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चंदौसी में मनाई गई नाना साहेब पेशवा की जयंती:1857 में अंग्रेजों के खिलाफ किया विद्रोहियों का नेतृत्व, शहीद गिरीश चन्द्र जूनियर हाईस्कूल में हुआ कार्यक्रम

चंदौसीएक महीने पहले
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चंदौसी में महापुरुष स्मारक समिति एवं सर्व समाज जागरूकता अभियान (भारत) के संयुक्त तत्वावधान में गुरुवार को प्रथम भारतीय स्वतन्त्रता संग्राम के शिल्पकार (1857) नाना साहेब पेशवा की जयंती मनाई गई।कागजी मोहल्ला स्थित शहीद गिरीश चन्द्र जूनियर हाईस्कूल में जयंती धूमधाम से मनाई गई।

स्वतंत्रता संग्राम में था विशेष योगदान
सर्वप्रथम मुख्य अतिथि/मुख्य वक्ता अखिल भारतीय ब्राह्मण महासभा के राष्ट्रीय अध्यक्ष कवि माधव मिश्र ने नाना साहेब पेशवा के चित्र के समक्ष दीप प्रज्ज्वलित कर माल्यार्पण कर कार्यक्रम का शुभारंभ किया।कार्यक्रम की अध्यक्षता संगीता गौतम ने की। संचालन पूर्व बैंक मैनेजर दिनेश चंद्र गुप्ता ने किया। विशिष्ट अतिथि पूर्व प्रधान वेदराम मौर्य, सेवानिवृत्त प्रधानाध्यापक रोशन लाल, दीपेन्द्र नाथ गुप्ता रहे। व्यवस्थापक पूजा आनन्द रहीं।

मुख्य अतिथि/मुख्य वक्ता अखिल भारतीय ब्राह्मण महासभा के राष्ट्रीय अध्यक्ष कवि माधव मिश्र ने कहा कि प्रथम भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के शिल्पकार नाना साहेब पेशवा का जन्म 19 मई 1824 को महाराष्ट्र के वेणुग्राम में हुआ था। पिता माधव नारायण राव तथा माता गंगा बाई थीं। इनके पिता पेशवा बाजीराव द्वितीय के सगोत्र भाई थे। पेशवा बाजीराव द्वितीय जिस समय दक्षिण छोडकर गंगा तट बिठूर कानपुर में रहने लगे थे, तब उनके साथ माधव नारायण राव और पत्नी गंगा बाई भी वहीं रहने लगे थे।

पेशवा ने लिया था गोद
इसी समय नाना साहेब का जन्म हुआ था। जो भारत के स्वतन्त्रता के इतिहास में अपने अनुपम देश प्रेम के कारण हमेशा को अमर हो गए। बचपन में ही नाना साहेब के माता पिता की मृत्यु हो गई थी। इसके बाद पेशवा बाजीराव बल्लाल राव द्वितीय ने नाना साहेब को पुत्रहीन होने के कारण गोद ले लिया।

कानपुर के पास गंगा तट के किनारे बिठूर में ही रहते हुए बाल्यावस्था में नाना साहेब ने घुड़सवारी, मल्लयुद्ध और तलवार चलाने में कुशलता प्राप्त कर ली थी। कुछ इतिहासकारों ने नाना साहेब को बालाजी बाजीराव के नाम से भी संबोधित किया है।

1 जुलाई 1857 को जब कानपुर से अंग्रेजों ने प्रस्थान किया तो नाना साहेब ने पूर्ण स्वतंत्रता की घोषणा कर दी थी और पेशवा की उपाधि भी धारण की। नाना साहेब का अदम्य साहस कभी भी कम नहीं हुआ। उन्होंने कानपुर में अंग्रेजों के खिलाफ विद्रोहियों का नेतृत्व किया। साल 1857में जब मेरठ में क्रांति का श्री गणेश हुआ तो नाना साहेब ने बड़ी वीरता और दक्षता से क्रांतिकारियों की सेना का कभी गुप्त रूप से और कभी प्रकट रूप से नेतृत्व किया। फतेहपुर आदि के स्थानों में नाना साहेब के दल से और अंग्रेजों में भीषण युद्ध हुए।

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