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काशी के मसलों पर बेबाक थे महंत नरेंद्र गिरि:BHU के धर्म विज्ञान संकाय में प्रोफेसर फिरोज की नियुक्ति का किया था समर्थन, गंगा में मूर्ति विसर्जन का किया था विरोध

वाराणसी/ प्रयागराज3 महीने पहले
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अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद के अध्यक्ष महंत नरेंद्र गिरि काशी के मसलों को लेकर हमेशा मुखर रहे। इसलिए उनका काशी के संत-महंतों से आत्मीय संबंध था। सोमवार की शाम उनके फांसी लगाने जानकारी मिलने के बाद से सभी स्तब्ध हैं। लोगों का कहना है कि जो बात नरेंद्र गिरि को नागवार गुजरती थी, उस पर वह अपनी त्वरित प्रतिक्रिया भी देते थे। हाल के वर्षों में काशी में ऐसे 2 प्रकरण सामने आए जब महंत नरेंद्र गिरि ने बेबाकी से अपनी बात रखी थी।

गंगा में मूर्ति विसर्जन की परंपरा पुरानी नहीं
काशी में गंगा में मूर्ति विसर्जन को लेकर धरना दे रहे साधु-संतों पर 22 सितंबर 2015 की रात लाठीचार्ज किया गया था। इसके विरोध में 5 अक्टूबर 2015 को स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद के नेतृत्व में संतों ने अन्याय प्रतिकार यात्रा निकाली थी। उस दौरान जमकर पथराव और आगजनी हुई थी। हालात इस कदर बिगड़ गए थे कि चार थाना क्षेत्रों में 2 घंटे के लिए कर्फ्यू लगाना पड़ा था। 11 अक्टूबर 2015 को शहर आए महंत नरेंद्र गिरि ने अन्याय प्रतिकार यात्रा पर नाराजगी जताई थी।

उन्होंने दो-टूक कहा था कि गंगा में अस्थि विसर्जन की परंपरा पुरातन समय से है, लेकिन मूर्ति विसर्जन की परंपरा बहुत पुरानी नहीं है। गंगा का पृथ्वी पर अवतरण अस्थि विसर्जन के लिए हुआ है न कि मूर्ति विसर्जन के लिए हुआ है। गंगा निर्मलीकरण के अभियान में जुड़ कर साधु-संत प्रशासन का सहयोग करें। गंगा में मूर्ति विसर्जन न करके प्रशासन द्वारा खोदवाए गए कुंडों में ही प्रतिमाओं का विसर्जन करें।

BHU में प्रो. फिरोज की नियुक्ति का किया था समर्थन

डॉक्टर फिरोज खान का महंत नरेंद्र गिरि ने समर्थन किया था।
डॉक्टर फिरोज खान का महंत नरेंद्र गिरि ने समर्थन किया था।

BHU के संस्कृत विद्या धर्म विज्ञान संकाय में असिस्टेंट प्रोफेसर के पद पर डॉ. फिरोज खान की नियुक्ति को लेकर नवंबर 2019 में 2 हफ्ते से ज्यादा समय तक छात्रों ने धरना दिया था। छात्रों का कहना था कि डॉ. फिरोज सनातन धर्म का ज्ञान कैसे दे सकते हैं। उस दौरान श्रीमहंत नरेंद्र गिरि ने BHU के छात्रों से प्रदर्शन खत्म करने की अपील की थी। कहा था कि छात्र विश्वविद्यालय के हित में फिरोज खान की नियुक्ति का समर्थन करें। पहले जब गुरुकुल परंपरा होती थी तब ऐसा होता था कि एक खास वर्ग के लोगों का चयन होता था, जो समय के हिसाब से उचित था।

लेकिन, आज 21वीं सदी में भारत में हर मजहब के लोग हर भाषा का ज्ञान रखते हैं। यह उनका संवैधानिक अधिकार भी है। ऐसे में अगर एक मुस्लिम प्रोफेसर संस्कृत पढ़ा रहा है तो इसमें कुछ गलत नहीं है। हमें उनका स्वागत करना चाहिए।

काशी से जुड़ी इन बातों के समर्थन में आगे आए

  • सनातन संस्कृति के इतिहास में पहली बार दलित वर्ग के किसी संत को महामंडलेश्वर बनाने का निर्णय अप्रैल 2018 में लिया गया था। तीर्थराग प्रयाग में यमुना तट पर इस संबंध में श्रीमहंत नरेंद्र गिरि ने जानकारी दी थी। प्रभुनंद गिरि को महामंडलेश्वर बनाने की घोषणा काशी सुमेरु पीठाधीश्वर जगदगुरु स्वामी नरेंद्रानंद सररस्वती महाराज ने की थी, जिसे अखाड़ा परिषद ने अपनी मान्यता दी थी।
  • काशी और मथुरा के हिंदू मंदिरों को मुक्त कराने की श्रीमहंत नरेंद्र गिरि ने घोषणा की थी। इसके लिए उनकी अध्यक्षता में साल 2020 में हुई बैठक में राम जन्मभूमि आंदोलन की तर्ज पर वाराणसी और मथुरा में अभियान शुरू करने का प्रस्ताव पारित किया गया था।
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