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श्राद्ध पक्ष... प्रयागराज के पंडों के काम पर ग्राउंड रिपोर्ट:यहां 1483 पंडों के पास है देशभर के श्रद्धालुओं के 7 पुश्तों का रिकॉर्ड, अल्फाबेटिकल क्रम में ऐसे होती है इंडेक्सिंग

प्रयागराज3 महीने पहलेलेखक: अमरीश शुक्ल
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क्या आपके पूर्वज कभी संगम स्नान करने आए थे? उनकी हैंड-राइटिंग कैसी थी? वे दस्तखत कैसा बनाते थे? आपकी 7 पुश्तों की वंशावली क्या है? उनके नाम क्या है? अगर आपको यह सब जानने में तनिक भी रुचि है तो पितृ पक्ष के पहले दिन आइए, हम आपको ले चलते हैं संगम नगरी...जहां बही खातों का अनोखा संसार है…और इस संसार में दर्ज है, आपके पुरखों का रिकॉर्ड। हमारे और आपके पास भले ही अपनी 7 पुश्तों का रिकॉर्ड न हो पर प्रयागराज के 1483 तीर्थ-पुरोहित (पंडा) ऐसे हैं, जिनकी बहियों में पूरे देश के परिवारों के 7 पुश्तों का रिकॉर्ड है।

प्रयागराज के इन पंडों के बही खातों को मेंटेन करने का तरीका इतना वैज्ञानिक और प्रमाणित है कि पुरातत्ववेत्ता और संग्रहालयों के निदेशक भी इससे सीख ले सकते हैं। आप कहीं के भी रहने वाले हों, किसी भी जाति-धर्म के हों अगर आपके पूर्वज कभी माघ मेले में प्रयागराज आए होंगे तो उनका नाम-पता और दस्तखत पंडों के पास जरूर मिल जाएगा। बही खाते मेंटेन करने का क्या तरीका है? कैसे रखते हैं इतने पुराने रिकॉर्ड? आइए समझते हैं…

बही खातों को दिखाता तीर्थ पुरोहित।
बही खातों को दिखाता तीर्थ पुरोहित।

हर पंडे का अपना मुनीम होता है
प्रयागराज में तीर्थ-पुरोहितों के 1483 परिवार रहते हैं। हर परिवार के पास अपने अपने क्षेत्र की बहियां होती हैं। सबका काम का सीमा क्षेत्र बंटा होता है। कोई भी पंडा दूसरे पंडे के सीमा क्षेत्र से प्रयागराज आने वाले लोगों को अपने यहां नहीं बुलाता। सीमा क्षेत्र का किसी ने निर्धारण नहीं किया है, लेकिन माना जाता है कि 16वीं शताब्दी से यह परंपरा चली आ रही है। लोग अपने अपने तीर्थ-पुरोहितों के पास उनके निशान के अनुसार जाते हैं। यह निशान झंडे पर बने होते हैं और कई पीढ़ियों से वही चले आ रहे हैं। पंडों के पास आने वाले श्रद्धालुओं का रिकॉर्ड मेंटेन करने के लिए हर तीर्थ-पुरोहित के पास अपना खुद का मुनीम होता है जो बहीखातों को मेंटेन करता है।
अल्फाबेटिकल क्रम में दर्ज होता है रिकॉर्ड
पीली कोठी वाले तीर्थ पुरोहित यतींद्र त्रिपाठी बताते हैं कि हर बही का अपना एक इंडेक्स होता है। इस इंडेक्स में अल्फाबेटिकल आर्डर में उस क्षेत्र के गांवों से आने वाले लोगों का ब्यौरा दर्ज किया जाता है। हमारी जजमानी मध्य प्रदेश के जिला विदिशा की है। इसमें करीब 1200 गांव हैं। अब कौन जजमान किस गांव का है और कब-कब संगम में स्नान करने आया है अगर उसका रिकॉर्ड देखना हो तो कुछ ऐसे देख सकते हैं।
ऐसे होती है इंडेक्सिंग

  • 'अ' से लेकर 'ए' नाम से पड़ने वाले गांवों को विदिशा की एक नंबर बही में दर्ज किया जाता है।
  • 'क' और 'ख' अक्षर से पड़ने वाले गांवों को 2 नंबर बही में और ऐसे ही 'च, छ व ज' अक्षर से पड़ने वाले गांव 3 नंबर की बही में दर्ज करते हैं।
  • 'ट,ठ,ड,न' के रिकॉर्ड 4 नंबर और 'प, फ' के गांव 5 नंबर की बही में दर्ज। 'ब' अक्षर के गांवों को 6 नंबर और 'भ, म र, ल' अक्षर के गांव 7 नंबर में।
  • 'स' को 8 नंबर और 'ह' को 9 नंबर की बही में रखा जाता है। इसके बाद बकाया पेज नंबर डाला जाता है।

