैं मगर देखने में काफी आकर्षक, जिनका यूज होटल, शादियों और रेस्टोरेंट आदि में खूब किया जा सकता है। संस्थान के निदेशक प्रो. तुषारकांत बेहरा ने बताया कि NSC ने इसके बीज को बेचने की मान्यता दे दी है। अब यहां पर उत्पादन का काम तेजी से शुरू हो गया है।

2012 में शुरू हुआ काम
सब्जी अनुसंधान में इस मूली पर डॉ. बीके सिंह ने वर्ष 2012 में काम करना शुरू किया था। इस पर ट्रायल 2016 में, बीज की संस्तुति 2019 में और 2020 में NSC द्वारा इसे अधिसूचित कर दिया गया। वहीं इस साल से यह सीड चेन में आ गई, अर्थात बीज का उत्पादन शुरू कर दिया गया है। मई 2022 से बीज बाजार में भी मिलने लगेंगे।

डॉ. सिंह ने कहा कि NSC ने इसे ग्रोथ, अपीयरेंस और बेहतर उपज देने के लिए सेलेक्ट किया है।

पर परागण और नॉर्मल सेलेक्शन से किया विकसित
डॉ. सिंह ने बताया कि इस मूली को पर परागण कराकर विकसित किया गया। यानि कि नॉर्मल सेलेक्शन से पौधों का चुनाव किया गया। फिर उनका आपसी क्रॉस कराकर नए तरह के गुणों वाले पाैधों का चvaraयन किया गया। इस तरह से करीब 4 साल बाद इसमें नए तरह की खूबी वाले पौधे की वैरायटी मिल गई।

असम और बंगाल के मौसम में दिखेगा सबसे ज्यादा प्रभाव
डाॅ. सिंह कहते हैं कि इस मूली को बंगाल, असम और पूर्वाेत्तर भारत को ध्यान में रखकर तैयार किया गया है। जहां पर बारिश अधिक होती है और कंडीशन हमेशा आर्द्रता वाला बना रहता है वहां पर मूली की जड़ें छोटी और पत्ते काफी लंबे चौड़े हो जाते हैं। यानि कि पानी पाकर मूली के जड़ों का विकास नहीं बल्कि पत्ते बढ़ जाते हैं। इससे किसानों को काफी नुकसान झेलना पड़ जाता है। मगर, इस बीज को लगाने के बाद मूली के जड़ ही बढ़ेंगे, पत्तों का विकास नहीं होगा।

पोषण सामान्य मूली से भी ज्यादा
इस मूली में विटामिन सी, प्रोटीन, कैल्शियम, पोटैशियम, फाइबर, आयरन, मैंगनीज, फॉलिक एसिड काफी अधिक पाई जाती है। खाने में तीखापन और न्यूट्रिशन कंटेंट में सामान्य मूली से कहीं बेहतर होती है। बीज लगाने के बाद 35 दिन बाद मूली तैयार हो जाते हैं। खाने वाले भाग यानि कि जड़ों की लंबाई 24 सेंटीमीटर तक चली जाती है। इस मूली को किसी भी तरह की मिट्टी में उगाया जा सकता है। मगर, बलुई दोमट में इसकी पैदावार डेढ़ गुना तक बढ़ जाती है।