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शिवालिक में गूंजी मां शाकंभरी देवी के जयकारों की गूंज:भूरादेव से मां के दरबार तक लगी श्रद्धालुओं की कतार

सहारनपुर2 महीने पहले
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मां शाकंभरी देवी का मंदिर। - Money Bhaskar
मां शाकंभरी देवी का मंदिर।

सहारनपुर में कोरोना काल के दो साल बाद शारदीय नवरात्र के पहले दिन सिद्धपीठ मां शाकंभरी देवी परिक्षेत्र मां के जयकारों से गूंज उठा। जिला प्रशासन की अनुमति के बाद नौ दिवसीय मेला लगाया गया। मेले में श्रद्धालुओं की मां शाकंभरी देवी के प्रति अटूट आस्था दिखाई दी।

मन्नत पूरी होने के बाद श्रद्धालु दंडवत होकर मां के दरबार में हाजिरी लगाने पहुंचे। जिसमें महिला भी शामिल है। श्रद्धालु शाक-सब्जियां और प्रसार चढ़ाने के लिए मां के दरबार में पहुंचे।

इस बार श्रद्धालुओं के लिए परेशानी यह रहेगी। करीब डेढ़ किलोमीटर का पथरीला सफर भूरा देव से मां शाकंभरी देवी तक पैदल ही तय करना पड़ेगा। क्योंकि पहाड़ों पर हो रही बारिश के कारण अचानक से बरसाती नदी का जलस्तर बढ़ जाता है। ऐसे में सुरक्षा के लिहाज से जिला प्रशासन ने सभी वाहनों को भूरा देव पर खड़े कराने की व्यवस्था की है।

सुबह से ही श्रद्धालुओं का तांता लगा रहा

मंदिर के भीतर विराजमान शाकंभरी देवी उनके दायीं ओर भीमा देवी एवं भ्रामरी देवी तथा बायीं ओर शताक्षी देवी की प्रतिमा विराजमान है।
मंदिर के भीतर विराजमान शाकंभरी देवी उनके दायीं ओर भीमा देवी एवं भ्रामरी देवी तथा बायीं ओर शताक्षी देवी की प्रतिमा विराजमान है।

मां शांकभरी देवी के प्रति श्रद्धालुओं की आस्था का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि सुबह करीब 3 बजे से ही पंजाब, हरियाणा, उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश व हिमाचल प्रदेश के श्रद्धालु मां के दरबार में पहुंच गए। सोमवार की भोर मां शाकंभरी देवी के जयकारों से गूंज उठी। भूरादेव से लेकर मां के दरबार तक श्रद्धालुओं की कतार लगी हुई है।

आम दिनों में रहती है भीड़

मां शाकंभरी देवी के मंदिर का गुंबद।
मां शाकंभरी देवी के मंदिर का गुंबद।

प्राचीन सिद्धपीठ मां शाकंभरी देवी के दरबार में आम दिनों में भीड़ रहती है। उत्तर प्रदेश, हरियाणा, पंजाब, हिमाचल आदि राज्यों से श्रद्धालुओं का आवागमन मां के दरबार में 12 महीने रहता है। हालांकि प्रतिदिन संख्या कम होती है लेकिन मां के दरबार में चहल-पहल रहती है। मंदिर परिसर में प्रसाद की दुकानें भी 12 महीने लगी रहती है। हां, बरसात के दिनों में बरसाती नदियां उफान पर होती है, तो श्रद्धालुओं को भारी परेशानी उठानी पड़ती है।

यह मां शाकंभरी देवी का इतिहास
अखिल भारतीय संत संघर्ष समिति के राष्ट्रीय अध्यक्ष व श्री शाकंभरी संस्कृत विद्यालय के अध्यक्ष श्रीमहंत सहजानंद ब्रह्मचारी बताते हैं, 'देवी पुराण, शिव पुराण और धार्मिक ग्रंथों के अनुसार, हिरण्याक्ष के वंश में महादैत्य रूरु का एक पुत्र दुर्गम हुआ। दुर्गमासुर ने ब्रह्मा जी की तपस्या करके चारों वेदों को कब्जा लिया। ब्राह्मणों ने अपना धर्म त्याग कर दिया। चौतरफा हाहाकार मच गया।
ब्राह्मणों के धर्म विहीन होने से यज्ञादि अनुष्ठान बंद हो गए और देवताओं की शक्ति भी क्षीण होने लगी। जिसके कारण एक भयंकर अकाल पड़ा। किसी भी प्राणी को जल नहीं मिला जल के अभाव मे वनस्पति भी सूख गई। भूख और प्यास से समस्त जीव मरने लगे।

