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84 साल के डी.लिट डिग्रीधारी अमलधारी सिंह से मिलिए:बुजुर्ग विद्यार्थी ने खोजी ऋग्वेद की दो गुमनाम शाखाएं, 60 साल से कर रहे थे रिसर्च

वाराणसी3 महीने पहलेलेखक: हिमांशु अस्थाना
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काशी हिंदू विश्वविद्यालय से प्रो. उमेश सिंह के अंडर में 84 साल के छात्र डॉ. अमलधारी सिंह को डी.लिट की उपाधि मिली है। उन्होंने ऋग्वेद की दो शाखाओं 'शांखायन' और 'आश्वलायन' के मंत्रों को एक साथ लाकर किताब प्रकाशित कराई है। इसमें 21 हजार 388 मंत्र दिए गए हैं। हिंदू धर्म के मूल ग्रंथ ऋग्वेद की ये दोनों गुमनाम शाखाएं सैकड़ों सालों से खोजी जा रही थीं।

डॉ. सिंह ने दैनिक भास्कर से बातचीत में बताया कि उन्होंने इस दिशा में काम करना 1962 से शुरू किया था। इससे पहले 180 साल से ऋग्वेद के संकलन कराने का श्रेय मैक्समूलर को ही दिया जाता था।

शांखायन संहिता का प्रथम भाग डॉ. अमलधारी सिंह ने बनारस में लिखा था।
शांखायन संहिता का प्रथम भाग डॉ. अमलधारी सिंह ने बनारस में लिखा था।

करीब 3500 साल पहले रचित ऋग्वेद के अभी तक दो ही शाखाओं के ग्रंथ मौजूद थे। इसमें से एक 10 हजार 472 मंत्रों वाला ग्रंथ 'शाकल' जर्मन विद्वान मैक्समूलर ने 1849 में प्रकाशित कराया था। इसी से आज पूरे भारत भर में ऋग्वेद पढ़ाया जाता है। दूसरा सेकेंडरी सोर्सेज के हवाले से लिखा गया 'वाष्कल' है।

शांखायन सहिंता के मंत्र पांडुलिपियों में इस तरह लिखे हैं, जो अलवर पैलेस लाइब्रेरी में रखे हैं।
शांखायन सहिंता के मंत्र पांडुलिपियों में इस तरह लिखे हैं, जो अलवर पैलेस लाइब्रेरी में रखे हैं।

जल्द ही शुरू होगा अनुवाद
शाखा का मतलब है ऋग्वेद की कॉपियों या एडिशन से। डॉ. सिंह ने कहा कि ऋग्वेद भारत के 21 अलग-अलग गुरुकुलों में पहली बार लिखी गई। यानी ऋग्वेद एक ही है, लेकिन उसे 21 अलग-अलग तरीकों से लिखा गया। इस वजह से इसकी 21 शाखाएं हैं। अलग-अलग जगहों पर लिखे जाने की वजह से इसके मंत्रों की संख्या में बदलाव आ गए।

मैक्समूलर ने 'शाकल' शाखा को कलेक्ट किया था, उसमें 10 हजार 772 मंत्र थे। दूसरे सेकेंड्री सोर्स वाले ग्रंथ वाष्कल में 10 हजार 548 मंत्र हैं। डॉ. अमलधारी के दोनों ग्रंथों में उससे 289 और 155 मंत्र ज्यादा हैं। अब इन ग्रंथों के अनुवाद का काम जल्द ही वैदिक ब्राह्मणों की देख-रेख में शुरू होगा।

डॉ. अमलधारी के प्रयास से ऋग्वेद की शांखायन संहिता पहली बार दुनिया के सामने आई है।
डॉ. अमलधारी के प्रयास से ऋग्वेद की शांखायन संहिता पहली बार दुनिया के सामने आई है।

16वीं सदी में काशी में लिखी गई
डॉ. अमलधारी सिंह ने जिस ग्रंथ की रचना की है, उसमें से एक शंखायन 16वीं सदी में काशी में लिखा गया था। यहां से यह अहमद नगर पहुंचा। राजस्थान के महाराजा विनय सिंह को इसकी जानकारी मिली, तो उन्होंने इस हजारों मंत्र की पांडुलिपियों को राजस्थान के अलवर पैलेस लाइब्रेरी में सुरक्षित रखवा दिया। तब से किसी ने इस धरोहर को न तो पढ़ा और न ही इसके बारे में कोई जानकारी कभी बाहर आई।

मैक्समूलर द्वारा खोजी गई ऋग्वेद की शाकल संहिता, जिसमें 10 हजार 772 मंत्र लिखे हैं।
मैक्समूलर द्वारा खोजी गई ऋग्वेद की शाकल संहिता, जिसमें 10 हजार 772 मंत्र लिखे हैं।

लाइब्रेरी में मिलीं थीं 63 पांडुलिपियां
लाहौर के रिसर्च स्कॉलर भगवत दत्त ने 1960 के आस-पास अपनी किताब में यह चर्चा की थी कि उन्होंने अलवर महाराजा लाइब्रेरी में कुछ सामग्री देखी, मगर वह उन्हें पढ़ नहीं सके। यह जानकारी मिलने के बाद डॉ. अमलधारी सिंह 1968 में इस लाइब्रेरी में आए, तो उन्हें 12 हजार पन्नों की 63 पांडुलिपियां मिलीं। जांच-पड़ताल करने पर पता चला कि ये ऋग्वेद की मूल प्रतियां हैं।

उसके बाद से डॉ. अमलधारी ने कई लेख प्रकाशित कराए और साल 2012-13 में उज्जैन स्थित महर्षि सांदीपनि राष्ट्रीय वेद विद्या प्रतिष्ठान ने शांखायन संहिता को चार भाग में प्रकाशित किया गया।

डॉ. राजेश सरकार, संस्कृत विभाग, BHU
डॉ. राजेश सरकार, संस्कृत विभाग, BHU

महर्षि पतंजलि ने बताई हैं ऋग्वेद की 21 शाखाएं
BHU में सस्कृत विभाग के डॉ. राजेश सरकार ने बताया कि ऋग्वेद की पांच शाखाएं सबसे प्रसिद्ध हैं। इनमें डॉ. अमलधारी द्वारा प्रकाशित दोनों शाखाएं भी शामिल हैं। वेद श्रुति परंपरा की चीज रही, यानी यह गुरु से शिष्यों को बोलकर पढ़ाई गईं। लिपि कला तब नहीं थी।

दूसरी शताब्दी के बाद यह लिखी गई। पढ़ने में सुविधा हो, इसके लिए वेद व्यास ने वेद को चार भाग में बांटा। अपने चार शिष्यों पैल, सुमंतु, जैमिनी और वैशंपायन को पढ़ाया। इसमें सबसे प्राचीन ऋग्वेद है। उन्होंने बताया कि महर्षि पतंजलि ने ऋग्वेद की 21 शाखाएं बताईं हैं।

ऋग्वेद की चार शाखाएं और उनके मंत्रों की संख्या

शाकल10 हजार 472
वाष्कल10 हजार 552
आश्वालायन10 हजार 761
शांखायन10 हजार 627