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सुल्तानपुर की IAS की तैयारी कर रही बेटी का दर्द:अनुश्रुति सिंह ने लिखा- धर्म के नाम पर कारोबार नया नहीं; ये प्रथा ब्रिटिशर्स की बनाई है

सुल्तानपुरएक महीने पहले
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देश-प्रदेश में धर्म के नाम पर होती सियासत से समाज का शिक्षित वर्ग चिंतित है। सुल्तानपुर की अनुश्रुति सिंह ऐसे जागरूक चिंतक में से एक हैं। आईएएस की तैयारी कर रही अनुश्रुति ने कॉलम लिखकर चिंता जाहिर की है।

रामगंज की रहने वाली अनुश्रुति सिंह ने अपने कॉलम की शुरुआत कबीर दास के दोहों से की है। उसने लिखा कि कबीर ने लिखा, "मोको कहां ढ़ूंढ़े बंदे, मैं तो तेरे पास में। न तीरथ न मूरत में, न एकांत न निवास में। न मंदिर में, न मस्जिद में, न काबे कैलाश में।" क्या कबीर को ये एहसास था कि इक्कीसवीं सदी का धर्मनिरपेक्ष राज्य भारत धर्म को सारथी मान आवाहन देगा एक संग्राम की?

अनुश्रुति आगे लिखती है कि धर्म के नाम पर कारोबार कुछ नया नहीं, मॉर्डन जमाने का कहे तो, ब्रिटिशर्स की बनाई ये प्रथा अपनी धाक आज भी जमाए रखे है। डिवाइड एंड रूल। प्रजा को अजीज भी यही शायद तभी जड़े इसकी कमजोर नहीं हुई आज तक, बशर्ते टहनियां ऊंचाइयां छू रही हैं। रहीमा पुरोहित और रामुआ खान धर्म का असल मतलब जाने या न जाने, लेकिन इक अलग ही इश्क कर बैठते हैं। धर्म के नाम पर मर मिटने को।

अनुश्रुति सिंह का कॉलम।
अनुश्रुति सिंह का कॉलम।

वो लिखती हैं कि इक सच्चे नागरिक या इंसान और शासक के लिए मुल्क ही धर्म होता है मुल्क ही कर्म और मर मिटने की वजह मुल्क। सत्ता की लालच में अंधे होकर शासक या राजनेता धर्म को बेच देता है। और हम नागरिक आमतौर पर बिल्कुल शांति से तटस्थ भाव से निरासक्त होकर निष्क्रियता से अपने धर्म मुल्क को बिकते हुए देखते रहते हैं या तो एक बड़ा तबका हिस्सा ले लेता है नीलामी लगवाने में। मानो मुल्क ही दिवालिया हो गया है।

उसने राममंदिर से लेकर गोधरा तक का जिक्र किया। लिखा बाबरी मस्जिद/रामजन्मभूमि विवाद, गोधरा राइट्स, मुजफ्फरनगर के दंगे इत्यादि लहू-लुहान बुरे यादों से शायद ही हम अभी उभरे हो कि इक या कई ऐसे ऐलान-ए-जंग का आगाज फिर से हो गया है। राममंदिर वहीं बनाएंगे का सपना पूरा हुआ तो काशी और मथुरा चपेटे में आ गया।

धार्मिक अंधापन मुल्क को प्रचंड विनाश की ओर ले जा रहा

उन्माद के इस ज्वार में बह रहा धार्मिक अंधापन मुल्क को किसी प्रचंड विनाश की ओर ले जा रहा। और ऐसे में जब कोई सतह पर माचिस फेंकता है तो खुद को छिपाने वाले की संख्या अमूमन कम होती है। कोई नहीं बचता उसकी लपेट से और याद रखा जाता है दंगे का स्थान और तारीख घायलों और मारने वालो की संख्या जो हो जाएगा इतिहास के पन्ने में कहीं गुम। तो उठो जागो जाग्रत करो अपनी चेतना। देखो लाभ किसमें धर्म का, मुल्क का, हमारा लाभ। व्यापक चेतना और गतिशीलता यथार्थ का वाहक है।

और ये प्रयास हमे किसी भी तरह से नुकसान नहीं पहुंचाएंगे बल्कि एक दिन हमारी बेड़ियों को काट देंगें। असल में तब आज़ादी मिलेगी हमे। हमारा मिलय तब शुद्ध और पाक होगा। इस डागफाइट का अंत होगा। तब मिलेगी कहीं जा के हमे सांझ की सुबह।

अंत में कबीर अमर हैं। परंतु उनके शब्द चीखते हुए कहते है -जो ढूंढना है उस परमेश्वर को तो अपने अंदर ढ़ूंढो या ढ़ूंढो हर एक इंसान में। मुल्क समय की एक ऐसी छोर पर है जहां से वो संभला नही तो पतन की ओर अग्रसर होगा। और उस दिन किसी की जीत नहीं होंगी। न इस्लाम की, न हिन्दुज़म की, न किसी और धर्म की। हार होगी हम सबकी।

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