दुर्गमासुर की देवों से भयंकर लड़ाई हुई। जिसमें देवताओं की हार हुई और दुर्गमासुर के अत्याचारों से पीड़ित देवतागण शिवालिक पर्वतमालाओं में छिप गए। देवताओं ने मां जगदंबा की स्तुति की, जिसके बाद मां जगदंबा प्रकट हुई। संसार की दुर्दशा देखकर मां जगदंबा का हदय पसीज गया और उनकी आंखों से आंसुओं की धारा प्रवाहित होने लगी। मां के शरीर पर 100 नेत्र प्रकट हुए। शत नैना देवी की कृपा हुई ओर संसार में बारिश हुई, जिससे नदी और तालाब जल से भर गए। श्रीमहंत सहजानंद ब्रह्मचारी बताते हैं कि देवताओं ने उस समय मां शताक्षी देवी नाम से आराधना की। माता ने पहाड़ पर दृष्टि डाली तो सर्वप्रथम सराल नामक कंदमूल की उत्पत्ति हुई । इसी दिव्य रूप में मां शाकंभरी देवी के नाम से पूजित हुई।'

शिवालिक पहाड़ी में आसन लगाया
मां शाकंभरी देवी ने दुर्गमासुर को रिझाने के लिए सुंदर रुप धारण कर शिवालिक पहाड़ी पर आसन लगा लिया। जब असुरों ने पहाउ़ी पर बैठी जगदंबा मां को देखा तो उनको पकड़ने का विचार आया। दुर्गमासुर भी मां को पकड़ने के लिए पहुंचा था लेकिन मां ने पृथ्वी और स्वर्ग के बाहर एक घेरा बना दिया और स्वयं उसके बाहर खड़ी हो गई। दुर्गमासुर के साथ देवी का घोर युद्ध हुआ अंत में दुर्गमासुर मारा गया। इसी स्थल पर मां जगदंबा ने दुर्गमासुर तथा अन्य दैत्यों का संहार किया।

शिवालिक पहाड़ियों की गोद में है मां का आसन
इतिहासकार राजीव उपाध्याय यायावर बताते हैं कि देवी भागवती पुराण में सहारनपुर का सांस्कृतिक इतिहास प्राप्त होता है। मां शाकंभरी देवी का मंदिन तथा इसके चतुर्दिक क्षेत्र जसमोर रियासत के राजा परिवार के अधिकार में है। सहारनपुर मजेटियर तथा सत्यकेतू विद्यालंकार द्वारा लिखित ऐतिहासिक उपन्यास आचार्य विष्णुगुप्त के आधार पर इस मंदिर की स्थिति 326 ईसा पूर्व के आसपास सिद्ध होती है। यह कहा जाता है कि सम्राट चंद्रगुप्ता अपने प्रवास काल में यहां आकर रहा करते थे और प्रतिदिन मां शाकंभरी देवी के दर्शन करते थे।

चार प्रतिमाएं है विराजमान
शाकंभरी देवी के मंदिर में चार प्रतिमाएं प्रतिष्ठित हैं, शाकंभरी देवी उनके दायीं ओर भीमा देवी एवं भ्रामरी देवी तथा बायीं ओर शताक्षी देवी की प्रतिमा विराजमान है। ये सभी मां दुर्गा के ही रूप कहे गए हैं। दुर्गा सप्तशती के 11वें अध्याय में उक्त चारों देवियों के स्वरूप का तात्विक वर्णन मिलता है।

उन्होंने बताया कि पुराणों में धारण है कि देवी ने एक सहस्र दिव्य वर्षों तक प्रत्येक मास के अंत में मात्र एक बार शाकाहार करते हुए घोर तप किया था। उनकी तपस्या की चर्चा सुनकर श्रद्धालु एवं ऋषि-मुनि उनके दर्शनार्थ यहां पहुंचे तो देवी के शाकाहार से ही उनका आतिध्य सत्कार किया था।

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