ऐसे समझें नंबर का खेल
अब मान लीजिए विदिशा का कोई गांव 'ब' से पड़ता है। तो उनके पूर्वजों का रिकार्ड देखने के लिए विदिशा की छह नंबर बही खोली जाएगी। इस बही के इंडेक्स में देखा जाएगा कि ब अक्षर के गांव किस पेज से किस पेज तक हैं। इसके बाद उस नाम के गांव को उसमें खोज लिया जाता है।
असल बही में दर्ज होते हैं रोज के रिकॉर्ड
पीलीकोठी वाले तीर्थ-पुरोहित अवधेश त्रिपाठी ने बताया कि संगम पर असल बही रखी होती है। इसे दस्तखत बही भी कहते हैं। इसमें रोज आने वाले श्रद्धालुओं के नाम व पते दर्ज किए जाते हैं। उनके दस्तखत भी लिए जाते हैं। इसके बाद क्षेत्रवार, जातिवाद व प्रांतवार उनकी छंटनी की जाती है। मान लीजिए कोई विदिशा का है तो उसको विदिशा की बही में अल्फाबेट के हिसाब से नकल बही में दर्ज कर दिया जाता है। अगर कोई उज्जैन का है तो उसे उज्जैन की बही में दर्ज कर दिया जाता है।

हर दस्तखत करने वाले के नाम के आगे पेज नंबर लिखा होता है। उस पेज नंबर को जब असल बही में खोला जाएगा तो उस जजमान का दस्तखत खुल जाएगा। दिन तारीख भी पता चल जाएगी। असल बही घर पर रहती है और नकल बही को संगम पर रखा जाता है। यह वह स्थान है जहां पर सभी 1484 पंडों के बही खाते बड़े-बड़े बक्सों में बंदकर रखे जाते हैं।

बहीखाते में बनी मानव आकृति और पूर्वजों का लेखाजोखा।
बहीखाते में बनी मानव आकृति और पूर्वजों का लेखाजोखा।

बही का कवर बनाने में भी दिखती है वैज्ञानिकता
तीर्थ पुरोहित वही का जो कवर बनाते हैं वह मोटे कागज का होता है उस पर लाल कपड़ा चढ़ा होता है। जिसका वैज्ञानिक पक्ष यह है कि लाल कपड़े पर कीटाणुओं का असर कम होता है। इन बही खातों के कागज थोड़े मोटे होते हैं। खास बात यह है कि 150 से लेकर 200 साल पुराने होने के बाद भी ये कागज आज भी सुरक्षित हैं। इन पर काली स्याही से नरकट की कलम से लिखा गया है।
हर पंडा का होता है अपना एक झंडा निशान
वैसे तो संगम में लोग कई कारणों से आते हैं पर प्रमुख कारण पितरों के तर्पण के लिए पिंडदान, माघ मेले में कल्पवास करने व प्रमुख स्नान पर्वों पर स्नान करने आते हैं। हर बार आने वालों के नाम असल बही में मेंटेन किया जाता है। दूर दराज से आने वाले श्रद्धालुओं पुरोहित की पहचान के लिए निश्चित झंडा का निशान मददगार साबित होता है। माघ मेले की भीड़ में दूर से ही यह झंडा और उसपर बना निशान दिख जाता है और यजमान अपने कुल पुरोहित के यहां पहुंच जाता है। इतिहासकार बताते हैं कि अकबर ने प्रयाग के तीर्थ पुरोहित चंद्रभान और किशन राम को ढाई सौ बीघा जमीन मेला लगाने के लिए मुफ्त में दी थी। यह आदेश भी पंडों के पास सुरक्षित और लिपिबद्ध है।
कैसे जान सकते हैं पूर्वजों के बारे में?
अवधेश त्रिपाठी बताते हैं कि बही खातों को मेंटेन करने का जो तरीका कई पीढ़ियों से चला आ रहा है वह इतना वैज्ञानिक है कि हम लोग बदलने की हिम्मत ही नहीं कर पाते। उसको इलेक्ट्रॉनिक डॉक्यूमेंटेशन करने की भी जरूरत नहीं पड़ती। किसी भी यजमान को अपने पूर्वज के बारे में जानना हो तो उसे हम पांच से 10 मिनट में बता देंगे कि वह कब-कब संगम स्नान करने आए थे। बस आपको अपनी तहसील, गांव और जिले का नाम बताना होगा।

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